सौदागर (Andy teaches a lesson to deceiving Merchant)

Friend Andy and Mandy goes on to do business at a distant location. There Mandy is cheated by a merchant. Rest of the story is how Andy teaches a lesson to that merchant.

Moral of the Story: Over-smartness can be dangerous.

Full Story in Hindi

एंडी और मैंडी बहुत पक्के मित्र थे। वे बचपन से ही स्कूल में साथ पढ़े थे। जब वे युवा हुए तो उन्होंने तय किया कि वे दोनों अपना व्यापार भी एक साथ करेंगे।

hindi short story for kids with moralदानों ने मिलकर कपड़े का व्यापार शुरु किया और उनका व्यापार खूब अच्छा चल निकला। वे दोनों विवाह करके घर बसाने की सोचने लगे, लेकितन तभी उनके व्यापार को किसी की नजर लग गई। किस्मत ने उनका साथ दोड़ दिया और व्यापारी धीरे-धीरे ठप होने लगा।

एक दिन एंडी बोला-”दोस्त, क्यों न हम कहीं और चल कर किस्मत आजमाएं ? हमारा व्यपार मंदा होता जा रहा है। यदि यही हाल रहा तो हमंे भोजन के भी लाले पड़ जाएंगे। इससे तो अच्छा है कि हम किसी दूसरे देश जाकर नया व्यापार शुरु कर दें।“

मैंडी बोला-”एंडी तुम ठीक कहते हो। हमें धीरे-धीरे यहां का काम बंद कर देना चाहिए। ताकि पैसा इकट्ठा करके कहीं और व्यापार कर सकें।”एंडी तुम ठीक कहते हो। हमें धीरे-धीरे यहां का काम बंद कर देना चाहिए। ताकि पैसा इकट्ठा करके कहीं और व्यापार कर सकें। दो महीने के भीतर दोनों मित्रों ने मिलकर अपना व्यापर बंद कर दिया। अपने धन को अशर्फियों के रूप में लेकर वे अपने घोड़ों पर सवार होकर चल दिए। दे दिन में वे दूसरे देश पहुंच गए।

दोनों ने वहां जाकर एक सराय में अपना सामान रख दिया। रात्रि में मैंडी बोला-”एंडी, मैं हजार अशर्फी और घोड़ा लेकर जाता हूं और देखता हूं कि व्यापार का कोई इंतजाम हो जाए। तब तक तुम यहीं मेरा इंतजार करो।“

एंडी बोला-”मित्र, जरा संभल कर जाना, न जाने यहां के लोग कैसे हों?“

मैंडी को व्यापार का अच्छा तजुर्बा था, वह बोला-”फ्रिक न करो मित्र। अच्छा मैं चलता हूं। शात तक लौट आऊंगा।“

थोड़ी ही दूर जाने पर एक व्यक्ति ने पूछा-”क्यों भैया, क्या घोड़ा बेचने जा रहे हो?“

मैंडी बोला-”कोई खास इरादा तो नहीं है। पर कोई अच्छा खरीदार मिल जाए तो बेच भी सकता हूं।“

वह व्यक्ति बोला-”मैं तुम्हारा घोड़ा खरीदने को तैयार हूं। बताओ, तुम्हारे घोड़ की कीमत क्या है?“

मैंडी ने सोचा मुझे घोड़ा बेचना तो है नहीं, पर यदि इसकी अच्छी कीमत मिल जाए तो बेचने में कोई हर्ज भी नहीं है। वैसे भी यह घोड़ा बूढ़ा हो गया है। इसके दाम ठीक मिल गए तो इसके बदले दूसरा अच्छा घोड़ा खरीद लूंगा। मैंडी बोला-”मेरे घोड़े की कीमत तो पांच सौ अशर्फी है।“

वह व्यक्ति बोला-”मैं यहीं का दुकानदार हूं। तुम कोई अजनबी जान पड़ते हो। यहां तो घोड़ा सौ अशर्फी में मिल जाता है।“

मैंडी बोला-”लेना हो तो लो, इसकी कीमत कम नहीं होगी। क्या नाम है तुम्हारा ?“वह व्यक्ति बोला-”मेरा ना रशैल है। मुझे तुम्हारा घोड़ा पसंद है। यह लो पांच सौ अशर्फी, अब घोड़ा मेरा हुआ।“

मैंडी ने खुश होकर पांच सौ अशर्फी ले ली और घोड़े से उतरकर घोड़े की जीन खोलने लगा ताकि अपनी अशर्फियां निकाल सके। लेकिन रशैल मैंडी से बोला-”अब यह घोड़ा मेरा हुआ तो इस पर से तुम कुछ नहीं ले सकते। यह यहां के व्यापारी हैं और जुबान के बड़े पक्के होते हैं। सौदा तय करते समय यह कतई तय नहीं हुआ था कि तुम इसकी जीन या कोई सामान उतार लोगे। अतः तुम घोड़े को हाथ भी नहीं लगा सकते।“

मैंडी बहुत परेशान था कि अब क्या करे? इतने में रशैल घोड़े पर बैठ कर उसे तेज दौड़ाता हुआ शहर की तरफ चला गया। मैंडी बहुत दुखी होता हुआ सराय लौट आया और अपने मित्र एंडी को सारी बात विस्तार से बताई। एंडी को रशैल की चालाकी पर बहुत क्रोध आया और उसने मन ही मन उससे बदला लेने का निश्चय किया।

अगले दिन एंडी तैयार होकर बोला-”मैंडी, मैं शहर जा रहा हूं व्यापार के लिए कुछ न कुछ इंतजाम करके लौटूंगा। तब तक तुम यहीं आराम करो।“

मैंडी बोला-”ये पांच सौ अशर्फिया साथ लेते जाओ।“

एंडी ने हंसते हुए जवाब दिया उसके लिए पच्चीस अशर्फियां ही काफी हैं। फिर वह पच्चीस अशफियां लेकर चल दिया। शहर में जाकर उसने रशैल की दुकान के बारे में पता किया तो पता लगा कि रशैल कसाई है और मीट बेचने का धंधा करता है।

एंडी सीधा रशैल की दुकान पर पहुंचा। उसने देखा कि रशैल की दुकान काफी बड़ी थी। ऊपर छत पर उसके बच्चे खेल रहे थे। छज्जे पर स्त्रिंया बैठी काम कर रही थीं। एंडी ने दुकान में प्रवेश किया तो देखा कि बकरे के सिर और मुर्गे की टांग लटक रहीं थी। दुकान के पिछवाड़े के आंगन में घोड़ा बंधा था। रूक-रूक कर घोड़े के हिनहिनाने की आवाज आ रही थी। एंडी ने पूछा-”भैया, ये सिर और टांगे कितने की हैं ?“

रशैल बोला-”यह सिर एक अशर्फी का एक है और एक जोड़ी टांगें भी एक अशर्फी की ही हैं।“

एंडी ने पूछा-”क्या सारे सिर और टागों की कीमत एक अशर्फी ही है?“

रशैल ने नम्रता से जवाब दिया-”हां, सभी सिर और टांग की जोड़ी की कीमत एक अशर्फी है।“

इस पर एंडी ने कुछ सोचा और पूछा-”पक्की बात है न कि हर सिर की कीमत एक अशर्फी है?“

रशैल झुझंलाकर बोला-”कह तो दिया कि हर सिर की कीमत एक अशर्फी है, क्या लिख कर दू?“

एंडी ने पच्चीस अशर्फी निकाल कर रशैल के हाथ में रखीं और बोला-”मुझे पच्चीस सिर चाहिए।“

रशैल बोला-”पर मेरे पास तो सिर्फ पांच सिर ही हैं, बाकी कल ले लेना।“

एंडी ने सख्ती दिखाते हुए कहा-”कोई नए व्यापारी हो क्या? हम व्यापारी जुबान के बड़े पक्के होते हैं, सौदा हो गया तो हो गया। दुकान के ऊपर भी बहुत सारे सिर हैं, मुझे अभी पच्चीस सिर चाहिए।“

रशैल गिड़गिड़ाने लगा और खुशामद करने लगा। वह बोला-”भैया, मैंने तो बकरे के सिर की कीमत बताई थी, तुम्हें दावत के लिए ज्यादा मीट चाहिए तो टांगें ले लो।“

एंडी बोला-”नहीं, मुझे तो सिर ही चाहिए, वह भी बिल्कुल अभी।“

रशैल समझ गया कि यह वाली घटना जानता है। तुरंत खुशामद करने लगा कि मेरे बीवी- बच्चों को छोड़ा दो। वह बोला-”भैया, आप मैंडी के ही कोई परिचित जान पड़ते हो। लो भइया, आप अपना घोड़ा भी ले जाओ और हजार अशर्फी भी ले जाओ। पर मेरे बीवी-बच्चों की जान बख्स दो।“

एंडी ने अपनी एक हजार अशर्फियां और घोड़ा लिया और सराय के लिए चल दिया।

Leave a comment

बफादारी (Pintu saves his Cattles)

Story of Pintu who love his cattles very much. One day when cattles are taken away by dacoits, he saves them risking his own life.

Moral of the Story: Loyalty is a virtue.

Complete Story in Hindi

बहुत पहले की बात है। अफ्रीका में मंडल नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसके पास ढेरों गाएं थीं। इसके अतिरिक्त बकरियां, हिरन व घोड़े भी उसने पाल रखे थे।

short story for kids in hindi with moralमंडल अपने जानवरों को बहुत प्यार करता था। परंतु इतने सारे जानवरों की देखभाल करना आसान नहीं था। उन जानवरों के चारे की व्यवस्था व देखभाल के लिए मंडल ने पिट्ठू नाम का एक लड़का रख लिया।

कुछ ही दिनों में सभी जानवर पिट्ठू से हिल-मिल गए। पिट्ठू उन सभी जानवरों से बहुत प्यार करता था। इस कारण ऐसा जान पड़ता था कि मानो वह इन जानवरों की भाषा जानता हो। जिस जानवर को जिस चीज की जरूरत होती, वह चीज उसके लिए ले आता।

कभी किसी जानवर को चारे की जरूरत होती तो कभी पानी की, कभी नहाने की। अकेला पिट्ठू उन सबकी उचित देखभाल करता था। इस कारण वे सभी जानवर भी पिट्ठू को प्यार करने लगे थे। पिट्ठू उन जानवरों को सीटी बजाकर एक जगह इकट्ठा कर लेता था। सीटी बजते ही सभी जानवर अपना भोजन छोड़कर पिट्ठू के पास आ जाते थे।

मंडल को पिट्ठू के होते अपने जानवरों की फिक्र करने की आवश्यकता नहीं थी। पिट्ठू गायों को चराने पास के जंगल में ले जाता था। वह प्रतिदिन सुबह गायों को ले जाता और शाम को गायों को वापस ले आता। पिट्ठू हर समय इस बात का ध्यान रखता था कि कोई जंगली जानवर किसी गाय पर अचानक हमला न कर दे।

एक दिन पिट्ठू जंगल में गाएं चरा रहा था कि अचानक डाकुओं ने हमला बोल दिया। पिट्ठू डाकुओं के इस हमले के लिए तैयार न था, अतः एकदम समझ ही न पाया कि उसे क्या करना चाहिए। वह झट से एक झाड़ी में छिप गया।

डाकुओं ने मोटी ताजी गायों का इतना बड़ा झुंड देखा तो बहुत खुश हुए। डाकुओें का सरदार बोला-”आज पहली बार इतनी तंदुरुस्त गायों का झुंड हमारे हाथ लगा है, जल्दी से इन्हें हांक कर ले चलो।“

सारे डाकू गायों को जंगल के दूसरे रास्ते की ओर हांकने लगे। लेकिन ऐसा प्रतीत होता था कि मानो सारी गायें बहरी हों और किसी का इशारा न समझती हों। वे जहां की तहां खड़ी रहीं। कुछ गाएं घास चरती रहीं, कुछ बैठी जुगाली करती रहीं।

डाकू परेशान थे कि गाएं आखिर बढ़ क्यों नहीं रहीं? उन्होंने गायों को डंडों के जोर पर हांकना आरंभ कर दिया। परंतु गाएं फिर भी टस से मस नहीं हुई।

डाकुओं के सरदार को क्रोध आने लगा और वह गायों को किसी भी तरह आगे बढ़ाने के लिए अपने साथियों को आदेश देने लगा। तभी एक डाकू बोला-”सरदार लगता है इन गायों का कोई चरवाहा दोस्त है, जो यहीं कहीं छिपा है। जिसकी आज्ञा के बिना ये यहां से आगे नहीं बढ़ रही हैं।“

सरदार को अपनी साथी की बात जंच गई। वह बोला-”फिर तो इन गायों का दोस्त यहीं-कहीं छिपा होगा। तुम लोग मिलकर उसे ढूंढ़ निकालो।“

पिट्ठू पौधों व झाडि़यों की ओट में छिपा डाकुओं की बातचीत सुन रहा था। एक तरफ उसे डाकुओं से डर लग रहा था, दूसरी तरफ गायों के व्यवहार को देखकर उसे बहुत खुशी हो रही थी।

सारे डाकू घोड़ों से उतर कर चरवाहे को इधर-उघर ढूंढ़ने लगे। तभी मौका पाकर पिट्ठू एक पेड़ के खोखले तने में घुस कर खड़ा हो गया।

काफी देर तक कोई चरवाहा न मिलने पर दो-तीन डाकू अपने-अपने घोड़ों पर चढ़कर घनी घास में चरवाहे को ढूंढ़ने का प्रयास करने लगे। ढूंढ़ते-ढूंढ़ते एक  डाकू का घोड़ा उसी पेड़ के आगे खड़ा हो गया जिसमें पिट्ठू छिपा बैठा था। घोड़े की पूंछ के बाल पिट्ठू के मुंह से छूने लगे। अचानक कुछ बाल पिट्ठू की नाक में घुस गए और पिट्ठू को छींक आ गई।

डाकू ने लपक कर पिट्ठू को पकड़ लिया और तने से बाहर खींच लिया। पिट्ठू को डाकुओं के सरदार के सामने उपस्थित किया गया। सरदार ने पूछा-”क्या इन गायों को तुम्हीं चराते हो?“

पिट्ठू ने डरते-डरते हामी भर दी। डाकुओं के सरदार ने आदेश दिया-”इस छोकरे को अपने घोड़े पर बिठा लो और छोकरे से कहो कि वह गायों को अपने साथ चलने का आदेश दे।“

पिट्ठू ने एक सीटी बजाई, सारी गाएं एक साथ आकर खड़ी हो गई। डाकुओं ने पिट्ठू को अपने घोड़े पर बिटा लिया। पिट्ठू के इशारे पर सारी गाएं उन घोड़ों के पीछे चल दीं। डाकू काफी दूर तक चलते रहें। गांए भी चुपचाप चलती रहीं। हालांकि गाएं थक चुकी थी, परंतु पिट्ठू के इशारे के कारण चलती जा रही थीं।

ऊबड़-खाबड़ और पथरीले पहाड़ी रास्ते आने लगे, परंतु डाकू अपने घोडों पर चलते रहे, साथ ही गाएं भी चलती रहीं। आखिर एक जगह जाकर डाकू रुक गए। यहीं डाकुओं का अड्डा था। डाकुओं ने सारी गायों को बांध दिया।

डाकुओं के सरदार ने आदेश दिया-”आज इन सारी गायों का दूध दुह कर सबके दूध पीने का इंतजाम करो। कल को इस काली वाली गाय का मांस हमें भोजन में चाहिए। अतः इसे अच्छी तरह चारा खिला दो।“

ठीक वैसा ही किया गया। रात्रि हो गई तो सभी डाकू थक कर सो गए, लेकिन पिट्ठू की आंखों में नींद नहीं थी। वह यह सोचकर बेचैन हुआ जा रहा था कि कल एक गाय को मार दिया जाएगा। इस तरह तो डाकू सारी गायों को मार डालेंगे। पिट्ठू परेशान था कि किस तरह डाकुओं के बंधन से मुक्ति पाई जाए।

पिट्ठू ने सोचा कि डाकुओं के चंगुल में फंस कर भी जान खतरे में है तो क्यों न जान पर खेल कर खुद को व गायों को बचा लूं। उसने अंधेरे में उठ कर गायों की रस्सी खोल दी। फिर गायों को धीमे से आवाज लगा कर शहर की ओर चल दिया। उसने देखा कि सभी गाएं उसके पीछे आ रही थीं। वह बिना पीछे मुड़े चलता रहा। रात्रि बीतने को थी। सुबह की लालिमा दिखाई देने लगी थी। पिट्ठू ने देखा कि सभी गाएं सही-सलामत पीछे आ गई थीं।

पिट्ठू सभी गायों को लेकर उनके मालिक मंडल के पास गया। मंडल शाम को गायों के वापस न आने से बहुत परेशान था। वह इतनी सुबह भी गायों के इंतजार में बाहर ही टहल रहा था।

पिट्ठू को दूर से आत देख मंडल उसे घर ले आया। पिट्ठू ने मंडल को सारी घटना सुनाई। घटना सुनकर मंडल की आंखों से आंसू निकल पड़े। उसने पिट्ठू को गले से लगा दिया और सभी गायों पर हाथ फेरते हुए उन्हें खूब प्यार करने लगा। उन्हें देख कर यूं लगता था कि वो आपस में बरसों-बाद मिल रहे हों।

Leave a comment

चांगी-मांगी (Changi Teaches a Lesson to his Brother Mangi)

In this Chinese folk tale, Changi teaches a lesson to his rude brother Mangi and guides him back to the right path.

Complete Story in Hindi

एक बार एक गांव में दो भाई रहा करते थे। उनका नाम था चांगी और मांगी। कहने को तो वे दोनों सगे भाई थे परंतु उनकी आदत एक दूसरे के विपरीत थीं।

hindi short story for kids with moralचांगी बहुत उदार और नेकदिल था। वह अपने बड़ों का आदर और छोटों से प्यार करता था। उसने खूब मेहनत करके अपार धन कमाया था। उसके यहां अनेक नौकर-चाकर थे। वह अपने नौकरों के प्रति बहुत दयावान था। उनकी परेशानी में उनकी सहायता करता था। इस कारण उसके नौकर उसे दिल से प्यार करते थे।

इसके ठीक विपरीत मांगी क्रूर स्वभाव का था। उसमें दया और प्रेम की भावना लेशमात्र भी नहीं थी। वह अकडू और कठोर इंसान था। परंतु व्यापार के मामले में किस्मत ने उसका साथ दिया था। इस कारण उसका व्यापार खूब फल-फूल रहा था। उसके यहां नौकर तो बहुत थे, परंतु कोई अंदर से खुश नहीं था।

मांगी अपने नौकरों से सुबह से शाम तक काम करवाता, परंतु तनख्वाह बहुत कम देता था। बीमार होने पर भी उन्हें छुट्टी नहीं देता था। यदि किसी नौकर के परिवार में कोई बीमार हो अथवा कोई परेशानी हो, मांगी उसकी कोई सहायता करने से इन्कार कर देता था।

कई बार दुखी होकर कुछ नौकर मांगी का काम छोड़ने की सोचते थे, परंतु अपने मालिक के साथ नमक हरामी करना पंसद नहीं करते थे। वह कहते थे कि हम जब तक जिंदा रहेंगे, मालिक की सेवा करते रहेंगे। मालिक चाहे जैसा भी हो, वह हमारा अन्नदाता होता है। उसकी सेवा करना हमारा फर्ज है। इसी कारण कोई भी नौकर उसके यहां दुख सहते हुए भी नौकरी छोड़कर जाना नहीं चाहता था।

चांगी यह देखकर मन ही मन बहुत दुखी होता था कि मांगी के सारे नौकर इतना कष्ट पा रहे हैं। चांगी ने अपने भाई को कई बार समझाने की कोशिश की, परंतु वह कुछ समझता ही नहीं था।

धीरे-धीरे मांगी का व्यापार चैपट होता जा रहा था। उसके बुरे व्यवहार व रूखी भाषा के कारण सभी लोग उससे व्यापार करने में कतराने लगे थे। एक दिन चांगी ने मांगी से कहा-”भाई, ईश्वर का दिया हम लोगों के पास सब कुछ है। फिर भी तुम अपने नौकरों से इतना बुरा व्यवहार क्यों करते हों?“

मांगी थोड़ा क्रोधित होते हुए बोला-”मैं तो किसी से दुव्र्यवहार नहीं करता, तुम यूं ही मुझ पर आरोप लगा रहे हो।“

चांगी ने कहा-”मैं जानता हूं कि तुम्हारे नौकर बहुत दुखी हैं, यदि तुम अपने नौकरों को ठीक तनख्वाह देकर मीठा व्यवहार नहीं कर सकते तो तुम किसी और शहर में जाकर अपना व्यापार शुरु कर दो। मुझसे अपनी आंखों के सामने ऐसा व्यवहार देखा नहीं जाता। तुम्हारे जाने के बाद मैं तुम्हारे नौकरों को अपन पास रख लूंगा।

यह सुनकर मांगी ने अपने भाई को बहुत बुरा भला-बुरा कहा और चांगी चुपचाप वहां से चला गया।

चांगी अपने भाई को सुधारने के लिए कोई उपाय सोचने लगा। एक दिन वह विचारों में खोया था। तभी उसका पुराना नौकर उसके पास आया और बोला-”मालिक, मैं जानता हूं कि आप क्यों परेशान हैं? आप कहें तो मै। आपकी सहायता कर सकता हूं।“

नौकर की बात सुनकर चांगी का ध्यान भंग हो गया। वह बोला-”तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?“

नौकर ने कहा-”मैं चाहे जो करूं, पर उससे मांगी साहब जरूर सुधर जाएंगे या फिर शहर छोड़कर चले जाएंगे।“

चांगी बोला-”क्या तुम जानते हो कि यह कितनी मुसीबत का काम है?“

नौकर ने जवाब दिया-”हां मालिक, मैं अच्छी तरह जानता हूं। पर आपके लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं। बस, आप मुझे आज्ञा दीजिए।“

इसके पश्चात् बूढ़े नौकर ने अपनी योजनानुसार रात्रि में मांगी के घर में प्रवेश पा लिया औरजब मांगी चैन से गहरी नींद सो गया तो उसने धीरे से मंागी का कम्बल उतारा और खिड़की के रास्ते भाग गया।

सुबह को मांगी उठा तो उसे बहुत तेज सर्दी लग रही थी। उसने ढूढ़ा परंतु उसका कम्बल कहीं नहीं मिला। उसे क्रोध आ गया। फिर जब वह दिन में अपने व्यापार पर गया तो वहां एक पैकेट पड़ा पाया। मांगी ने पैकेट खोला तो उसका कम्बल वहां रखा था, उस पर एक पर्ची लगी थी जिस पर लिखा था-”अपने लोगों को सुधार ले, वरना छोडूंगा नहीं।“

मांगी को लगा कि जरूर यह उसके नौकरों की चाल है। अगले दिन वह अपने कमरे के भीतर सोया। परंतु जब सुबह उठा तो यह देखकर हैरान रह गया कि उसका तकिया गायब है। उसे बड़ा क्रोध आने लगा। उसने नौकरों को अच्छी-खासी डांट पिलाई। परंतुु नौकर शिष्टाचारवश माफी मांगते रहे और कुछ न बोले।

वह व्यापार को जाने के लिए तैयार हो रहा था कि तभी कोई उसके दरवाजे पर एक बड़ा पैकेट छोड़ गया। उसने देखा कि उसके सारे नौकर उसके ही सामने खड़े थे। उसने घड़कते दिल से पैकेट खोला तो देखा कि उसमें उसका तकिया रखा था जिस पर एक पर्ची लगी थी। पर्ची पर लिखा था-”अपना व्यवहार बदल लो वरना…..।“

मांगी डर गया। अगले दिन वह रात्रि होने पर बहुत देर तक जागता रहा ताकि वह तकिया कम्बल ले जाने वाले को पकड़ सके। परंतु आधी रात्रि तक कोई नहीं आया। वह बैठा इंतजार करता रहा कि न जाने कब उसे नींद आ गई।

मांगी सुबह को उठा तो उसने देखा कि उसका बिस्तर सही सलामत है। वह बहुत खुश हुआ। तभी उसको देखकर उसका एक नौकर हंसने लगा। उसे बड़ा क्रोध आया। उसके बाद जो भी उसे मिलता उसे देखकर हंसने लगता। मांगी को कुछ भी समझ में न आया। कुछ देर बाद जब वह शीशे के सामने गया तो उसे हकीमत मालूम हुई।

मांगी डर के मारे थर-थर कांपने लगा। कोई उसकी एक मूंछ व सिर के आधे बाल काट कर ले गया था। मांगी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? उसे लगने लगा कि यदि कोई उसकी मूछ काट सकता है तो कल उसकी गरदन भी काट सकता है। उसने तुरंत नौकरों को आदेश दिया-”मेरा सारा सामान बांध दो। मैं दूसरे शहर में जाकर व्यापार करना चाहता हूं।“

नौकर कुछ समझ ही न सके। मांगी सिर पर टोपी लगाकर व दसूरी मूंछ पूरी तरह साफ करके अपने व्यापार के लिए चल दिया ताकि अपन व्यापार बंद करके कहीं और जाने का इंतजाम कर दे।

रास्ते में उसे चांगी मिला। वह चांगी से नजरें चुराने लगा। बिना मूंछों के उसकी शक्ल पहचानी नहीं जा रही थ। चांगी ने उसे रोक लिया और पूछा-”तुम इतने घबराए हुए कहां जा रहे हो?“

मांगी बोला-”भाई तुम ठीक कहते थे। मैंने भी अब निर्णय कर लिया है कि मैं अपना व्यापार दूसरे शहर में जाकर करूंगा।“

चांगी ने बहुत पूछा, तब उसने सारी घटना बता दी। मांगी को अपने बुरे व्यवहार के लिए भी पश्चाताप था। चांगी ने कहा-”यदि तुम्हें विश्वास है कि अब तुम अपने नौकरों व अन्य लोगांे से दुव्यर्वहार नही करोगे तो मेरी प्रार्थना है कि तुम यहीं रहो।“

मांगी अपने भाई की बात मान कर वहीं रहने लगा। अब चांगी-मांगी व उनके सभी नौकर बहुत खुश थे।

Leave a comment

छोटी-सी चीज (A Nepali Folk Tale)

A king finds 5 brave boys and grants them one wish each. 4 boys ask for money, house, job and good live while fifth one asks for something very intriguing.

Complete Story in Hindi

किसी देश में एक बहुत ही न्यायप्रिय राजा था। वह अपनी प्रजा के हितों की रक्षा करना भली-भांति जानता था। उसने अनेक गुप्तचरों को नियुक्त कर रखा था, जो देश के लोगों के हालत की सही जानकारी दे सकें।

राजा को फिर भी पूरी तसल्ली नहीं होती थी। वह अक्सर शाम को भेष बदल कर लोगों की स्थिति का पता लगाने निकल जाता, फिर देर रात्रि तक महल वापस लौटता था।

एक दिन एक गली में कुछ डकैतों को उसने डकैती की योजना बनाते देखा। राजा का खून खौल उठा कि उसके देश में चोर-लुटेरे भी रहते हैं। राजा ने उन डाकुओं को ललकारा तो डाकू राजा के ऊपर झपट पड़े। राजा उनसे लड़ाई लड़ ही रहा था कि चार-पांच युवक उधर से आ निकले। उन युवकों ने एक अकेले व्यक्ति को लुटेरों से लड़ाई करते देखा तो तुरंत उसे बचा लिया और डाकुओं पर टूट पड़े।

डाकू घबराबर भाग गए। युवकों ने राजा को पहचाना नहीं था। एक युवक बोला-”क्षमा कीजिए, आपको इन डाकुओं से अकेले भिड़ना पड़ा। आप हमें बताइए कि आप कहां रहते हैं, हम आपको वहीं छोड़ देंगे।“

राजा ने कहा-”नहीं, इसकी आवश्यकता नहीं है, आप जैसे योग्य युवक हमारे देश में रहते हैं, तो मैं अकेला कहां हूं। आप भी मेरे मित्र ही हैं।“

राजा कुछ देर बातें करता हुआ उनके साथ चल दिया और बातों-बातों में उन युवकों का नाम पता आदि पूछ लिया। वे सभी अलग स्थानों पर हते थे। कुछ दूर तक सब साथ चलते रहे, फिर आधी रात हो जाने पर सब अपने-अपने घर चले गए। राजा भी चुपचाप पिछले दरवाजे से राजमहल में जाकर सो गया। सुबह को राजा ने उठकर उन युवकों को राजदरबार में आने का न्यौता भेजा। वे सभी युवक यह सुनकर बहुत हैरान हुए कि राजा ने उन्हें बुलाया है। उनमें से कुछ युवक डर के मारे घबरा रहे थे कि कहीं उनसे अनजाने में कोई गलती हो गई है, जिसकी उन्हें सजा मिलने वाली है।

जब युवक राजमहल मे पहुंचे तो उन युवकों को बैठक में बिठा दिया गया। कुछ देर बाद सिपाही अपने साथ युवकों को राजा के सामने ले गए। युवक यह देखकर विस्मित रह गए कि रात में डकैतों से टक्कर लेने वाला व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि उस देश का राजा था। उन्होंने राजा को झुक कर प्रणाम किया।

राजा ने कहा-”तुम सब मेेर मित्र हो अतः तुम्हें प्रणाम नहीं, मेरे गले से लगना चाहिए।“

सभी युवक राजा की बात सुनकर बहुत खुश हो गए। राजा ने उन पांचों युवकों को गले लगाते हुए कहा-”तुम सभी मेरे मित्र हो। मैं चाहता हूं कि तुम लोग अपनी-अपनी एक इच्छा बताओ। दि मेरे वश में हुआ तो मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। वैसे जब कभी तुम्हें कोई चीज की आवश्यकता हो तो तुम मेरे पास आ सकते हो।“

राजा की बात सुनकर सभी एक दूसरे का चेहरा देखने लगे और सोचने लगे कि राजा से क्या मांगा जाए? एक युवक ने कहा-”मैं एक टूटी-फूटी झोंपड़ी में रहता हूं, यदि हो सके तो आप उसकी मरम्मत करा दीजिए।“

राजा ने अपने मंत्री को आदेश दिया कि इस युवक को एक बड़ा मकान तैयार करा कर दिया जाए, फिर राजा ने दूसरे युवक से पूछा तो उसने कहा-”मेरे घर की हालत बहुत ही खराब है। हम बहुत गरीब है। मुझे कुछ धन मिल जाता तो मेरे पिता और मै। कोई व्यवसाय शुरु कर देते।“

राजा ने आदेश दिया कि इस व्यक्ति को ढेर सारा धन दिया जाए ताकि यह अपना व्यापार जमा सके। फिर तीसरे युवक ने अपनी इच्छा इस प्रकार प्रकट की-”मैं पढ़ा-लिखा बेकार युवक हूं। मेरे माता-पिता चाहते हैं कि मैं नौकरी पर लग जाऊं ताकि कुछ कमा सकंू। मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मेरी नौकरी कहीं लगवा दीजिए।“

राजा ने उस युवक को एक अच्छे पद पर नौकरी दिलवाने का आदेश दिया और वह युवक खुश हो गया। अब चैथे युवक की बारी थी। वह कुछ देर तक सोचता रहा कि राजा से क्या मांगू। राजा ने कहा-”प्रिय मित्र! तुम्हें जो कुछ चाहिए, निःसंकोच मांगो। यदि मेरे वश में हुआ तो अवश्य दिलवाने का प्रबन्ध करूंगा।“

तब वह युवक बेाला-”महाराज, मैं जानता हूं कि आप मेरे सभी इच्छाएं पूरी कर सकते हैं। मेरा घर यहां से तीस कोर दूर है और मुझे कच्ची व ऊबड़-खाबड़ सड़क से होकर घर पहुंचना पड़ता है। यदि हो सके तो मेरे घर तक जाने वाली सड़क को पक्का करा दीजिए।“

राजा ने अपने सिपाहियों व कर्मचारियों को आदेश दिया कि इस युवक के घर के आस-पास तक सभी सड़कें पक्की बनवा दी जाएं। चोरों युवक खुश थे कि उनकी इच्छा जल्दी ही पूरी होने वाली है। वे सोच रहे थे कि उनका पांचतव मित्र तो सुंदर कन्या से विवाह कराने की प्रार्थना करेगा, क्योंकि उसके माता-पिता उसके लिए सुंदर व होशियार बहू की तलाश में है।

तभी पांचवे युवक ने राजा से कहा-”महाराजा, छोटा मुंह बड़ी बात न समझें तो मैं आपसे एक निवेदन करना चाहता हूं।“

राजा ने कहा-”तुम्हें जो भी कहना हो, निःसंकोच कहा।“

इस पर युवक ने कहा-”महाराज, मैं चाहता हूं आप वर्ष में एक बार मेरे घर अतिथि बनकर आएं।“

चारों युवक अपने मित्र की ओर अजीव-सी नजरों से देखने लगे कि उनके मित्र ने मांगा भी तो क्या मांगा। वे सोचने लगे कि आज इसकी अक्ल घास चरने गई है जो इसने ऐसी बेतुकी इच्छा जाहिर की है।

राजा युवक की इच्छा सुनकर थोड़ा असमंजस में पड़ गया। चूंकि उसने वायदा किया था कि यदि उसके वश में होगा तो उसकी इच्छा अवश्य पूरी करेगा। अतः राजा ने उसकी इच्छा पूरी करने की स्वीकृति दे दी।

सभी युवक अपने-अपने घर चले गए। कुछ दिन यूं ही बीत गए। चूंकि उस पांचवे युवक के यहां राजा को अतिथि बन कर जाना था, इस कारण उसके लिए एक बड़े और आलीशान मकान के निर्माण की तैयारी शुरु कर दी गई और उस युवक को उसे आलीशान मकान में अपने परिवार के साथ रहने के लिए भेज दिया गया।

फिर उस युवक के घर के कामेां के लिए अलग अलग अनेक नौकरों-चाकरों का प्रबन्ध किया गया ताकि जब राजा वहां रहने जांए तो उन्हें किसी प्रकार की असुविधा न हो।

अब उसके इतने सारे खर्च इतनी आसानी से नहीं चल सकते थे, इकस कारण उसके लिए राजकोष से एक बड़ी धनराशि नियमित रूप से भिजवाने का इंतजमा कर दिया गया। उसके घर राजा को अतिथि बनकर जाना था और राजा ऊंची-नीची और ऊबड़-खाबड़ सड़कों से यात्रा नहीं कर सकता था, इसलिए उस युवक के मकान तक चारों ओर से नई सड़कों का निर्माण किया गया।

वह युवक बहुत खुश था कि उसे अपने मित्रों से कहीं अधिक मिल चुका था। तभी राजा को पता लगा कि वह युवक कोई छोटा-मोटा काम करता है। यह राजा की शान के खिलाफ था कि वह किसी छोटे आदमी के घर मेहमान बन कर जाए, वह भी चैबीस घंटे यानि रात्रि तक के लिए।

राजा ने आदेश दिा कि उस युवक को राजदरबार में अच्छे पद पर नियुक्त किया जाए। युवक को मुख्य राजदबारी की नौकरी भी दे दी गई। अब राजा का उस युवक के यहां जाने का दिन निश्चित हो गया, लेकिन एक समस्या फिर भी आ रही थी। शाही कानूनों के अनुसार राजा किसी अजनबी युवक के यहां मेहमान बनकर नहीं जा सकता था।

राजा ने अपने मंत्री से सलाह की। मंत्री ने बताया कि वह युवक बहुत ही होनहार व बुद्धिमान है। क्यों न इसका विवाह आपकी पुत्री से कर दिया जाए? राजा को बात जंच गई औरा राजा ने उस युवक के यहां सूचना भिजवाई कि वह अपनी पुत्री का विवाह उस युवक से करना चाहता है। वह युवक खुशी से फूला नहीं समाया।

कुछ ही दिनों में उस युवक का राजकुमारी से विवाह हो गया। अब राजा उस युवक के यहां हर वर्ष एक दिन के लिए मेहमान बर कर जाने लगे, क्यांेकि अब वह युवक अजनबी नहीं बल्कि उनका दामाद बन गया था। राजा अपने दामाद की बुद्धिमता से बेहद खुश था कि उस युवक ने देखने में छोटी-सी चीज मांगकर इतनी बड़ी चीज मांग ली थी।

Leave a comment

बुद्धिमान (Cheemo’s Smartness Wins him Gold)

Korean folk tale of two young guys – Cheemo and son of a business. Later is impressed by smartness of Cheemo and rewards him with gold.

Full Story in Hindi

एक चरवाहे का बेटा चीमो हर रोज अपनी भेड़ें चराने के लिए मैदान में जाया करता था। वह रोज सुबह भेड़ों को लेकर हरे-भरे मैदान की ओर चल पड़़ता था। सूरज डूबने से पहले ही वह घर को वापस चल देता था।

hindi story for kids with moralएक दिन वह मैदान में बैठा कुछ सोच रहा था कि अचानक जोर से उछल पड़ा। उसने अपनी फर की टोपी जोर से हवा में उछाल दी।

टोपी हवा में उछल कर उघर से गुजर रहे घोड़े के मुंह पर जा गिरी। अचानक टोपी गिरने से घोड़ा बिदक गया और अपनी पिछली टांगों पर खड़ा हो गया। घोड़े के अगले पैर ऊपर उठ जाने से घुड़सवार खेत में जा गिरा।

इस घोड़े पर सवार युवक शहर के बडे़ व्यापारी का बेटा था। वह सज धज कर पिता के काम से कहीं जा रहा था।

युवक को बहुत जोर का क्रोध आ गया। वह कपड़े झाड़कर खड़ा हो गया और चिल्लाकर चरवाहे के लड़के से बोला-’’ऐ लड़के, तुम्हें जरा भी अक्ल नहीं। तुमने मेरे घोड़े को डरा दिया और मुझे गिरा दिया।“

चीमो बोला-’’मैने तो खुशी में टोपी उछाली थी। मुझे क्या पता था कि यह घोड़े के पास गिरेगी और घोड़ा डर जायेगा।

“ऐसी क्या खुशी मिल गयी तुम्हेें। जरा हमें भी तो बताओ और मुझे चोट लग जाती तो तुम्हारी खैर नहीं थी।” युवक बोला,

चीमो बोला-’’मेरे पिता ने मुझसे एक सवाल पूछा था। मैंने उसका उत्तर ढूंढ़ लिया है।

’’ऐसा क्या सवाल था?’’

’’सवाल यह था कि वह क्या चीज है। जो आदमी से ऊंची है, लेकिन मुर्गी से भी छोटी बन जाती है।

’’भला ऐसी क्या चीज हो सकती है?’’

’’तो क्या इसका उत्तर आपको भी नहीं मालुम। “

”मालूम तो है पर तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं।’’ युवक ने चतुराई से कहा।

चीमो वाला-’’वह चीज टोपी है। यह मनुष्य के सिर पर रहकर मनुष्य से ऊंची रहती है, परंतु जमीन पर रख दो तो मुर्गी से भी छोटी बन जाती है।’’

युवक चीमो की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। वह बोला-’’काफी होशियार जान पड़ते हो। यदि तुमने मेरा एक काम कर दिया तो मैं तुम्हें ढेर-सा इनाम दूंगा। कल मैं लौटते वक्त तुम्हारे पास आऊंगा। तुम मेरे लिए एक ऐसी भेड़ का इंतजाम करके रखना, जो न काली, हो न भूरी, न सफेद, हो और न ही चितकबरी हो।’’

यह कहकर वह युवक वहां से चला गया। चीमो उसके जाने के बाद सोचता रहा।

अगले दिन चीमो अपनी भेड़ चरा रहा था। तभी कल वाला युवक अपने घोडे़ पर सवार आया और बोला-’’लड़के क्या तुमने मेरे लिए मेरी मन पसन्द भेड़़ लाकर रखी है।’’

चीमो बोला-’’आपकी मनपसन्द भेड़ मेरे घर पर है। आप उसे किसी को भेज कर मंगवा सकते हैं। परंतु ध्यान रखिएगा कि जो व्यक्ति लेने आए वह न रविवार को आए, न सोमवार या मंगल को, न बुद्ध, या बृहस्पति को, न शुक्र या शनिचर को, दिन में आए, न रात्रि में।’’

चीमो की बात सुनकर युवक जोर से हंसा और बोला-मैं तुम्हारी बुद्धिमता से खुश हुआ। यह सोने की पांच अशर्फियां तुम्हारा इनाम है। यदि तुम कभी कोई नौकरी करना चाहो। तो मेरे पास चले आना।’’

यह कहकर युवक ने अपना पता चीमो को दे दिया और घोड़े पर सवार होकर घोड़ा दौड़ाता हुआ चला गया।

Leave a comment

ईष्र्या (Poor Farmer loses Cattle due to Jealousy)

A Bulgarian folk tale of a poor farmer who loses an opportunity to get free cattle due to his jealousy nature.

Moral of the Story: Jealousy can be a Destructive Emotion

Complete Story in Hindi

बहुत पहले की बात है। एक गरीब किसान एक गांव में रहता था। उसके पास एक बहुत छोटा सा खेत था जिसमें कुछ सब्जियां उगा कर वह अपना व अपने परिवार का पेट पालता था।

hindi story for kids with moralगरीबी के कारण उसके पास धन की हमेशा कमी रहती थी। वह बहुत ईष्र्यालु स्वभाव का था। इस कारण उसकी अपने अड़ोसी-पड़ोसी व रिश्तेदारों से बिल्कुल नहीं निभती थी।

किसान की उम्र ढ़लने लगी थी। अतः उसे खेत पर काम करने में काफी मुश्किल आती थी। खेत जोतने के लिए उसके पास बैल नहींे थे। सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता था। खेत में या आस-पास कोई कुआं भी नहीं था, जिससे वह अपने खेतों की सिंचाई कर सके।

एक दिन वह अपने खेत से थका-हारा लौट रहा था। उसे रास्ते में सफेद कपड़ों में सफेद दाढ़ी वाला एक बूढ़ा मिला। बूढ़ा बोला-’’क्या बात है, भाई, बहुत दुखी जान पड़ते हो?“

किसान बोला-’’क्या बताऊं बाबा, मेरे पास धन की बहुत कमी है। मेरे पास एक बैल होता तो मैं खेत की जुताई, बुआई और सिंचाई का सारा काम आराम से कर लेता।’’

बूढ़ा बोला-’’अगर तुम्हें एक बैल मिल जाये तो तुम क्या करोगे?“

’’तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीे रहेगा। मेरी खेती का सारा काम बहुत आसान हो जाएगा पर बैल मुझे मिलेगा कहां से?’’ किसान बोला ।

’’मैं आज ही तुम्हें एक बैल दिए देता हूं। यह बैल घर ले जाओ और घर जाकर अपने पड़ोसी को मेरे पास भेज देना।’’बूढ़े ने कहा।

किसान बोला-’’आप मुझे बैल दे देंगे, यह जानकर मुझे बहुत खुशी हुई। परंतु आप मेरे पड़ोसी से क्यों मिलना चाहते हैं।

बुढ़ा बोला-’’अपने पड़ोसी से कहना कि वह मेरे पास आकर दो बैल ले जाए।“

बूढे़ की बात सुनकर किसान को भीतर ही भीतर क्रोध आने लगा। वह ईष्र्या के कारण जल-भुन कर रह गया। वह बोला-’’आप नहीं जानते कि मेरे पड़ोसी के पास सब कुछ है। यदि आप मेरे पड़ोसी को दो बैल देना चाहते हैं। तो मुझे एक बैल भी नहीं चाहिये।

बूढे़ ने बैल को अपनी ओर खींच लिया और कहा-’’क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी समस्या क्या है? तुम्हारी समस्या गरीबी नहीें ईष्र्या है। तुम्हें जो कुछ मिल रहा है, यदि तुम उसी को देखकर संतुष्ट हो जाते और पड़ोसियों व रिश्तेदारों की सुख-सुविधाओं से ईष्र्या न करते तो शायद संसार में सबसे ज्यादा सुखी इंसान बन जाते।

इतना कहकर बूढ़ा जंगल में ओझल हो गया। किसान मनुष्य की ईष्र्यालु प्रवृति के बारे में सोचने लगा।

Leave a comment

बातूनी (Lazy Reyms gets a good Job)

Reyms is a talkative guy who is lazy and worthless. He impresses king with his talks and gets a good job and prosperous life. Its an Egyptian short folk tale

Moral of the Story: Every talent has its Use.

Full Story in Hindi

किसी गांव में एक लड़का रहता था। उसका नाम था रेम्स। रेम्स अत्यंत बातूनी लड़का था। वह अपनी बातों से अक्सर लोगों को प्रभावित कर लेता था।

hindi story for kids with moralरेम्स जितना बातूनी था, उतना ही आलसी और कमजोर था। उसके बाप-दादा ने उसके लिए अपार खन-दौलत छोड़ी थी। इस कारण उसे कमाने की कोई चिंता न थी।

रेम्स दिल खेलकर खर्च करता था और दिन-रात इधर उधर घुमने में समय बिता देता था। खुले हाथ के खर्च के कारण उसके अनेक मित्र बन गए थे, जो मौके का लाभ उठाकर मुफ्त का आनंद उठाते थे।

जैसे बूंद-बूंद पानी गिरने से मटका खाली हो जाता है। उसी तरह खर्च करते-करते रेम्स की धन-दौलत समाप्त होने लगी। धीरे-धीरे उसके दोस्त उससे आंखें चुराने लगे। अब रेम्स के पास कुछ नहीं बचा था। उसका कोई मित्र उसकी सहायता करने को तैयार नहीं था।

रेम्स काम की तलाश में इधर-उधर भटकने लगा। एक दिन वह राजा के दरबार में पहुंच गया और राजा से कोई नौकरी देने की प्रार्थना की।

राजा ने कहा- ”तुम हमारे लिये क्या काम कर सकते हो?’’

रेम्स को यूं तो कुछ काम करना नहीं आता था, परंतु बातें बनाने तथा गप्पे हांकने में उस्ताद था। वह तुरंत हजिर-जवाबी के साथ बोला-’’जो काम आपके किसी आदमी से न हो, वह काम रेम्स कर दे। आप आजमाऐं तो हुजूर।’’

राजा को लगा कि यह आदमी बहुत होशियार है। देखने में जितना सीधा-सादा है, बातचीत और अक्लमंदी में उतना ही चतुर जान पड़ता है। वह सोचने लगा कि यह आडे़ वक्त में खूब काम आएगा।

यही सोचकर राजा ने रेम्स को नौकरी पर रख लिया। रेम्स को अच्छे ओहदे पर रखा गया था। इस कारण प्रतिदिन एक सोने का सिक्का देना तय किया गया।

रेम्स बहुत खुश था कि उसे इतनी अच्छी तनख्वाह मिलती है। वह पूरे राजसी मेहमानखाने से अपना मनपंसंद भोजन करने लगा और राजमहल में ही एक कमरे में रहने लगा।

जब कभी रेम्स का मन होता, वह अन्य कर्मचारियों व पहरेदारों के काम की निगरानी कर आता। एक दो लोगों को आलसी कहकर डांट लगा आता फिर अपने कमरे में आराम करने लगता।

राजा के इतने बड़े राजमहल में ढेरों कर्मचारी थे। इस कारण कौन काम कर रहा है। और कौन मुफ्त में तनख्वाह ले रहा है। राजा को पता ही नहीं लग पाता था।

रेम्स के दिन बहुत मजे में कट रहे थे। एक दिन पड़ोसी राजा ने उस देश पर आक्रमण कर दिया। राजा ने भी उस पड़ोसी राजा का मुकाबला करने के लिए अपनी फौज भेजी।

परंतु राजा के सिपाही मरने लगे क्योंकि वे पड़ोसी राजा का मुकाबला करने में असमर्थ थे। राजा ने अपने मंत्रियों से मंत्रणा की कि उस शत्रु देश की सेना का मुकाबला किस प्रकार किया जाए? पर किसी भी मंत्री को इसका उपाय नहीें सूझ रहा था।

राजा सोच में डूबा था। तभी उसे रेम्स की याद हो आई, जिसने कहा था कि जो काम कोई न कर सके वह काम रेम्स कर दे। राजा ने रेम्स को बुलवा भेजा।

रेम्स तुरंत राजा व मंत्रियों की सभा में हाजिर हुआ।

राजा ने कहा-’’रेम्स तुमने कहा था कि जो काम कोई न कर सके, वह काम रेम्स कर दे, क्या तुम्हें याद है?’’

’’जी हुजूर, बिल्कुल याद है। ’’रेम्स बोला।

“तो अब एक काम तुम्हें करना होगा।” राजा ने कहा।

रेम्स हंसते हुए बोला-’’आप काम तो बताइए, मैं चुटकियों में कर दूंगा।“

राजा कुछ मिनट रुका, फिर बोला-’’तुम जानते ही होगे कि हमारे देश पर पड़ोसी राजा ने आक्रमण कर दिया है। हमारी छोटी-सी सेना इतनी बड़ी सेना का मुकाबला नहींे कर पा रही है। तुम्हें किसी प्रकार इस युद्ध को रोकना होगा।

रेम्स भीतर ही भीतर घबरा उठा। उसे समझ में नहीं आया कि वह राजा को किस प्रकार संतुष्ट करे? परंतु ऊपर से हंसता हुआ बोला-’’महाराज! मैं पड़ोसी राजा की सेना के छक्के छुड़ा दूंगा। अपनी तलवार यूं घुमाऊंगा कि दुश्मनों की गर्दन धड़ से अलग हो जायेगी।“

राजा ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा-’’क्या तुम युद्ध की विद्या भी जानते हो?“

रेम्स पहले दर्जे का गप्पी तो था ही, तुरंत बात बनाते हुए बोला- ”अरे मैं बहुत कुछ जानता हूं। बस मुझे मौका मिलना चाहिये। अब आप देखिएगा कि मैं क्या करता हूं।“

राजा ने आश्वस्त होते हुए कहा-’’तुम्हें जो मदद चाहिये ले लो और जल्दी ही अपना कमाल दिखाओ।“

रेम्स वहां से जाकर अपने कमरे में बैठ सोच-विचार करने लगा। वह जानता था कि वह कुछ भी नहीं कर सकता था, वह सिर्फ बातें बनाना जानता था।

उसने चुपचाप अपना सामान बांधकर एक कोने में रख दिया और खजाना मंत्री से जाकर कहा-’’मुझे राजा ने जो कार्य सौंपा है, उसके लिए एक हजार मोहरें चाहिये।’’

खजाना मंत्री ने सहर्ष ही उसे हजार मोहरें दे दीं। रेम्स खुश था कि भविष्य के लिए उसका अच्छा इंतजाम हो गया।  राजा के यहां मिलने वाली सारी मोहरे भी उसने जोड़ रखी थी।

उसने मन ही मन राजमहल से भागने की योजना बना डाली तभी उसे खयाल आया कि यहां से दूर जाते-तो तो एक-दो दिन लग जाएंगे। इतने समय में तो वह भूखा मर जायेगा।

रेम्स शाम के वक्त रसोई में पहुंचा। लेकिन भोजन का वक्त न होने के कारण वहां शाही रसोईये मौजूद नहीं थे। तभी एक रसोईये ने वहां प्रवेश किया। वह बोला-’’आपको किसी चीज की आवश्यकता हो तो बताइए।़़’’

रेम्स ने तुरंत बात बनाते हुए कहा-”मुझे शाही काम से बाहर जाना है। अतः मैं रात्रि के भोजन के समय मौजूद नहीं रहूंगा। यदि कोई भोजन आप अभी तैयार कर सकें तो……..।“

’’हां हां मैं अभी भोजन तैयार किये देता हूं। आप आधा-पौन घंटा ठहर जाइए।“ रसोइया बोला।

रेम्स सोचने लगा कि आधे घंटे में महल के दूसरे और रसोइए इधर आ जायेंगे तो उसकी पोल खुल जायेगी। अतः वह बोला-’’दोपहर के भोजन में से जो कुछ बचा हो वही दे दीजिये।

रसोईये ने देखकर बताया कि सिर्फ तीन रोटियां बची हुई हैं और एक सब्जी। रेम्स ने खुश होकर वह रोटी और सब्जी ले ली। इसके पश्चात् मौका देखकर रेम्स ने मोहरें, अपने सामान की गठरी ली और महल के पिछवाड़े से बाहर निकल गया।

रात्रि होने को थी। रेम्स को किसी ने जाते हुए नहीं देखा। वह तेज कदमों से चलता रहा-चलते-चलते जंगल में पहुंच गया। तब तक रात्रि हो गई थी। उसने एक रोटी निकाल कर खा ली और रात्री पेड़ पर बिता दी।

सुबह होते ही वह आगे के लिए चल दिया। चलते-चलते वह थक गया था, उसे प्यास भी लगी थी। रास्ते में उसने एक तालाब देखा और सोचा, कि यहीं बैठकर थोड़ा भोजन कर लूं और फिर पानी पीकर विश्राम कर लूं।

उसने पहले तालाब के पानी से प्यास बुझाई, फिर पेड़ की छांव में यह सोचकर लेट गया कि अभी थोड़ा सुस्ता लूं फिर भोजन करुंगा परंतु लेटते ही रेम्स की आंख लग गई।

काफी देर बाद रेम्स की आंख खुली तो उसे जोर की भूख लगी थी। वह अपनी खाने की पोटली खोलकर बैठ गया। उसमें केवल दो रोटियां थीं। रेम्स सोचने लगा कि यदि उसने दोनों रोटियां अभी खा लीं तो बाद में भूख लगने पर क्या खायेगा।

रेम्स सोचते-सोचते बुदबुदाने लगा एक खाऊं, दोनों को खाऊं, एक खाऊं, दोनों को खाऊं। भाग्यवश उस पेड़ पर दो परियां रहती थीं। उन परियांे ने रेम्स को बुदबुदाते हुए देखा तो वे डर गई। वे सोचने लगी कि रेम्स उन दोंनों को खाने की बात कर रहा है।

दोनों परियां झट से रेम्स के सामने आ खडी हुई और प्रार्थना करने लगी कि वह उन दोनों को छोड़ दे, बदले में बड़ा इनाम ले ले। रेम्स को पहल तो कुछ समझ में नहीं आया। उसने उनकी बातों को ध्यान से सुना तो समझ गया और बोला-’’मैं तुम दोनों की जान बख्श दूंगा, बोलो बदले में क्या दोगी?’’

एक परी बोली-’’मैं तुम्हें यह चटाई दुंगी, इस पर बैठकर तुम जहां चाहो जा सकते हो।’’

रेम्स ने तुरंत स्वीकृति दे दी क्योकि वह तो कब से रास्ता भटक रहा था, जल्द ही अपने घर पहुंचना चाहता था।

तभी दूसरी परी बोली-’’यह अंगूठी पहन लो, इसे पहन कर तुम अदृश्य हो जाओगे। इसके बाद तुम हर ताकतवर चीज का मुकाबला आसानी से कर सकोगे।“

’’रेम्स यह सुनकर खुश हो गया और दोनों चीजें ले लीं। वह चुपचाप भोजन करने बैठ गया, तभी उसने देखा कि डाकुओं ने उसे चारों तरफ से घेर लिया है। उसे कुछ न सूझा तुरंत परी की दी हुई अगूंठी पहन ली और अदृश्य होकर डाकुओं पर वार करने लगा।“

डाकू घबराकर भाग गए। रेम्स को सहसा विश्वास नहीं हो रहा था। उसने चटाई को भी आजमाने की सोची । वह चटाई पर बैठ गया। और लडाई के मैदान में पहुंचने का आदेश दिया। कुछ ही क्षणों में वह पड़ोसी राजा के साथ हो रही लडाई के मैदान में पहुंच गया।

उधर, अगले दिन सुबह राजा ने अपने सेवको को रेम्स को बुलाने भेजा ताकि लड़ाई की तैयारियों के बारे मेें जानकारी ली जा सके। सेवकों ने आकर बताया कि रेम्स गायब है और कमरे में उसका सामान भी नहीं है।

राजा क्रोधित हो उठा। तभी खजाना मंत्री ने बताया कि वह राजखजाने से मोहरें लेकर गया है। अब तो राजा समझ गया कि रेम्स भाग गया है, उसके क्रोध की सीमा नहीं रही। उसने तुरंत आदेश दिया कि रेम्स की खोज की जाए और उसे राजा के सामने पेश किया जाए।

सैनिक चारों दिशा में रेम्स की खोज करने चल दिये।

उधर रेम्स ने अदृश्य रह कर पड़ोसी राजा के सैनिकों के हथियार छीन कर मार-काट शुरु कर दी। सैनिक अदृश्य ताकत को भूत समझकर भागने लगे। पडोसी राजा ने अपने सैनिकोें से युद्ध मैदान का वर्णन सुना तो तुरंत लड़ाई छोड़ शांति का संदेश भेजा।

राजा के सैनिकों ने रेम्स को सेना के साथ नेतृत्व करते हुए लौटते हुए पाया तो वे तुरंत खुशखबरी लेकर राजा के पास पहुंचे।

राजा के पास पड़ोसी देश का शांति दूत भी रेम्स के साथ ही पहुंचा।

राजा को सारी बात सुनकर बहुत हैरानी हुई। उसने पडौसी राजा के शांति दूत से बात करने की स्वीकृति प्रदान करके उसे वापस भेज दिया। फिर रेम्स से पूछा-”तुम कहां चले गए थे, रेम्स?’’

रेम्स ने तुरन्त बात बनाते हुए कहा- ’’आपके आदेशानुसार युद्ध समाप्त कराने गया था। मैंने कहा था न कि जो काम कोई न कर सके, सो रेम्स कर दे। अब बताइए क्या आज्ञा है ?

राजा ने खुश होकर रेम्स का वेतन व पदवी बढ़ा दी। रेम्स ने पहले तो अपने गांव वापस जाने का मन बना रखा था, परंतु इतनी अच्छी नौकरी व जिंदगी भर का आराम कहां मिल सकता था, सो उसने राजा को स्वीकृति प्रदान कर दी। अब उसे भविष्य में कमाने की चिंता से मुक्ति मिल गई थी। वह चैन से राजा के महल में रहने लगा।

Leave a comment

मुफ्त की चाकरी (Servant teaches a lesson to Moharchand)

Moharchand never pays salary to any of his servants and take their services free of cost. In this Nepali folk tale Moharchand is taught a lesson by one of his servants.

Complete Story in Hindi

गोटिया बहुत ही नटखट लड़का था। उसका दिमाग हरदम शैतानियों में ही लगा रहता था। सब लोग गोटिया की शरारतों से तंग आ चुके थे। नोटिया के मामा चाहते थे कि वह उनके कामों में हाथ बंटाए, परंतु गोटिया का न तो काम में मन लगता था, न ही वह कोई काम तसल्ली से करता था।

hindi short story for kids with moralगोटिया के मां-बाप का बचपन में ही देहांत हो गया था। अतः उसके लिए जो कुछ भी परिवार के नाम पर था, वह उसके मामा-मामी थे। गोटिया का एक बड़ा भाई थी था, जो दिन-रात मेहनत करके मामा-मामी के सेवा करता था।

एक दिन गोटिया के मामा ने उसे डांटते हुए कहा-”तू न तो काम का न धाम का, दिन भर मुफ्त की रोटियां तोड़ता रहता है। जब खुद कमाएगा तो पता चलेगा कि मेहनत की कमाई क्या होती है।“ गोटिया को मामा की बात दिल में चुभ गई। उसने सोचा कि यदि मामा के साथ काम करूंगा भी तो बदले में वह कुछ नहीं देगे, इससे बेहतर है कि मैं कहीं और काम करूं ताकि कमाई भी हो जिसमें से कुछ पैसा वह मामा-मामी के हाथ पर रख सके। यही सोचकर एक दिन गोटिया चुपचाप घर से चला गया।

चलते-चलते गोटिया पास के गांव में पहुंच गया। वहां एक सेठ रहते थे। नाम था-मोहरचन्द। बड़े धनी सेठ थे, पर थे बड़े कंजूस। लोगों से मुफ्त की चाकरी कराने में उन्हें बड़ा आनंद आता था। गोटिया सेठ मोहरचन्द के यहां पहुंचा और उसने काम देने की गुहार की।

सेठ ने कहा-”मैं तुम्हें नौकरी पर रख सकता हूं, पर मेरी कुछ शर्तें हैं।“

गोटिया अपने को बहुत चालाक समझता था, वह बोला -‘‘सेठ जी, आप अपनी शर्तें बताइए। मैं हर हाल में काम करके पैसा कमाना चाहता हूँ। बस मुझे तनख्वाह अच्छी चाहिए।’’

सेठ ने कहा- ‘‘तनख्वाह की फिक्र तुम मत करो। मेरे पास पैसे की कोई कमी नहीं है। मैं तुम्हें पांच सोने की मोहरे प्रतिमाह दूँगा। पर मेरी शर्त यह है कि तुम हरदम मेरी इच्छानुसार काम करोगे। यह हमेशा ध्यान रखना कि मुझे किसी बात पर क्रोध न आए। यदि मुझे महीने में एक बार भी क्रोध आ गया तो मैं तुम्हें उस माह की तनख्वाह नहीं दूंगा।’’

गोटिया हंसते हुए बोला-‘‘यह कौन सी बड़ी बात है सेठ जी। मैं इतनी मेहनत और लगन से काम करूंगा कि आपको क्रोध करने का मौका ही नही दूंगा। लेकिन सेठ जी, आपसे एक प्रार्थना है कि आप मेरे रहने व भोजन का प्रबंध कर दें ताकि मैं आपकी खूब सेवा कर सकूं।’’

सेठ ने बहुत प्यार से कहा- ‘‘गोटिया, मैं तुम्हारे रहने का इंतजाम कर दूंगा। पर याद रखना कि दोनों वक्त तुम्हें एक पत्ता भर भोजन ही मिला करेगा।’’

गोटिया ने बाहर की दुनिया देखी न थी और न ही कहीं नौकरी की थी। वह सेठ की चालाकी भांप नहीं सका और बोला – ‘‘सेठ जी, मैं थोड़ा-सा ही भोजन खाता हूँ, आज से ही काम पर लग जाता हूँ।’’

गोटिया सेठ मोहरचन्द के यहां खूब मन लगाकर काम करने लगा। अतः सेठ का क्रोध करने का सवाल ही न था। वह दिन-रात काम में लगा रहता, ताकि कहीं कोई काम गलती से छूट न जाए। लेकिन गोटिया परेशान था कि पत्ते पर बहुत थोड़ा-सा ही भोजन आता था।

सेठ के घर के बाहर एक शहतूत का पेड़ था। गोटिया रोज पेड़ पर चढ़ कर खूब बड़ा पत्ता ढूंढ़ने की कोशिश करता। परन्तु पत्ते पर थोड़े से ही चावल आते थे, जिससे गोटिया का पेट नहीं भरता था। उसे हरदम यूं लगता था कि उसे भूख लग रही है। फिर भी गोटिया खुश था कि उसे महीने के अंत में पांच सोने की मोहरें मिलेंगी। वह सोचता था कि कुछ माह पश्चात जब वह ढेर सारी मोहरें इकट्ठी कर लेगा, तब वह अपने गांव जाकर मामा को देगा तो मामा खुश हो जाएगा।

गोटिया को काम करते 20 दिन बीत चुके थे। वह खुश था कि जल्दी ही एक महीना पूरा हो जाएगा तब उसे सोने की मोहरें मिलेंगी।

अगले दिन सेठ जी ने सुबह ही गोटिया को अपने पास बुलाया और कहा-‘‘आज तुम खेत पर चले जाओ और सारे खेतों में पानी लगाकर आओ।’’

गोटिया ने कहा-‘‘जो आज्ञा सेठ जी।’’ और खेतों की तरफ चल दिया। यूं तो गोटिया ने कभी मेहनत की नहीं थी, परन्तु जब उसे धन कमाने की धुन सवार थी तो खूब काम में लगा रहता था। वह खेत पर पहुंचा तो उसने देखा कि सेठ के खेत मीलों दूर तक फैले हैं। यहां तो पूरे खेत में पानी लगाने में एक हफ्ता भी लग सकता है। लेकिन वह घबराया नहीं। कुएं से पानी खींच कर मेड़ों के सहारे पानी खेतों में पहुंचाने लगा।

सारा दिन लगे रहने के बावजूद मुश्किल से एक चैथाई खेत में ही पानी लग गया, तभी शाम हो गई। गोटिया बेचारा थक कर सुस्ताने लगा, तभी उसे याद आया कि यदि देर से वापस पहुंचा तो भोजन भी नहीं मिलेगा। वह तुरंत घर चल दिया। वहां पहुंचते ही सेठ मोहरचन्द ने पूछा- ‘‘क्या पूरे खेत में पानी लगा कर आए हो ?’’

‘‘नहीं सेठ जी, अभी तो चार दिन लगेंगे पूरे खेत में पानी देने के लिए।’’ गोटिया ने शांति से जवाब दिया।

सेठ ने जोर से कहा-‘‘फिर अभी वापस क्यों आ गए ? मैंने तुम्हें पूरे खेत में पानी देने को कहा था।’’

गोटिया धीरे से बोला-‘‘सेठ जी, अंधेरा हो गया था, सूरज डूब गया था।’’

‘‘तो…..? सूरज डूब गया तो क्या चांद की रोशनी खेतों में नहीं फैली है ?’’ सेठ ने क्रोधित होकर कहा।

गोटिया को सेठ के क्रोधित होने का ही डर था, वही हुआ। सेठ क्रोध में बोला-‘‘मुझे नहीं पता, जाओ खेतों में पानी दो।’’

गोटिया भूखा ही घर से निकल गया। वह थका हुआ था। खेत के किनारे सो गया। आधी रात बीतने पर उसकी आंख खुली तो वह खेत में पानी देने लगा। पूरे दिन काम में लगा रहा। रात्रि होने लगी तब तक खेत में जैसे-तैसे पानी लगा दिया, फिर वह थका-हारा सेठ के घर लौट आया। सेठन ने उससे कुछ नहीं पूछा। गोटिया भोजन खाकर सो गया।

धीरे-धीरे एक महीना बीत गया। गोटिया जानता था कि उसे वेतन नहीं मिलेगा। वाकई सेठ ने उसे उस माह वेतन नहीं दिया। अगले माह वह हर रोज ध्यानपूर्वक कार्य करता रहा, परन्तु माह के अंत में सेठ किसी बहाने क्रोधित हो गया और उसे उस माह फिर तनख्वाह नहीं मिली।

इस प्रकार छह माह बीत गए परन्तु गोटिया को एक बार भी वेतन नहीं मिला। गोटिया भोजन कम मिलने से दिन पर दिन दुबला होता जा रहा था, साथ ही साथ वेतन न मिलने से दुखी भी था।

गोटिया का भाई रामफल गोटिया के चले जाने से बहुत दुखी था। वह उसे खोजते-खोजते सेठ मोहरचन्द के घर तक पहुंच गया। वहां अपने नटखट भाई की हालत देखकर वह बहुत दुखी हुआ। उसने गोटिया को समझाया कि किसी न किसी बहाने वह नौकरी छोड़ दे। अगले दिन गोटिया सुबह देर तक सोता रहा। दोपहर खाने वक्त भोजन लेने पहुंच गया। सेठ को पता लगा कि गोटिया ने आज दिन भर काम नहीं किया है। अतः सेठ ने गोटिया को खूब डांटा, गोटिया रोने लगा। सेठ ने कहा-‘‘ठीक है, तुम्हें अपने घर जाना है तो जा सकते हो, मुझे लगता है कि तुम्हें अपने घर की याद आ रही है, परन्तु दो दिन में जरूर लौट आना।’’

गोटिया का मन खुश करने के लिए सेठ ने उसके हाथ पर एक चांदी का सिक्का रख दिया ताकि धन के लालच में गोटिया वापस आ जाए। सेठ मोहरचन्द को मुफ्त में नौकर चले जाने का डर था।

अगले दिन रामफल सेठ के पास एक काम मांगने पहुंचा तो सेठ मन ही मन बहुत खुश हुआ कि चलो एक नौकर गया तो दूसरा लड़का नौकरी मांगने आ गया। उसने कहा-‘‘रामफल, हम तुम्हें नौकरी पर रख सकते हैं पर हमारी कुछ शर्तें है।’’

रामफल बोला-‘‘सेठ जी, आप अपनी शर्तें बताइए। आप यह भी बताइए कि आप मुझे कितना वेतन देंगे।’’

सेठ जानता था कि वह अपने नौकरों से मुफ्त में काम कराता था अतः बहुत अच्छी तनख्वाह का लालच देता था ताकि नौकर चुपचाप करता रहे। सेठ बोला-‘‘देखो, मैं तुम्हें हर माह दस सोने की मोहरें दूंगा, पर मेरी शर्त यह है कि पूरे माह मुझे तुम पर क्रोध नहीं आना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि तुम इतना अच्छा काम करोगे कि मुझे क्रोधित न होना पड़े। यदि एक बार भी मुझे क्रोध आ गया तो तुम्हें उस माह का वेतन नहीं मिलेगा।’’

रामफल ने भोलेपन से कहा-‘‘सेठ जी, मुझे क्या पता कि आपको किस बात पर क्रोध आता है। हर आदमी अपने क्रोध पर काबू रख सकता है, किसी दूसरे के क्रोध पर नहीं।’’

सेठ बहुत अक्लमंद था, वह तुरंत बात को संभालते हुए बोला-‘‘ठीक है, यदि तुम्हें किसी बात पर किसी माह क्रोध आया तो तुम्हें उस माह का वेतन नहीं मिलेगा और यदि मुझे क्रोध आ गया तो 10 की जगह 15 सोने की मोहरें वेतन में मिलेंगी।’’

रामफल बोला-‘‘यह मुझे मंजूर है परन्तु मैं अपने भोजन की बात भी तय कर लूं कि मैं दोनों वक्त भोजन आपके यहां ही खाऊँगा।’’

सेठ ने तुरंत स्वीकृति देते हुए कहा-‘‘ठीक है, तुम्हें एक वक्त में एक पत्ता भर भोजन मिलेगा।’’

रामफल तुरंत तैयार हो गया और बोला-’’मैं चाहता हूँ कि यह भी तय हो जाए कि आप मुझे नौकरी से निकालेंगे नहीं।’’ सेठ को रामफल की बात सुनकर कुछ आशंका हुई परन्तु उसे अपनी चतुराई पर पूर्ण भरोसा था।’’ सेठ बोला-‘‘यदि मैं तुम्हें एक वर्ष से पहले नौकरी से निकालूंगा तो 100 मोहरें तुम्हें हरजाने के तौर पर दूंगा, परन्तु यदि तुमने बीच में नौकरी छोड़ी तो तुम जुर्माने के तौर पर 50 मोहरें दोगे।’’

यह सुनकर रामफल भीतर ही भीतर थोड़ा डर गया कि सेठ ने मुझ पर जुर्म किया तो मुझे नौकरी छोड़नी पड़ेगी तब मैं जुर्माना कहां से भरूंगा। परन्तु फिर रामफल ने सारी बात ईश्वर पर छोड़कर नौकरी स्वीकार कर ली।

अगले ही दिन रामफल काम पर लग गया और ठीक प्रकार काम करने लगा। जब भोजन का वक्त आया तो रामफल पत्ता लेकर रसोइए के पास पहुंचा। रसोइया पत्ते का आकार देखकर विस्मित था। रामफल बड़ा-सा केले का पत्ता लाया था, जिस पर पूरे घर के लिए बना भोजन समा गया। परन्तु शर्त के अनुसार रसोइए को पत्ता भरना पड़ा। रामफल सारा भोजन लेकर पास में बनी अपनी झोंपीड़ी में आ गया जहां गोटिया इंतजार कर रहा था। दोनों भाइयों ने पेट भर भोजन किया बाकी भोजन कुत्तों व कौओं को डाल दिया।

सेठ को पता लगा तो उसे रामफल की चालाकी पर बड़ा क्रोध आया, परन्तु वह रामफल के आगे क्रोध प्रकट नहीं कर सकता था। रामफल ठीक प्रकार पूरे माह काम करता रहा। माह के अंत में सेठ ने रामफल को अपने गोदाम भेजा और कहा कि सारा अनाज बोरों में भर दो। शाम तक रामफल आधे बोरों में अनाज भर कर सेठ के यहां वापस आ गया। सेठ ने सोचा कि किसी तरह इसे क्रोध दिलाया जाए ताकि उसे रामफल को वेतन न देना पड़े। सेठ प्यार से बोला-‘‘तुम वापस क्यों आ गए, जब सारा अनाज थैलों में नहीं भरा था?’’

रामफल ने शांति से कहा, ‘‘क्योंकि मैं थक गया था, अब मैं कल काम करूंगा।’’

सेठ को अचानक क्रोध आ गया और बोला-‘‘कल-कल क्या करते हो, अभी जाओ और सारा अनाज भर कर आओ।’’

रामफल जोर से हंसा और बोला-‘‘सेठ जी, अब तो मैं कल ही काम करूंगा। और हां, कल आपको मुझे तनख्वाह में 15 मोहरें देनी होंगी।’’

सेठ अपने क्रोध की उलटी शर्त भूल चुका था, क्रोध में चिल्लाया-‘‘एक तो काम नहीं करते ऊपर से हंसते हो। मैं तुम्हें 15 मोहरें क्यों दूंगा?’’

‘‘सेठ जी, क्योंकि आपको क्रोध आ रहा है।’’ रामफल बोला।

सेठ ने अचानक अपना रूख बदला और नकली हंसी के अन्दाज-”ओह……अच्छा……ठीक है।“ फिर अगले दिन सेठ ने रामफल की तनख्वाह को 15 मोहरें दे दीं, लेकिन मन ही मन निश्चय किया कि कम से कम 6 ताह तक उसे कोई वेतन नहीं दूंगा। फिर बेचारा खुद ही परेशान होकर नौकरी छोड़ देगा और जुर्मान के तौर पर 50 मोहरें मुझे देगा।

लेकिन रामफल भी कम चालाक न था। वह तनख्वाह लेकर अगले दिन सुबह काम पर आ गया। सेठ ने उसे गोदाम पर जाने को कहा और अपने काम में लग गया। थोउी देर बाद सेठ जब उधर आया तो देखा कि रामफल सर्दी की धूप सेंक रहा है, अभी तक गोदाम नहीं गया। सेठ को रामफल पर बहुत क्रोध आया, लेकिन वह उससे कुछ कह नहीं सकता था, अतः प्यार से उसे गोदाम पर काम करने को कहकर चला गया।

अब रामफल अपनी मर्जी से कभी काम करता, कभी नहीं। एक सप्ताह बीत गया, परंतु रामफल ठीक प्रकार से काम नहीं कर रहा था। वह सेठ के अन्य नौकरों को भी बातों में उलझाए रहता। सेठ मन ही मन क्रोध में उबल रहा था। एक तरफ तो वह केले के पत्ते पर ढेरों भोजन ले लेता था, दूसरी तरफ ठीक प्रकार से काम भी नहीं करता था।

एक दिन सेठानी बोली-”यह रामल हमारे सारे नौकरों को बिगाड़ रहा है। एक दिन यह हमारा जीना मुश्किल कर देगा, आप इसे निकाल क्यों नहीं देते?“

सेठ ने सेठानी को कारण बताया तो सेठानी बोली-”आप इतने वर्षों से इतने सारे नौकरों से मुफ्त काम करते आए हंैं। लगता है यह नौकर आपको सबक सिखाकर रहेगा, फिर आप किसी से मुफ्त में काम नहीं कराएंगे। आप इसकी आज ही छुट्अी कर दो, वरना सभी नौकर बगागत पर उतर आए तो सबसे निपटना मुश्किल होगा।“

अगले दिन सेठ ने रामफल को बुलाने भेजा, परंतु रामफल ने कहला भेजा कि वह थोड़ी देर में आएगा। दोपहर में रामफल आया और आकर भोजन खाने बैठ गया। सेठ जोर से चीखा-”रामफल, इधर आओ, मैं आज तुम्हें नौकरी से निकालता हूं।“

रामफल भोजन खाकर हंसता हुआ आया और बोला-”सेठी जी, मेरा हरजाना दे दीजिए, मैं चला जाऊंगा। सेठ इसके लिए पहले ही तैयार था। उसने तुरंत हरजाने की सौ मौहरें रामफल को दीं और घर से निकलने का आदेश दिया।“

रामफल रकम लेकर हंसते हुए चल दिया। सेठ मोहरचन्द को क्रोध बहुत आ रहा था, परंतु तसल्ली थी कि ऐसे नौकर से छुटकारा मिल गया। उसने बाहर झांक कर देखा, रामफल एक छोटे लड़के का हाथ पकड़े अपनी पोटली लिए जा रहा था। सेठ ने ध्यान से पहचानने का प्रयास किया तो उसे समझने में देर न लगी कि वह लड़का गोटिया था। अब सेठ ने कसम खाई कि किसी से मुफ्त में चाकरी नहीं कराएगा।

Leave a comment

बेचारा कुंवर (Foolish Kunwar gets beaten by Soldiers)

Indian folk story(lok katha) of one boy names Kunwar who is beaten up by soldiers due to his foolish act.

Moral of the Story: Foolishness can be Dangerous.

Complete Story in Hindi

एक बार एक गांव में एक किसान रहता था, परिवार अत्यंत गरीब था और उनकी रोटी की गुजर बसर मुश्किल से हो पाती थी। किसान ने विवाह को आठ वर्ष हो चुके थे। परंतु उनके कोई सतांन न थीं। किसान और उसकी पत्नी का इतना दुख न था, जितना संतान न होने का।

hindi short story for kids with moralदोनों भगवान से प्रार्थना करते कि ईश्वर उन्हें एक संतान अवश्य दे, चाहे वह लड़का हो या लड़की। परंतु काफी वर्ष व्यतीत हो गए, और उनके संतान न हुई।

इसी बीच किसान के पड़ोस में एक नव विवाहित जोड़ा रहने आया। वे बहुत खुश रहते थे। एक वर्ष पश्चात् ही उनके घर में पुत्र ने जन्म लिया तो किसान और उनकी पत्नी भी उनके घर बधाई देने पहुंचे। दोनों परिवारों में खूब मित्रता हो गई थी, इस कारण किसान व पत्नी की खूब आवभगत हुई।

घर आकर रात्रि को किसान ने गणेशजी की पूजा की और प्रार्थना की कि उसे संतान प्राप्त हो। ईश्वर ने किसान की प्रार्थना सुन ली। किसान अपने पड़ोसी के पुत्र को अपने बच्चे के समान प्यार करता था, कुछ ही समय बाद उसके घर में भी बालक ने जन्म लिया।

किसान ने अपने बेटे का नाम कुवंर रखा क्योंकि उसक घर के लिए वह राजकुमार से कम न था। किसान व पत्नी अपने पुत्र को अधिक लाड़ करते थे। धीरे-धीरे कुंवर बड़ा हो रहा था। वे उसकी हर इच्छा पूरी करते थे। इस कारण वह जिद्दी होता जा रहा था। वह अपनी मर्जी से खेलता था, अपनी मर्जी से खता था। मां-बाप स्वयं परेशानी सहकर भी उसको अच्छे से अच्छा भोजन खिलाते थे।

कुंवर बेहिसाब खाने के कारण मोटा होता जा रहा था। बच्चे उसे पेटू कह कर बुलाने लगे थे। एक दिन कुंवर एक बगीचे में बहुत सारे आम तोड़ लाया। मां के मना करने पर भी उसने सारे आम खा लिए। उसी रात उसके पेट में दर्द होने लगा। रात्रि में उसे दस्त होने लगे। कुंवर की मां परेशान थी कि क्या करे ताकि कुंवर ठीक हो जाए। कुंवर का पिता किसी जरूरी काम से दो दिन के लिए पास के गांव गया ािा।

सुबह होते ही मां ने कुंवर से कहा-”पास के गांव में मूढ़ामल वैद्य जी रहते हैं। उनकी एक पुडि़या से ही फायदा हो जाता है, तू जल्दी से उनके पास चला जा। सारी परेशानी बता कर जो वह बताएं वह ध्यान से सुनकर आना। तेरे पिता जी होते तो उन्हें साथ भेज देती।“

कुंवर पेट दर्द व दस्तों कारण बेहाल हुआ जा रहा था। वह गांव की सड़क पर तेजी से चलते हुए पास के गांव में वैद्य मूढ़ामल के पास पहुंच गया। वैद्य जी कुंवर के पिता के परिचित थे, अतः उन्होंने दवाई तैयार करके कुंवर को एक पुडि़या दवा खिला दी। कुंवर को पेट दर्द व दस्तों से आराम महसूस हुआ। वैद्य जी ने घर के बाहर पड़ी चारपाई पर कुछ देर उसे आराम करने को कहा।

कुछ देर में कुंवर ने कहा-”वैद्य जी मैं घर जाना चाहता हूं। आप यह बता दें कि मैं भोजन में क्या खाऊं? ताकि जल्दी ठीक हो जाऊं।“

वैद्य जी ने कहा-”बेटा कुंवर दो दिन तक खिचड़ी के सिवा कुछ नहीं खाना है। कल को फिर आकर दवाई खा जाना। मैं तुम्हारे लिए दवाई तैयार करके रखूंगा।“

कुंवर ने खिचड़ी शब्द सुना न था, अतः फिर बोला-”क्या नाम बताया आपने, खचड़ी?“

वैद्य जी ने कहा-”तुम बस मां को जाकर बता देना कि वैद्य जी ने खिचड़ी बताई है, मां खुद बना कर खिला देगी।“

कुंवर ने पुनः पूछा-”खिचड़ी?“ वैद्य जी बोले, ”हां बाबा खिचड़ी, खिचड़ी।“ कुंवर को खिचड़ी शब्द थोड़ा मुश्किल लग रहा था। अतः वह रटते-रटते चल दिया। वह धीरे-धीरे घर की ओर जा रहा था और मुंह से बोल रहा था-”खिचड़ी-खिचड़ी।“

वह कब खिचड़ी कहते-कहते खचड़ी कहने लगा, उसे पता ही नहीं लगा। कुछ ही देर में वह खचड़ी को खाचिड़ी बोलने लगा। वह खाचिड़ी रटते हुए एक खेत के पास से गुजर रहा था कि खेत में काम करने वाले किसान ने उसे आवाज दी-”ऐं छोकरे, इधर आ, क्या बोल रहा है?“

कुंवर ने मासूमियत से जबाव दिया-”खाचिड़ी, खाचिड़ी।“

किसान गुस्से में भर कर बोला-”मैं खेत में बीज बो रहा हूं और तू बोल रहा है खा चिड़ी, खा चिड़ी। अगर चिडि़या मेरा बीज खा गई तो पौधे कहां से निकलेंगे। अगर तुझे कुछ कहना है तो बोल उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी और यहां से भाग।“

कुंवर ने दुनिया देखी न थी। पहली बार घर से निकला था। अतः घबराबर रटने लगे ”उड़ चिड़ी उड़ चिड़ी।“ वह इसी प्रकार रटता हुआ घर की ओर चल दिया। कुछ कदम ही दूर गया था कि उसने देखा, एक बहेलिया जाल फैलाए बैठा है और पक्षियों के फंसने का इंतजार कर रहा है। बहेलिए ने कुंवर को ‘उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी’ रटते देखा तो क्रोध में चिल्लाया-”ऐ लड़के, इतना मारूंगा कि सब कुछ भूल जाएगा, उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी क्या बोल रहा है? क्या तू चाहता है कि सारी चिडि़या तेरी बात सुनकर उड़ जाऐं और मेरे जाल में एक भी न फंसे।“

कुंवर भोलेपन से बोला-”मैं तो वैद्य जी के पास से आ रहा हूं, उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी, कह रहा हूं।“

”अच्छा तू ऐसे नही मानेगा, बहेलिया क्रोध में बोला। फिर बहेलिये ने कुंवर को एक थप्पड़ लगाते हुए कहा-”लड़के ऐसा बोल, आते जाओ फंसते जाओ, आते जाओ फंसते जाओ।“

बेचारा कुंवर रोते-रोते बोला-”आते जाओ, फंसते जाओ।“ फिर वह इसी प्रकार रटते हुए आगे चल दिया, वह थोड़ी ही दूर गया था कि उसे कुछ लोग इकट्टे बातें करते दिखाई दिए। वे सब चोर थे और किसी रईस के घर में चोरी की योजना बना रहे थे। तभी उधर से कुंवर उटते हुए निकला-‘आते जाओ, फंसते जाओ।’

एक चोर का ध्यान कुंवर की बात की ओर गया तो उसने फौरन बाकी चोरों का ध्यान कुंवर की रहट की और लगाया। पांचो चोरों ने सुना तो दौड़कर कुंवर को पकड़ लिया और मारने लगे। कुंवर बेचारा हैरान था कि वे सब उसे क्यों मार रहे हैं।

वह बोला-”चाचा, मैं तो अपने घर जा रहा हूं, तुम मुझे क्यों मानते हो?“

एक चोर बोला-”हम चोरी करने जा रहे हैं और तू हमें बद्दुआ दे रहा है कि हम आते जाएं और फंसते जाएं यानी एक-एक करके पकड़े जाएं। ऐसी बुरी बात तो हम अपने घर वालों की भी नहीं सुन सकते। तुझे अगर कुछ कहना ही है तो बोल-ले-ले-जाओ, रख-रख जाओ। अगर कुछ और बोला तो हम तुझें जिंदा नहीं छोड़ेगे क्या समझा?

कुंवर बोला-”कुछ नहीं समझा, आप जो कहोगे वही बोलूंगा, आप बताओ मैं क्या बोलूं।“

”तुम बोला ले-ले जाओ, रख-रख जाओ, समझे,“ एक चोर ने कहा। कुंवर बेचारा हैरान-परेशान था, वह वह रटते हुए घर की ओर चल दिया, ‘ले-ले जाओ, रख-रख जाओ’। कुंवर अभी कुछ ही दूर गया था कि उसने देखा कि कोई शव यात्रा निकल रही है। कोई जबान व्यक्ति मर गया था। रिश्तेदार व परिजन बुरी तरह रो रहे थे।

परंतु कुंवर को किसी से लेना-देना न था, वह धीरे-धीरे से वही रटता रहा जो चोरों ने बताया था। अर्थी उठाने वाले एक व्यक्ति ने कुंवर की बात सुनी तो वह क्रोध से पागल हो उठा और जोर से चिल्लाया-”पकड़़ो इस छोकरे को। देखो भागने न पाए। इसे देखो, यह क्या बक रहा है-ले-ले जाओ, रख-रख जाओ। यह हमारे लिए इतनी अशुभ बात बोल रहा है। हम क्यों किसी की अर्थी बार-बार लाएं।“ क्रोधित रिश्तेदारों ने सुना तो कुंवर से पूछने लगे कि वह क्या कह रहा है।

भोले कुंवर ने डरते-डरते बता दिया कि वह क्या बोल रहा है। रिश्तेदारों ने कुंवर को समझाया,  तुम जो बोल रहे हो, वह बहुत गलत बोल रहे हो। तुम्हें कुछ बोलना ही है तो वह बोलो-”ऐसा दिन कभी न हो, ऐसा दिन कभी न हो।“

कुंवर बेचारा मरता क्या न करता, वह यही रटता हुआ चल दिया-ऐसा दिन कभी न हो, ऐसा दिन कभी न हो। वह बेचारा डर के मारे समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ इतना बुरा क्यों हो रहा है। बचपन से आज तक उसने मां-बाप से अधिक डांट तक नहीं खाई थी। पिटाई का तो सवाल ही न था। उसने घर के आस-पास के अलावा बाहरी दुनिया देखी ही नहीं थी।

शाम ढल चुकी थी रटते-रटते वह थोड़ी ही दूर आग गया कि उसने देखा कि कोई बारात निकल रही है। वह सड़क के किनारे खड़े होकर अपनी बात रटते हुए बारात देखने लगा। उसे पता न था यह किसी राजा के बेटे की बारात निकल रही है। एक सैनिक ने सुना कि एक लड़का कुछ बोल रहा है। उसने ध्यान से सुना तो दौड़कर राजा के पास आया और उसे सारी बात बताई।

राजा को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि कोई लड़का कह रहा है कि ऐसा दिन कभी न हो। राजा ने तुरंत उस लड़के को पकड़ने का आदेश दिया। सिपाही कुंवर को पकड़कर पीटते हुए राजा के पास ले गए, कुंवर बेचारा रोने लगा।

राजा ने पूछा-”ऐ लड़कें, तुम्हें इस शादी से क्या दुख है?“

कुवंर बेचारा समझ ही न सका कि राजा ऐसा क्यों पूछ रहा है। उसने कहा-”मुझे तो इस शादी से कोई दुख नहीं है।“

राजा ने कहा-”क्या तुम नहीं जानते कि यह राजा के बेटे की बारात है और अशुभ बात बोल रहे हो कि ऐसा दिन कभी न हो।“

कुंवर ने ज्यों ही अपनी बात विस्तार से सुनानी शुरु की राजा समझ गया कि कुंवर बेचारा नादान है। उसने कुंवर से कहा-”तुम्हें यह बोलना चाहिए ऐसा दिन सभी का हो।“

कुंवर ने कहा ठीक है। तब राजा ने सिपाहियों को आदेश दिया कि कुंवर को उसके घर पहुंचा दो क्योंकि वह अपने घर का रास्ता भटक गया है।

सिपाही कुंवर को उसके घर छोड़ आए। मां सिपाहियों तथा कुंवर को देखकर हैरान-सी हो गई। कुंवर बेचारा रो रहा था, उसके बदन में पिटाई के कारण बहुत दर्द था।

कुंवर ने रोते-रोते अपनी मां को सारा हाल सुनाया, फिर पूछा-“माँ ऐसा क्यों होता है कि कोई आदमी एक बात बोलने को कहता है और दूसरा आदमी उसी बात पर मारने लगता है।“

मां ने कहा-”बेटा समय व मौके के अनुसार शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं।“

कुंवर ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मां की ओर देखा तो मां ने कहा-”सो जाओ बेटा। तुम बहुत भोले हो, इन बातों का मतलब नहीं समझ सकोगे।“

परंतु बेचारे कुंवर को बदन दर्द के मारे नींद नहीं आ रही थी। पेट-दर्द तो वह कब का भुल चुका था।

Leave a comment

कमाल का दिन (Talkative Wife, Distraught Husband)

A person finds gold one day whose news is spread all over by his talkative wife. Rest of the story is how he uses his brain to prevent gold from surrendering to the King.

Moral of the Story: Excessive Talking can be Bad.

Full Story in Hindi

खजूरी इतनी बातूनी थी कि जहां कहीं उसे कोई बात करने वाला मिल जाए, वह उसे ढेर सारी बातें सुनाए बिना नहीं छोड़ती थी। गांव में उसकी ढेरों सहेलियां थीं। उसका जब कभी बातें करने का मन करता तो कभी किसी के घर चली जाती, तो कभी किसी के घर।

hindi short story for kids with moralस्त्रियां उसकी बातें सुनकर खूब आनन्दित होती थीं। खजूरी के पास जब कोई बात सुनाने को न होती तो वह बड़ी-बड़ी गप्पें हांका करती। कभी-कभी तो वह ऐसी गप्प हांकती कि लोगों को यकीन हो जाता कि वह सच बोल रही है।

ज्यादा बातूनी होने के कारण वह अपने घर की निजी बातें भी लोगों को बता देती थी। असल में उसके पेट में कोई बात पचती ही नहीं थी। इस कारण उसे जो भी इधर-उधर की बात पता लगती, बढ़ा-चढ़ा कर दूसरों को बता आती थी। कुछ लोग तो उसकी गप्प मारने व ज्यादा बोलने की आदत से बहुत परेशान थे।

उसकी इस आदत से सबसे ज्यादा परेशान उसका पति अन्द्रेई था। वह उसे हरदम समझाता था कि कम बोला करो, घर की बातें बहार मत बताया करो। परंतु खजूरी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती थी। बातें करने के चक्कर में अक्सर उसे खाना बनाने को देर हो जाया करती थी।

कभी-कभी तो वह घर के जरूरी काम तक भूल जाती थी। शाम को जब थका हुआ अन्द्रेई खेत से लौटता तो उसे खूब डांटता। खजूरी अपनी आदत से मजबूर थी। गप्पें उसके लिए समय बिताने का सबसे अच्छा साधन थीं।

एक बार अन्द्रेई अपने खेत में हल चला रहा था। तभी उसके हल से कोई वस्तु टकराई, खन-खन की आवाज सुनकर वह चैकन्ना हो गया। उसने हाथ से थोड़ी मिट्टी खोदी तो उसे यकीन हो गया कि वहां कोई धातु की चीज गड़ी हुई है। उसने उस स्थान पर निशान लगा दिया।

वह सारे दिन चुपचाप खेत पर काम करता रहा जाकि दिन की रोशनी में कोई उसे जमीन खोदते न देख ले। जब शाम हो गई और हल्का अंधेरा होने लगा तो उसने मौका पाकर खेत में उसी स्थान पर खुदाई शुरु कर दी।

थोड़ी ही देर में जगमगाता खजाना उसके सामने था। उसे खजाने में हीरे-मोती, सोने के आभूषणों का ढेर था। वे सब एक स्वर्ण कलश में भरे हुए थे। उस खजाने को देखकर अन्द्रेई की बांछे खिल गई।

ज्यों ही अन्द्रेई वह खजाना घर ले जाने के लिए निकालने लगा त्यों ही उसे याद आया कि उसकी पत्नी को जैसे ही खजाने का पता लगेगा वह सारे शहर में ढिंढोरा पीट देगी, फिर तो खजाना राजा के पास चला जाएगा। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह खजाने का क्या करे? घर ले जाए तो पत्नी से कैसे छिपाए?

उसने खजाने को वहीं पास के जंगल में दबा दिया और मन ही मन एक योजना बनाई। फिर वह घर पहुंच गया। घर जाकर खजूरी से कहा कि आज मेरा पूरियां खाने का मन है, जरा जल्दी से बना दो।

खजूरी बोली-”आज कोई खास बात है क्या?“

”हो सकता है, कोई खुशखबरी हो। तुम्हें बाद में बताऊंगा।“ अन्द्रेई ने कहा।

सुनकर खजूरी को जोश आ गया और वह खुशखबरी जानने का बैचेन हो गई और फटाफट पूरियां बनाने लगी। अन्द्रेई चुपचाप पूरियां खाने लगा। वह एक साथ 4-5 पूरी उठाता और उसमें एक-एक पूरी स्वयं खता, बाकी चुपचाप थैले में डाल लेता। उसकी पत्नी यह देखकर भौंचक्की हुई जा रही थी कि अन्द्रेई इतनी तेजी से पूरियां खाए जा रहा है।

जब अन्द्रेई का थैला पूरियों से भर गया तो बोला अब मेरा पेट भर गया। खजूरी बोली-”अब खुशखबरी तो बताओ।“

अन्द्रेई बोला-”खुशखबरी यह है कि आज राजा के बेटे की शादी है। पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा है। मैं जगमग देखकर थोड़ी देर में लौटता हूं।“

अन्द्रेई चुपचाप थैला उठाकर चल दिया और बाजार जाकर बहुत सारी जलेबियां और मछलियां खरीद लीं, फिर अपनी योजना के अनुसार जंगल में पुरी तैयारी कर आया।

जब वह खुशी-खुशी घर लौआ तो पत्नी उसकी राह देख रही थी। उसने पत्नी के कान में फुसफसा कर कहा-”जानती हो, दूसरी बड़ी खुखखबरी क्या है?…. हमें बहुत बड़ा खजाना मिला है। जल्दी से तैयार हो जाओ। हम खजाना रात में घर लेकर आएंगे।“

खजूरी जल्दी से तैयार हो गई। कुछ ही देर में वे जंगलों से गुजर रहे थे। अचानक एक पेड़ की नीची टहनी से खजूरी के सिर पर कुछ टकराया। उसने सिर झुकाकर ऊपर की चीज पकड़ने की कोशिश की तो देखा हाथ में जलेबी थी। खजूरी जलेबी देकर हैरान रह गई। वह अन्द्रेई से बोली- ”सुनते हो जी, यहां पेड़ पर जलेबी लटकी थी, मेरे हाथ में आग गई हैं। है न कैसा आश्चर्य की बात?“

अन्द्रेई बोला-”इसमें आश्चर्य की क्या बात है? ये जलेबियों के ही पेड़ हैं, क्या तुमने जलेबी का पेड़ नहीं देखा?“

खजूरी आश्चर्यचकित होकर ऊपर देखनी लगी। उसने देखा, सभी पेड़ों पर ढेरों जलेबियां उगी हैं। वह उसमें से दो-तीन जलेबी तोड़कर आगे बढ़नी लगी तो चलते-चलते खाने लगी। वह बोली-”आज कमाल का दिन है। आज ही हमें खजाना मिला है, आज ही राजा के बेटे की शादी है, आज ही मैंने जलेबियों के पेड़ देखे हैं?“

”हां, वाकई आज कमाल का दिन है।“ अन्द्रेई ने हां में हां मिलाई।

वे जंगल में कुछ ही दूर गए थे कि खजूरी ने देखा जंगल में स्थान-स्थान पर मछलियां पड़ी थीं। वहां जमीन भी हल्की सी गीली थी। कुछ मछलियां मरी हुई थी और कुछ हिल-ढुल रही थीं। उनमें अभी जान बाकी थी।

इतने में अन्द्रेई खजूरी से बोला-”लगता है आज जंगल में मछलियों की बारिश हुई है और मजे की बात यह है कि यह बारिश अभी थोड़ी ही देर पहले हुई लगती है क्योंकि कुछ मछलियां जिंदा हैं। आज तो हम जरा जल्दी में हैं, वरना मछलियां अपने थैले में भर लेते, खाने के काम आतीं।“

खजूरी ने विस्मय से आंखे फैलाकर पूछा-” क्या कहा, मछलियों की बारिश? यह तो कमाल हो गया। वाकई आज कमाल का दिन है। मुझे एक और नई चीज देखने और सुनने को मिल रही है। मैंने तो मछलियों की बारिश के बारे मं आज तक नहीं सुना।“

”असल में तुम्हें बाहर की चीजों का पता नहीं रहता, क्योंकि तुम घर में ही रती हो। वरना तुम्हें जंगल में मछलियों की बारिश का अवश्य पता होता।“ अन्द्रेई बोला।

वे आगे बढ़ने लगे। रात का अंधियारा बढ़ता जा रहा था। कुछ ही देर में कंटीली झाडि़यों पर कोई सफेद-सी वस्तु दिखाई देने लगी। खजूरी पहले से ही आश्चर्य में डूबी हुई थी। आगे झुककर देखने लगी-“यह सफेद-सफेद गोल-सा क्या हो सकता है?“ इतने में उसने हाथ बढ़ाया और बोली-”झाड़ पर पूरियां? लगता है कि जलेबी के पेड़ की तरह जंगल में पूरियों के झाड़ भी होते हैं। अब मुझे समझ आ गया कि जंगल में कैसे अनोखे पेड़ होते हैं।“

अन्द्रेई ने कहा-”लगता है तुम्हें एक ही दिन में जंगल की सारी चीजों की अच्छी जानकारी हो गई है। तुमने पूरियों के झाड़ भी पहली बार देखे हैं न?“

”हां, सो तो है। अब आज कमाल का दिन है तो कमाल ही कमाल देखने को मिल रहे हैं। चलो, अब यह भी बताओ, खजाना कहां है?“ खजूरी बोली।

”हम खजाने के पास पहुंचने ही वाले हैं। वो देखो, पास के तालाब में किसी ने जाल बिछाया हुआ है। मैं देखता हूँ कि जाल में कुछ फंसा या यूं ही लटका हुआ है।“

अन्द्रेई ने आगे बढ़कर जाल उठा लिया। जाल देखकर खजूरी आश्चर्य से आंखे फैलाते हुए बोली-”पानी के अंदर खरगोश? यह कैसे हो सकता है। क्या जंगल में खरगोश पानी में भी रहते हैं?“

”हां, हां क्यों नहीं, सामने देखो खजाना यहीं है। अब हम खजाना निकालेंगे।“ अन्द्रेई ने रुकते हुए कहा।

एक स्थान से मिट्टी खोदकर अन्द्रेई ने सोन का कलश निकाल कर खजूरी को खजाना दिया। खजूरी की खुशी और विस्मय देखते ही बनता था।

अन्द्रेई ने चुपचाप गड्डा वापस भरा और अपने दुशाले में कलश को ढक लिया। कुछ ही देर में अन्द्रेई और खजूरी खजाना लेकर वापस घर पहुंचे। दोनों ही चल-चलकर थक गए थे। अतः दोनों ने सलाह की कि सुबह उठकर सोचंेगे कि हमें इस खजाने का क्या इंतजाम करना है, अभी सो जाते हैं।

दोनों लेटते ही सो गए। सोते ही अन्द्रेई को खजाने के बारे में बुरे-बुरे सपने आने लगे और कुछ ही देर में अन्द्रेई घबराकर उठ बैठा। उसने देखा खजाना सही-सलामत घर में रखा है और सुबह होने में देर है।

अन्द्रेई चुपचाप उठा और स्वर्ण कलाश को ढककर सुरक्षित स्थान पर रख आया, फिर चैन से सो गया।

सुबह निकले 2-3 घंटे हो चुके थे, पर अन्द्रेई सोया हुआ था। अचानक घर के बाहर शोर-शराबा सुनकर अन्द्रेई की आंख खुली।

उसने उठकर देखा, बाहर लोगों की भीड़ जमा थी। पूछने पर पता लगा कि लोग खजाना देखने आए थे। उसमें पत्नी खजूरी सुबही ही पानी भरने गई तो अपनी पड़ोसिनों को खुशखबरी सुना आई थी कि हमंे बहुत बड़ा खजाना मिला है। अतः लोग उसे बधाई देने व खजाने के दर्शन करने आए थे।

अन्द्रेई ने लोगों से कहा-”लगता है मेरी पत्नी ने सपने में कोई खजाना देखा है, जिसके बारे में उसने आप लोगों को बताया है। मुझे तो ऐसा कोई खजाना नहीं मिला।“

लोग निरश होकर लौट गए। बात फैलते-फैलते राजा तक पहुंच गई। राजा ने अन्द्रेई को बुलवा भेजा। अन्द्रेई की राजा के सामने पेशी हुई।

राजा ने पूछा-”सुना है, तुम्हें कोई बहुत बड़ा खजाना मिला है? कहां है वह खजाना?“

”हुजूर, मुझे तो ऐसा कोई खजाना नहीं मिला। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि आप क्या बात कर रहे हो?“ अन्द्रेई बोला।

”यह कैसे हो सकता है। तुम्हारी पत्नी ने स्वयं लोगों को उस खजाने के बारे में बताया है।“ राजा ने हा।

”हुजूर माफ करें मेरी पत्नी बहुत गप्पी है। आप उसकी बात का यकीन न करें।“

”नहीं, हम इस बात की परीक्षा स्वयं करेगे,“ राजा ने कहा। फिर राजा ने अन्द्रेई की पत्नी खजूरी को अगले दिन दरबार में पेश होने की आाज्ञ दी।

खजूरी खुशी-खुशी राजा के दरबार में हाजिर हो गई।

राजा ने पूछा-” सुना है कि तुम्हें कोई बड़ा खजाना मिला है।“

”जी माई बाप, आप सही फरमा रहे हैं। हमें वह खजाना 2-3 दिन पहले मिला था।“ खजूरी बोली।

राजा ने पूछा-”तुम्हें वह खजाना कंहा मिला, जरा विस्तार से बताओ?“

खजूरी आत्मविश्वास से भर कर बोली-”हुजुर, उस दिन कमाल का दिन था, परसों की ही बात है। हुजूर उस दिन राजा के यानी आपके बेटे की शादी भी थी। मेरे पति शहर की जगमग देखने गए थे।“

राजा एकदम चुप हो गया, फिर बोला-”मेरा तो कोई शादी लायक बेटा नहीं है। मेरा बेटा तो सिर्फ चार वर्ष का है। तुम्हें ठीक से तो याद है न? जरा सोच-समझ कर बोलो?

खजूरी बोली-”साहब, हम उसी रात को खजाना लेने गए थे, उस दिन कमाल का दिन था। मै।ने उस दिन पहली बार जलेबियों के पेड़ देख। बहुत सारी जलेबियां तोड़कर खाई भी।“

राजा आश्चर्य से खजूरी को देख रहा था-”जलेबियों के पेड़?“

”हुजूर, उस कमाल क दिन मैंने मछलियों की बरसात देखी, पानी में रहने वाले खरगोश को देखा और…।“

राजा ने कहा-”लगता है यह कोई पागल औरत है। इसे यहां से ले जाओ।“

जब राजा के सैनिक उसे बाहर ले जाने लगे तो खजूरी चिल्लाकर कहने लगी।

”मैं सच कहती हूँ कि हमें सोने के कलश में खजाना मिला था, उस दिन कमाल का दिन था। मैंने पूरियों के झाड़ भी उसी दिन देखे थे।“

राजा ने सैनिकों को खजूरी को बाहर निकाल दिया। अन्द्रेई बोला-”हुजूर, मैं न कहता था कि मेरी पत्नी की बातों का विश्वास न करें।“

राजा ने अन्द्रेई को छोड़ दिया। अपने दौ सैनिकों को अगले दिन अन्द्रेई के घर भेजा। उन्होंने खजूरी से पूछा-”अच्छा यह बताओ कि घर में खजाना कहां रखा है।“

खजूरी दौड़कर उसी कोने में गई जहां उन्होंने खजाना रखा था। परंतु वहां कोई खजाना न था। वह इधर-उधर देखती रही, परंतु उसे कोई खजाना न मिला। राजा के सिपाही वापस लौट गए।

अन्द्रेई ने खैर मनाई कि उसकी चतुराई से उसका खजाना बच गया था। वे दोनों सुख से रहने लगे। फिर खजूरी ने भी गप्प मारना व ज्यादा बातें करना छोड़ दिया।

Leave a comment

जैसे को तैसा (Clever friend taught a nice lesson)

Egyptian folk tale of two friends, in which one cleverly puts the other in a less profit making share of their farming work. The rest of the story follows how the clever friend is taught a lesson by the wife of other friend.

Complete Story in Hindi

सिमकी का गरीबी के मारे बुरा हाल था। उसके घर में कई-कई दिन तक भोजन नसीब नहीं होता था। उसकी पत्नी रोजिया उसे रोज समझाती कि समझ और मेहनत से काम किया करो, परंतु सिमकी बहुत सीधा-साधा, भोला-भाला मासूम था। इसी कारण हर जगह धोखा खा जाता था। कहीं सीधेपन के कारण उससे भूल हो जाती तो कभी कोई उसे धोखा दे देता, जिससे उसे अपनी मजदूरी तक पूरी नहीं मिलती थी।

short story for kids with moralएक दिन सिमकी की पत्नी ने समझाया कि क्यों न तुम अपने मित्र फाजरी के पास जाकर कोई काम मांगो। कम से कम वह धोखा तो न देगा। उसके पास ढेर सारी जमीन, घोड़े, बैल हैं। वह तुम्हें खेतों का या जानवर देखने का काम अवश्य दे देगा। फिर हमेें हर महीने गुजारे लायक कुछ न कुछ अवश्य मिल जाएगा।

अपनी पत्नी की सलाह मानकर सिमकी फाजरी के पास पहुंच गया। फाजरी बहुत चालाक और और स्वार्थी बन चुका था। फिर भी अपनापन दिखाते हुए सिमकी से बोला-’’ठीक है। अपने एक खेत की जिम्मेदारी हम तुम्हें दे देते हैं। इस पर सारी खेती तुम करोगे। जो भी फसल होगी, आधी तुम्हारी आधी मेरी।

सिमकी खुश हो गया। अपने घर जाकर खुशखबरी अपनी पत्नी रोजिया को सुनाई। पत्नी खुश हो गई और सोचने लगी-अब हमारे दिन बदल जाएंगे। हमें पैसे की कमी नहीं रहेगी।

अगले दिन सिमकी फाजरी के पास काम के लिए पहुंच गया। फाजरी ने अपना खेत दिखाते हुए कहा कि इसी खेत पर तुम्हें मेहनत से खेती करनी है। खाद, बीज सब मैं दूंगा। तुम्हारे घर खर्च को कुछ धन भी दे दूंगा परंतु जब फसल होने लगेगी तो आधी मेरी होगी और आधी तुम्हारी।

सिमकी ने कहा-’’ठीक है सौदा तय रहा।

सिमकी ने अगले दिन से मेहनत से काम करना शुरु कर दीया। उसने फाजरी के दिए हुए बीज धरती में बो दिए। कुछ ही दिन में पौधे निकल आए। खेत हरा भरा हो उठा। अब सिमकी खूब मेहनत से काम करता और सोचता कि फसल कटने पर क्या-क्या खरीदूंगा। आखिरकार फसल तैयार हो गई। भोला सिमकी अपने मित्र की चालाकी अभी तक नहीें भांप सका था। फसल कटने के वक्त फाजरी भी खेत पर आ गया था। शर्त के मुताबिक फसल का ऊपरी भाग सिमकी को मिलना था, व जमीन के नीचे का भाग फाजरी को मिलना था। फाजरी ने चालाकी की थी, और शलगम की फसल बोई थी। फसल काटकर दो बैलगाडि़यों में भर दी गई।

फाजरी शलगम लेकर बाजार चला गया। वहां उसकी फसल खूब अच्छे दामों पर बिकी।

सिमकी बैलगाड़ी में अपनी फसल भर कर बाजार पहुंचा तो शलगम के पत्तों को खरीदने बाला कोई न था। जानवरों का चारा खरीदने वालों ने थोड़े बहुत पत्ते खरीद लिए। शाम तक पत्ते सूखने-सड़ने लगे।

बेचारा सिमकी दुखी होते हुए घर पहुंचा। पत्नी को सारी बात विस्तार से सुनाई। वह फाजरी की चालाकी पर मन ही मन क्रोधित हो रही थी परंतु वह कुछ कर नहीं सकती थी। आखिर सिमकी इतना सीधा था कि समझााने से बात नहीं बन सकती थी।

थोड़े दिन बाद जब वह पुनः फाजरी के खेत पर काम करने लग गया तो उसने पुनः यही शर्त रखी कि आधी फसल तुम्हारी और आधी मेरी। सिमकी ने कहा मुझे इस बार नीचे की फसल चाहिए। फाजरी मान गया।

वह पहले की भांति फाजरी के दिए बीज खेत पर बो आया और खूब मेहनत से खेती करने लगा। जब फसल पक कर तैयार हुई तो उसे पता लगा कि यह तो गेहूं की फसल है। परंतु वह कुछ नहीं कर सकता था। शर्त के अनुसार फाजरी ने फसल का ऊपरी हिस्सा यानी गेहूं की बालियां ले लीं और उसकी नीचे की शाखाएं सिमकी को दे दीं। सिमकी को इस बार भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा।

सिमकी ने सूखी डालियों का कुटवा कर भूसा बनवाकर बाजार में बेच दिया। परंतु फाजरी गेहूं बेचकर मालामाल हो गया।

फाजरी की चतुराई सुनकर सिमकी की पत्नी रोजिया से न रहा गया। उसने चाल चलने की सोची और योजना बना डाली। इस बार सिमकी के साथ रोजिया भी फाजरी के पास गई। वहां पहले की भांति खेती पर आधी-आधी फसल की बात तय हुई।

सिमकी ने इस बार नीचे की फसल चुनी। पत्नी चाहती थी कि शर्तें उसी के सामने पक्की हो। अतः सारी शर्तें लिखित में पक्की हो गईं।

इसके बाद सिमकी अपनी पत्नी के साथ फाजरी के गोदाम से बीज लेने पहुंचा। पत्नी ने उनके लिए बीज का बोरा बदल कर दूसरे बीज का बोरा ले दिया और खेत में जाकर बो दिया।

हमेशा कि भांति फाजरी इस बार भी खेतों की गुड़ाई -बुबाई देखने नहीें आया। सिमकी ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर खेती करनी शुरु कर दी। दिन-रात मेहनत करके ये दोनों खेतों में लगे रहते। उनकी मेहनत रंग लाई।

फसल पकने पर फाजरी बड़ी खुशी और घमंड के साथ खेत पर आया तो हरी भरी लहलहाती फसल देखकर खुशी से नाच उठा। परंतु जब फाजरी के मुंशी ने  उसके कान में फूंक कर कहा कि इस बार तो सिमकी की नीचेे की फसल है, तो फाजरी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

फाजरी समझ नहीं पा रहा था कि इस बार धान की फसल के बदले आलू की फसल कैसे बन गई। परन्तु सबके सामने कुछ नहीं बोल सका। सामने ही सिमकी की पत्नी भी खड़ी मुस्करा रही थी।

फिर फसल की कटाई शुरु हुई। शर्त के अनुसार फसल दो जगह लादी जाने लगी। इस बार फसल ज्यादा हुई थी। इस कारण बैलगाड़ी की जगह फसल को ट्रक में लादा जा रहा था। एक ट्रक में आलू लादे जा रहे थे तो दूसरी तरफ इसके पौधे। सिमकी अपनी आलू की फसल लेकर मंडी में पहुंचा तो बहुत अच्छे दामों पर फसल बेच दी।

सिमकी के साथ उसकी पत्नी भी गई थी। दोनों फसल बेचकर खुशी-खुशी घर लौटे। उधर, फाजरी के आलू के पौधे मंडी पहुंचते-पहुंचते सूख चुके थे, अतः उन्हें जानवरों के चारे के लिए भी कोई खरीदने वाला न था। उसको पहली बार ऐसा झटका मिला था। इस बार जैसे को तैसा मिला था। वह मन ही मन क्रोध से जला जा रहा था।

उसने मन ही मन निश्चय किया कि अगली फसल में वह बदला जरुर निकालेगा। उसने अपने नौकर के हाथ सिमकी के यहां खबर भिजवाई कि अगली फसल के लिए वह सिमकी का इंतजार कर रहा है।

सिमकी की पत्नी रोजिया ने कहला भेजा कि हमने आधी फसल का सौदा करना बंद कर कर दिया है।

इस बार फसल बेचकर मिली रकम से सिमकी और रोजिया ने मिलकर छोटा-सा खेत खरीदा और उस पर मेहनत करके सुख से रहने लगे।

उधर, फाजरी ने सुना तो पछताकर हाथ मलता रह गया।

Leave a comment

करामाती दाना (Greediness is a curse)

One day a beggar gets nothing to eat except one wheat grain by an elderly lady. It turns his fortune and he starts getting good food from next day. It all ends when he becomes greedy.

Moral of the Story: Greediness is a curse

Complete Story in Hindi

बहुत पहले की बात है। एक भिखारी सड़क के किनारे रहा करता था। उसका न तो कोई रहने का ठिकाना था और न ही कमाई का कोई निश्चित जरिया।

hindi children stories with moralवह कंधे पर एक झोला लटकाए सुबह से शाम तक भीख मांगा करता था। कहीं से उसे रोटी मिल जाती तो दूसरी जगह से सब्जी मांग कर पेट भर लेता था। लोग उसे बैगी कह कर पुकारते थे।

एक दिन वैगी को सुबह से शाम तक कुछ भी खाने को नहीं मिला। उसका भूख के मारे बुरा हाल था। वह परेशान होकर इधर-उधर घूम रहा था। तभी एक बूढ़ी स्त्री ने उसे अपनेे पास बुलाया और उसकी परेशानी का कारण पूछा।

स्त्री ने वैगी को एक गेहूं का दाना देते हुए कहा-’’यह गेहूं का दाना करामाती है, इसे अपने पास संभाल कर रखना। जब तक यह दाना तुम्हारे पास रहेगा तुम्हें भोजन की कमी नहीं होगी।“

बैगी दोने को उलट-पलट कर देखने लगा, फिर उसने सिर उठाकर स्त्री से कुछ पूछना चाहा, परंतु तब तक स्त्री गायब हो चुकी थी।

वैगी दाने को अपने थैले में डालकर भोजन की तलाश में पास के एक होटल की तरफ से गुजर रहा था। तभी एक व्यक्ति ने उसे रोककर कहा-”तुम यहां आकर पेट कर भोजन खा सकते हो। यहां आज हमारे सेठ जी का जन्मदिन मनाया जा रहा है।“

वैगी मन ही मन बहुत खुश हुआ और होटल से पेट भर खाना खाकर बाहर निकला। वह सोचने लगा कि यह गेहूं के दाने की करामात है या केवल एक संयोग कि उसे मुफ्त में पेट भर भोजन मिल गया।

अगले दिन वह घूमते-घूमते थक गया तो भोजन के लिए एक घर पर पहुंच गया। वहां उसने दरवाजे पर दस्तक दीं। एक सभ्य व पढ़ी लिखी स्त्री ने उसे आदरपूर्वक भीतर बुलाया और कहा-”आप यहां रात्रि को विश्राम कर सकते हैं। पहने आप भोजन कर लीजिए।“

वैगी को अब यकीन हो गया कि गेहूं का दाना वाकई करामाती है। उसने पेट भर भोजन किया और फिर सोने जाने लगा। तभी उसे शिष्टाचार की बात याद आई तो उसने अपने थैले से अपना चाकू व प्लेट निकालकर मेजबान स्त्री को दे दी। फिर उसने गेहूं का दाना स्त्री को देते हुए कहा-’’मैडम, यह दाना मेरे लिए बहुत कीमती है, इसे संभाल कर रख लीजिए। सुबह को जाते वक्त यह दाना मैं आपसे ले लूंगा।“

मेजबान स्त्री ने गेहूं का दाना संभाल कर मेज पर रखी प्लेट में रख दिया और सोने चली गई।

प्रतिदिन की भांति स्त्री सुबह को जल्दी उठ गई और अपनी मुर्गियों को बाड़े में दाना खिलाने लगी। फिर अपनी रसोई में काम करने चली गई।

तभी एक मुर्गी खुले दरवाजे से कमरे के भीतर आकर जमीन से बचा-खुचा खाना उठा कर खाने लगी। इसी बीच बैगी की आंख खुली। उसने देखा कि एक मुर्गी कमरे में घूम रही है।

वैगी तुरंत मुर्गी के पीछे दौड़ा। मुर्गी बचने के लिए मेज पर चढ़ कर बैठ गई। उसने प्लेट में गेहूं का दाना देखा तो झट से खा गई। जब तक वैगी मुर्गी को पकड़ता, मुर्गी दाना खा चुकी थी।

वैगी ने शोर मचाना शुरु कर दिया। घर के सभी लोग जाग गए। घर का मालिक बहुत ही ईमानदार व शरीफ इंसान था। वह पूछने लगा-”आप हमारे मेहमान हैं क्या बात हो गई, जिससे आप इतने नाराज हैं ?“

वैगी बोला- ”मैने मैडम को कह दिया था कि मेरा गेहूं का दाना संभाल कर रखिएगा, पर उन्होंने मेज पर रख दिया, उसे आपकी मुर्गी खा गई, मुझे वही गेहूं का दाना चाहिये।“

मेजबान लोग यह तो जानते नहीं थे, कि उस दाने में क्या खासियत थी। वे खुशामद करने लगे कि आप जितने गेहूं चाहें ले जा सकते हैं। वह स्त्री एक कटोरी भर गेहूं ले आई, परंतु वैगी रोने लगा कि उसे वही दाना चाहिए। मेजबान ने कहा-’’वह दाना तो मुर्गी के पेट में जा चुका है। आप चाहें तो उस मुर्गी का ले जा सकते हैं।“

वैगी को बात जंच गई। उसने वह मुर्गी लेकर अपने थैले मैं डाल ली और वहां से चल दिया। सारा दिन इधर-उधर घूमने के बाद वह शाम को एक घर के सामने पहुंचा। वहां भी उसको आदरपूर्वक भीतर बुलाया गया और स्वादिष्ट पकवान खिलाए गए।

वैगी ने मकान की मालिकिन को मुर्गी और थैला संभाल कर रखने को दे दिया और सो गया। सुबह उठ कर बैगी ने मालिकिन से अपनी मुर्गी मांगी। मालिकिन मुर्गी लेने गई तो देखा कि वैगी की मुर्गी के पंख बिखरे पड़े हैं।

मालिकिन के नौकर ने बताया कि नई मुर्गी देखकर मालिकिन की मुर्गियां ने बाड़े में उस पर आक्रमण कर दिया और अपनी चोंचें मार-मार कर लहूलुहान कर दिया था। इससे वैगी की मुर्गी जान बचाने के लिए बाहर भागी थी। बरामदे में ही मालिकिन का कुत्ता बैठा था जो मुर्गी को मार कर खा गया। वैगी रोने चिल्लाने लगा कि उसे अपनी वही मुर्गी चाहिए।

मालिकिन की समझ में नहीं आ रहा था कि वैगी को कैसे शांत कराए। उसने विनती करते हुए कहा कि आप उसके बदले में कोई-सी मुर्गी ले जा सकते हैं परंतु वैगी नहीं माना। तब मालिकिन ने हार कर अपना पालतू कुत्ता वैगी को दे दिया।

वैगी ने उस कुत्ते को अपने थैले में डाल लिया और आगे चल दिया। आगे जाकर वह एक शानदार बंगले के आगे रुका। बंगले में राजकुमारी उपने परिवार के साथ रहती थी। बंगले की मालिकिन ने वैगी को भीतर बुलाया। नहला-धुला कर कपडे़ दिए, फिर पेट भर भोजन खाने को दिया।

बंगले मे रहने वाली राजकुमारी को देखकर वैगी के दिल में लालच आ गया। वह सोचने लगा कि एक गेहूं के दाने की करामात के कारण उसे मुर्गी और फिर मालिकिन का प्यारा मुत्ता मिल गया। यदि किसी तरह यह कुत्ता मर जाये तो बदले में राजकुमारी को मांग लूं और उससे विवाह कर लूं, फिर मेरा जीवन सुखमय हो जाएगा।

वैगी ने जानबूझकर कुत्ते को राजकुमारी के पीछे लगा दिया। जब राजकुमारी अपनी सखियांे के साथ बगीचे में खेल रही थी, तभी कुत्ता जोर से राजकुमारी पर झपट पड़ा। राजकुमारी ने अपने बचाव में एक बडा पत्थर कुत्ते को दे मारा। कुत्ते को चोट लगी, पर कुत्ता फिर उठकर राजकुमारी के पीछे भागा। इस बार राजकुमारी ने क्रोध में आकर कुत्ते पर डंडे से बार कर दिया। कुत्ता वहीं मर कर ढेर हो गया।

वैगी जब बंगले से बाहर जाने लगा तो उसने बंगले की मालिकिन से अपना कुत्ता मांगा। परंतु मालिकिन ने सकुचाते हुए कुत्ते के मरने का सारा किस्सा बयान कर दिया।

बैगी जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि उसे अपना ही कुत्ता चाहिए। बंगले की मालिकिन ने असमर्थता प्रकट कर दी। वैगी बोला-”जिसने मेरे कुत्ते को मारा है, मुझे वही दे दीजिए, मैं उसी से संतुष्ट हो जाऊंगा।“

मालिकिन को बैगी की बात सुनकर बहुत क्रोध आया कि एक आदमी कुत्ते के बदले उनकी बेटी मांग रहा था।

मालिकिन ने कहा-“तुम्हें मैं एक हजार मोहरें देती हूं । यदि तुममें कोई हुनर है या किसी कला में निपुण हो तो इन्हें एक महीने में अपनी कमाई से दोगुना कर लाओ। यदि तुम यह कर सके तो अपनी बेटी का हाथ तुम्हें दे दूंगी।“

वैगी को धन का लालच आ गया और मोहरें लेने को तैयार हो गया। उसने मोहरें लेकर अपने थैले में डाल दीं और चल दिया।

रास्ते में वैगी ऊंचे-ऊंचे सपने देखने लगा। परंतु वह यह समझ नहीं पा रहा था वह किस तरह का व्यापार करके इन मोहरों को दुगुना करे। वैगी को भीख मांगने के सिवा कुछ काम नहीं आता था। भीख मांग कर एक महीने में तो क्या एक वर्ष में भी इतनी मोहरें कमाना संभव नहीं होगा।

तभी वैगी ने सोचा कि वह पहले कुछ मोहरें खर्च करके आराम से जीवन बिताएगा। फिर बाद में कमाई के बारे में सोचेगा।

रास्ते में एक जगह रुक कर वैगी ने मोहर निकालने के लिए थैले में हाथ डाला तो उसे यूं लगा कि हाथ में कुछ चुुभ गया हो। उसने तुरंत हाथ बाहर निकाल लिया। उसने थैला खोल कर देखना चाहा तो सैकड़ांे कीडे़-मकौडे़ उड़कर उसे काटने लगे।

वैगी ने थैला उठाकर दूर नदी में फेंक दिया। वैगी खाली हाथ रह गया। अब उसके सामने भीख मांगने के सिवा कोई चारा नहीं था। उसे लालच का फल मिल गया था।

Leave a comment