बेचारा कुंवर (Foolish Kunwar gets beaten by Soldiers)

Indian folk story(lok katha) of one boy names Kunwar who is beaten up by soldiers due to his foolish act.

Moral of the Story: Foolishness can be Dangerous.

Complete Story in Hindi

एक बार एक गांव में एक किसान रहता था, परिवार अत्यंत गरीब था और उनकी रोटी की गुजर बसर मुश्किल से हो पाती थी। किसान ने विवाह को आठ वर्ष हो चुके थे। परंतु उनके कोई सतांन न थीं। किसान और उसकी पत्नी का इतना दुख न था, जितना संतान न होने का।

hindi short story for kids with moralदोनों भगवान से प्रार्थना करते कि ईश्वर उन्हें एक संतान अवश्य दे, चाहे वह लड़का हो या लड़की। परंतु काफी वर्ष व्यतीत हो गए, और उनके संतान न हुई।

इसी बीच किसान के पड़ोस में एक नव विवाहित जोड़ा रहने आया। वे बहुत खुश रहते थे। एक वर्ष पश्चात् ही उनके घर में पुत्र ने जन्म लिया तो किसान और उनकी पत्नी भी उनके घर बधाई देने पहुंचे। दोनों परिवारों में खूब मित्रता हो गई थी, इस कारण किसान व पत्नी की खूब आवभगत हुई।

घर आकर रात्रि को किसान ने गणेशजी की पूजा की और प्रार्थना की कि उसे संतान प्राप्त हो। ईश्वर ने किसान की प्रार्थना सुन ली। किसान अपने पड़ोसी के पुत्र को अपने बच्चे के समान प्यार करता था, कुछ ही समय बाद उसके घर में भी बालक ने जन्म लिया।

किसान ने अपने बेटे का नाम कुवंर रखा क्योंकि उसक घर के लिए वह राजकुमार से कम न था। किसान व पत्नी अपने पुत्र को अधिक लाड़ करते थे। धीरे-धीरे कुंवर बड़ा हो रहा था। वे उसकी हर इच्छा पूरी करते थे। इस कारण वह जिद्दी होता जा रहा था। वह अपनी मर्जी से खेलता था, अपनी मर्जी से खता था। मां-बाप स्वयं परेशानी सहकर भी उसको अच्छे से अच्छा भोजन खिलाते थे।

कुंवर बेहिसाब खाने के कारण मोटा होता जा रहा था। बच्चे उसे पेटू कह कर बुलाने लगे थे। एक दिन कुंवर एक बगीचे में बहुत सारे आम तोड़ लाया। मां के मना करने पर भी उसने सारे आम खा लिए। उसी रात उसके पेट में दर्द होने लगा। रात्रि में उसे दस्त होने लगे। कुंवर की मां परेशान थी कि क्या करे ताकि कुंवर ठीक हो जाए। कुंवर का पिता किसी जरूरी काम से दो दिन के लिए पास के गांव गया ािा।

सुबह होते ही मां ने कुंवर से कहा-”पास के गांव में मूढ़ामल वैद्य जी रहते हैं। उनकी एक पुडि़या से ही फायदा हो जाता है, तू जल्दी से उनके पास चला जा। सारी परेशानी बता कर जो वह बताएं वह ध्यान से सुनकर आना। तेरे पिता जी होते तो उन्हें साथ भेज देती।“

कुंवर पेट दर्द व दस्तों कारण बेहाल हुआ जा रहा था। वह गांव की सड़क पर तेजी से चलते हुए पास के गांव में वैद्य मूढ़ामल के पास पहुंच गया। वैद्य जी कुंवर के पिता के परिचित थे, अतः उन्होंने दवाई तैयार करके कुंवर को एक पुडि़या दवा खिला दी। कुंवर को पेट दर्द व दस्तों से आराम महसूस हुआ। वैद्य जी ने घर के बाहर पड़ी चारपाई पर कुछ देर उसे आराम करने को कहा।

कुछ देर में कुंवर ने कहा-”वैद्य जी मैं घर जाना चाहता हूं। आप यह बता दें कि मैं भोजन में क्या खाऊं? ताकि जल्दी ठीक हो जाऊं।“

वैद्य जी ने कहा-”बेटा कुंवर दो दिन तक खिचड़ी के सिवा कुछ नहीं खाना है। कल को फिर आकर दवाई खा जाना। मैं तुम्हारे लिए दवाई तैयार करके रखूंगा।“

कुंवर ने खिचड़ी शब्द सुना न था, अतः फिर बोला-”क्या नाम बताया आपने, खचड़ी?“

वैद्य जी ने कहा-”तुम बस मां को जाकर बता देना कि वैद्य जी ने खिचड़ी बताई है, मां खुद बना कर खिला देगी।“

कुंवर ने पुनः पूछा-”खिचड़ी?“ वैद्य जी बोले, ”हां बाबा खिचड़ी, खिचड़ी।“ कुंवर को खिचड़ी शब्द थोड़ा मुश्किल लग रहा था। अतः वह रटते-रटते चल दिया। वह धीरे-धीरे घर की ओर जा रहा था और मुंह से बोल रहा था-”खिचड़ी-खिचड़ी।“

वह कब खिचड़ी कहते-कहते खचड़ी कहने लगा, उसे पता ही नहीं लगा। कुछ ही देर में वह खचड़ी को खाचिड़ी बोलने लगा। वह खाचिड़ी रटते हुए एक खेत के पास से गुजर रहा था कि खेत में काम करने वाले किसान ने उसे आवाज दी-”ऐं छोकरे, इधर आ, क्या बोल रहा है?“

कुंवर ने मासूमियत से जबाव दिया-”खाचिड़ी, खाचिड़ी।“

किसान गुस्से में भर कर बोला-”मैं खेत में बीज बो रहा हूं और तू बोल रहा है खा चिड़ी, खा चिड़ी। अगर चिडि़या मेरा बीज खा गई तो पौधे कहां से निकलेंगे। अगर तुझे कुछ कहना है तो बोल उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी और यहां से भाग।“

कुंवर ने दुनिया देखी न थी। पहली बार घर से निकला था। अतः घबराबर रटने लगे ”उड़ चिड़ी उड़ चिड़ी।“ वह इसी प्रकार रटता हुआ घर की ओर चल दिया। कुछ कदम ही दूर गया था कि उसने देखा, एक बहेलिया जाल फैलाए बैठा है और पक्षियों के फंसने का इंतजार कर रहा है। बहेलिए ने कुंवर को ‘उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी’ रटते देखा तो क्रोध में चिल्लाया-”ऐ लड़के, इतना मारूंगा कि सब कुछ भूल जाएगा, उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी क्या बोल रहा है? क्या तू चाहता है कि सारी चिडि़या तेरी बात सुनकर उड़ जाऐं और मेरे जाल में एक भी न फंसे।“

कुंवर भोलेपन से बोला-”मैं तो वैद्य जी के पास से आ रहा हूं, उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी, कह रहा हूं।“

”अच्छा तू ऐसे नही मानेगा, बहेलिया क्रोध में बोला। फिर बहेलिये ने कुंवर को एक थप्पड़ लगाते हुए कहा-”लड़के ऐसा बोल, आते जाओ फंसते जाओ, आते जाओ फंसते जाओ।“

बेचारा कुंवर रोते-रोते बोला-”आते जाओ, फंसते जाओ।“ फिर वह इसी प्रकार रटते हुए आगे चल दिया, वह थोड़ी ही दूर गया था कि उसे कुछ लोग इकट्टे बातें करते दिखाई दिए। वे सब चोर थे और किसी रईस के घर में चोरी की योजना बना रहे थे। तभी उधर से कुंवर उटते हुए निकला-‘आते जाओ, फंसते जाओ।’

एक चोर का ध्यान कुंवर की बात की ओर गया तो उसने फौरन बाकी चोरों का ध्यान कुंवर की रहट की और लगाया। पांचो चोरों ने सुना तो दौड़कर कुंवर को पकड़ लिया और मारने लगे। कुंवर बेचारा हैरान था कि वे सब उसे क्यों मार रहे हैं।

वह बोला-”चाचा, मैं तो अपने घर जा रहा हूं, तुम मुझे क्यों मानते हो?“

एक चोर बोला-”हम चोरी करने जा रहे हैं और तू हमें बद्दुआ दे रहा है कि हम आते जाएं और फंसते जाएं यानी एक-एक करके पकड़े जाएं। ऐसी बुरी बात तो हम अपने घर वालों की भी नहीं सुन सकते। तुझे अगर कुछ कहना ही है तो बोल-ले-ले-जाओ, रख-रख जाओ। अगर कुछ और बोला तो हम तुझें जिंदा नहीं छोड़ेगे क्या समझा?

कुंवर बोला-”कुछ नहीं समझा, आप जो कहोगे वही बोलूंगा, आप बताओ मैं क्या बोलूं।“

”तुम बोला ले-ले जाओ, रख-रख जाओ, समझे,“ एक चोर ने कहा। कुंवर बेचारा हैरान-परेशान था, वह वह रटते हुए घर की ओर चल दिया, ‘ले-ले जाओ, रख-रख जाओ’। कुंवर अभी कुछ ही दूर गया था कि उसने देखा कि कोई शव यात्रा निकल रही है। कोई जबान व्यक्ति मर गया था। रिश्तेदार व परिजन बुरी तरह रो रहे थे।

परंतु कुंवर को किसी से लेना-देना न था, वह धीरे-धीरे से वही रटता रहा जो चोरों ने बताया था। अर्थी उठाने वाले एक व्यक्ति ने कुंवर की बात सुनी तो वह क्रोध से पागल हो उठा और जोर से चिल्लाया-”पकड़़ो इस छोकरे को। देखो भागने न पाए। इसे देखो, यह क्या बक रहा है-ले-ले जाओ, रख-रख जाओ। यह हमारे लिए इतनी अशुभ बात बोल रहा है। हम क्यों किसी की अर्थी बार-बार लाएं।“ क्रोधित रिश्तेदारों ने सुना तो कुंवर से पूछने लगे कि वह क्या कह रहा है।

भोले कुंवर ने डरते-डरते बता दिया कि वह क्या बोल रहा है। रिश्तेदारों ने कुंवर को समझाया,  तुम जो बोल रहे हो, वह बहुत गलत बोल रहे हो। तुम्हें कुछ बोलना ही है तो वह बोलो-”ऐसा दिन कभी न हो, ऐसा दिन कभी न हो।“

कुंवर बेचारा मरता क्या न करता, वह यही रटता हुआ चल दिया-ऐसा दिन कभी न हो, ऐसा दिन कभी न हो। वह बेचारा डर के मारे समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ इतना बुरा क्यों हो रहा है। बचपन से आज तक उसने मां-बाप से अधिक डांट तक नहीं खाई थी। पिटाई का तो सवाल ही न था। उसने घर के आस-पास के अलावा बाहरी दुनिया देखी ही नहीं थी।

शाम ढल चुकी थी रटते-रटते वह थोड़ी ही दूर आग गया कि उसने देखा कि कोई बारात निकल रही है। वह सड़क के किनारे खड़े होकर अपनी बात रटते हुए बारात देखने लगा। उसे पता न था यह किसी राजा के बेटे की बारात निकल रही है। एक सैनिक ने सुना कि एक लड़का कुछ बोल रहा है। उसने ध्यान से सुना तो दौड़कर राजा के पास आया और उसे सारी बात बताई।

राजा को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि कोई लड़का कह रहा है कि ऐसा दिन कभी न हो। राजा ने तुरंत उस लड़के को पकड़ने का आदेश दिया। सिपाही कुंवर को पकड़कर पीटते हुए राजा के पास ले गए, कुंवर बेचारा रोने लगा।

राजा ने पूछा-”ऐ लड़कें, तुम्हें इस शादी से क्या दुख है?“

कुवंर बेचारा समझ ही न सका कि राजा ऐसा क्यों पूछ रहा है। उसने कहा-”मुझे तो इस शादी से कोई दुख नहीं है।“

राजा ने कहा-”क्या तुम नहीं जानते कि यह राजा के बेटे की बारात है और अशुभ बात बोल रहे हो कि ऐसा दिन कभी न हो।“

कुंवर ने ज्यों ही अपनी बात विस्तार से सुनानी शुरु की राजा समझ गया कि कुंवर बेचारा नादान है। उसने कुंवर से कहा-”तुम्हें यह बोलना चाहिए ऐसा दिन सभी का हो।“

कुंवर ने कहा ठीक है। तब राजा ने सिपाहियों को आदेश दिया कि कुंवर को उसके घर पहुंचा दो क्योंकि वह अपने घर का रास्ता भटक गया है।

सिपाही कुंवर को उसके घर छोड़ आए। मां सिपाहियों तथा कुंवर को देखकर हैरान-सी हो गई। कुंवर बेचारा रो रहा था, उसके बदन में पिटाई के कारण बहुत दर्द था।

कुंवर ने रोते-रोते अपनी मां को सारा हाल सुनाया, फिर पूछा-“माँ ऐसा क्यों होता है कि कोई आदमी एक बात बोलने को कहता है और दूसरा आदमी उसी बात पर मारने लगता है।“

मां ने कहा-”बेटा समय व मौके के अनुसार शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं।“

कुंवर ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मां की ओर देखा तो मां ने कहा-”सो जाओ बेटा। तुम बहुत भोले हो, इन बातों का मतलब नहीं समझ सकोगे।“

परंतु बेचारे कुंवर को बदन दर्द के मारे नींद नहीं आ रही थी। पेट-दर्द तो वह कब का भुल चुका था।

कमाल का दिन (Talkative Wife, Distraught Husband)

A person finds gold one day whose news is spread all over by his talkative wife. Rest of the story is how he uses his brain to prevent gold from surrendering to the King.

Moral of the Story: Excessive Talking can be Bad.

Full Story in Hindi

खजूरी इतनी बातूनी थी कि जहां कहीं उसे कोई बात करने वाला मिल जाए, वह उसे ढेर सारी बातें सुनाए बिना नहीं छोड़ती थी। गांव में उसकी ढेरों सहेलियां थीं। उसका जब कभी बातें करने का मन करता तो कभी किसी के घर चली जाती, तो कभी किसी के घर।

hindi short story for kids with moralस्त्रियां उसकी बातें सुनकर खूब आनन्दित होती थीं। खजूरी के पास जब कोई बात सुनाने को न होती तो वह बड़ी-बड़ी गप्पें हांका करती। कभी-कभी तो वह ऐसी गप्प हांकती कि लोगों को यकीन हो जाता कि वह सच बोल रही है।

ज्यादा बातूनी होने के कारण वह अपने घर की निजी बातें भी लोगों को बता देती थी। असल में उसके पेट में कोई बात पचती ही नहीं थी। इस कारण उसे जो भी इधर-उधर की बात पता लगती, बढ़ा-चढ़ा कर दूसरों को बता आती थी। कुछ लोग तो उसकी गप्प मारने व ज्यादा बोलने की आदत से बहुत परेशान थे।

उसकी इस आदत से सबसे ज्यादा परेशान उसका पति अन्द्रेई था। वह उसे हरदम समझाता था कि कम बोला करो, घर की बातें बहार मत बताया करो। परंतु खजूरी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती थी। बातें करने के चक्कर में अक्सर उसे खाना बनाने को देर हो जाया करती थी।

कभी-कभी तो वह घर के जरूरी काम तक भूल जाती थी। शाम को जब थका हुआ अन्द्रेई खेत से लौटता तो उसे खूब डांटता। खजूरी अपनी आदत से मजबूर थी। गप्पें उसके लिए समय बिताने का सबसे अच्छा साधन थीं।

एक बार अन्द्रेई अपने खेत में हल चला रहा था। तभी उसके हल से कोई वस्तु टकराई, खन-खन की आवाज सुनकर वह चैकन्ना हो गया। उसने हाथ से थोड़ी मिट्टी खोदी तो उसे यकीन हो गया कि वहां कोई धातु की चीज गड़ी हुई है। उसने उस स्थान पर निशान लगा दिया।

वह सारे दिन चुपचाप खेत पर काम करता रहा जाकि दिन की रोशनी में कोई उसे जमीन खोदते न देख ले। जब शाम हो गई और हल्का अंधेरा होने लगा तो उसने मौका पाकर खेत में उसी स्थान पर खुदाई शुरु कर दी।

थोड़ी ही देर में जगमगाता खजाना उसके सामने था। उसे खजाने में हीरे-मोती, सोने के आभूषणों का ढेर था। वे सब एक स्वर्ण कलश में भरे हुए थे। उस खजाने को देखकर अन्द्रेई की बांछे खिल गई।

ज्यों ही अन्द्रेई वह खजाना घर ले जाने के लिए निकालने लगा त्यों ही उसे याद आया कि उसकी पत्नी को जैसे ही खजाने का पता लगेगा वह सारे शहर में ढिंढोरा पीट देगी, फिर तो खजाना राजा के पास चला जाएगा। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह खजाने का क्या करे? घर ले जाए तो पत्नी से कैसे छिपाए?

उसने खजाने को वहीं पास के जंगल में दबा दिया और मन ही मन एक योजना बनाई। फिर वह घर पहुंच गया। घर जाकर खजूरी से कहा कि आज मेरा पूरियां खाने का मन है, जरा जल्दी से बना दो।

खजूरी बोली-”आज कोई खास बात है क्या?“

”हो सकता है, कोई खुशखबरी हो। तुम्हें बाद में बताऊंगा।“ अन्द्रेई ने कहा।

सुनकर खजूरी को जोश आ गया और वह खुशखबरी जानने का बैचेन हो गई और फटाफट पूरियां बनाने लगी। अन्द्रेई चुपचाप पूरियां खाने लगा। वह एक साथ 4-5 पूरी उठाता और उसमें एक-एक पूरी स्वयं खता, बाकी चुपचाप थैले में डाल लेता। उसकी पत्नी यह देखकर भौंचक्की हुई जा रही थी कि अन्द्रेई इतनी तेजी से पूरियां खाए जा रहा है।

जब अन्द्रेई का थैला पूरियों से भर गया तो बोला अब मेरा पेट भर गया। खजूरी बोली-”अब खुशखबरी तो बताओ।“

अन्द्रेई बोला-”खुशखबरी यह है कि आज राजा के बेटे की शादी है। पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा है। मैं जगमग देखकर थोड़ी देर में लौटता हूं।“

अन्द्रेई चुपचाप थैला उठाकर चल दिया और बाजार जाकर बहुत सारी जलेबियां और मछलियां खरीद लीं, फिर अपनी योजना के अनुसार जंगल में पुरी तैयारी कर आया।

जब वह खुशी-खुशी घर लौआ तो पत्नी उसकी राह देख रही थी। उसने पत्नी के कान में फुसफसा कर कहा-”जानती हो, दूसरी बड़ी खुखखबरी क्या है?…. हमें बहुत बड़ा खजाना मिला है। जल्दी से तैयार हो जाओ। हम खजाना रात में घर लेकर आएंगे।“

खजूरी जल्दी से तैयार हो गई। कुछ ही देर में वे जंगलों से गुजर रहे थे। अचानक एक पेड़ की नीची टहनी से खजूरी के सिर पर कुछ टकराया। उसने सिर झुकाकर ऊपर की चीज पकड़ने की कोशिश की तो देखा हाथ में जलेबी थी। खजूरी जलेबी देकर हैरान रह गई। वह अन्द्रेई से बोली- ”सुनते हो जी, यहां पेड़ पर जलेबी लटकी थी, मेरे हाथ में आग गई हैं। है न कैसा आश्चर्य की बात?“

अन्द्रेई बोला-”इसमें आश्चर्य की क्या बात है? ये जलेबियों के ही पेड़ हैं, क्या तुमने जलेबी का पेड़ नहीं देखा?“

खजूरी आश्चर्यचकित होकर ऊपर देखनी लगी। उसने देखा, सभी पेड़ों पर ढेरों जलेबियां उगी हैं। वह उसमें से दो-तीन जलेबी तोड़कर आगे बढ़नी लगी तो चलते-चलते खाने लगी। वह बोली-”आज कमाल का दिन है। आज ही हमें खजाना मिला है, आज ही राजा के बेटे की शादी है, आज ही मैंने जलेबियों के पेड़ देखे हैं?“

”हां, वाकई आज कमाल का दिन है।“ अन्द्रेई ने हां में हां मिलाई।

वे जंगल में कुछ ही दूर गए थे कि खजूरी ने देखा जंगल में स्थान-स्थान पर मछलियां पड़ी थीं। वहां जमीन भी हल्की सी गीली थी। कुछ मछलियां मरी हुई थी और कुछ हिल-ढुल रही थीं। उनमें अभी जान बाकी थी।

इतने में अन्द्रेई खजूरी से बोला-”लगता है आज जंगल में मछलियों की बारिश हुई है और मजे की बात यह है कि यह बारिश अभी थोड़ी ही देर पहले हुई लगती है क्योंकि कुछ मछलियां जिंदा हैं। आज तो हम जरा जल्दी में हैं, वरना मछलियां अपने थैले में भर लेते, खाने के काम आतीं।“

खजूरी ने विस्मय से आंखे फैलाकर पूछा-” क्या कहा, मछलियों की बारिश? यह तो कमाल हो गया। वाकई आज कमाल का दिन है। मुझे एक और नई चीज देखने और सुनने को मिल रही है। मैंने तो मछलियों की बारिश के बारे मं आज तक नहीं सुना।“

”असल में तुम्हें बाहर की चीजों का पता नहीं रहता, क्योंकि तुम घर में ही रती हो। वरना तुम्हें जंगल में मछलियों की बारिश का अवश्य पता होता।“ अन्द्रेई बोला।

वे आगे बढ़ने लगे। रात का अंधियारा बढ़ता जा रहा था। कुछ ही देर में कंटीली झाडि़यों पर कोई सफेद-सी वस्तु दिखाई देने लगी। खजूरी पहले से ही आश्चर्य में डूबी हुई थी। आगे झुककर देखने लगी-“यह सफेद-सफेद गोल-सा क्या हो सकता है?“ इतने में उसने हाथ बढ़ाया और बोली-”झाड़ पर पूरियां? लगता है कि जलेबी के पेड़ की तरह जंगल में पूरियों के झाड़ भी होते हैं। अब मुझे समझ आ गया कि जंगल में कैसे अनोखे पेड़ होते हैं।“

अन्द्रेई ने कहा-”लगता है तुम्हें एक ही दिन में जंगल की सारी चीजों की अच्छी जानकारी हो गई है। तुमने पूरियों के झाड़ भी पहली बार देखे हैं न?“

”हां, सो तो है। अब आज कमाल का दिन है तो कमाल ही कमाल देखने को मिल रहे हैं। चलो, अब यह भी बताओ, खजाना कहां है?“ खजूरी बोली।

”हम खजाने के पास पहुंचने ही वाले हैं। वो देखो, पास के तालाब में किसी ने जाल बिछाया हुआ है। मैं देखता हूँ कि जाल में कुछ फंसा या यूं ही लटका हुआ है।“

अन्द्रेई ने आगे बढ़कर जाल उठा लिया। जाल देखकर खजूरी आश्चर्य से आंखे फैलाते हुए बोली-”पानी के अंदर खरगोश? यह कैसे हो सकता है। क्या जंगल में खरगोश पानी में भी रहते हैं?“

”हां, हां क्यों नहीं, सामने देखो खजाना यहीं है। अब हम खजाना निकालेंगे।“ अन्द्रेई ने रुकते हुए कहा।

एक स्थान से मिट्टी खोदकर अन्द्रेई ने सोन का कलश निकाल कर खजूरी को खजाना दिया। खजूरी की खुशी और विस्मय देखते ही बनता था।

अन्द्रेई ने चुपचाप गड्डा वापस भरा और अपने दुशाले में कलश को ढक लिया। कुछ ही देर में अन्द्रेई और खजूरी खजाना लेकर वापस घर पहुंचे। दोनों ही चल-चलकर थक गए थे। अतः दोनों ने सलाह की कि सुबह उठकर सोचंेगे कि हमें इस खजाने का क्या इंतजाम करना है, अभी सो जाते हैं।

दोनों लेटते ही सो गए। सोते ही अन्द्रेई को खजाने के बारे में बुरे-बुरे सपने आने लगे और कुछ ही देर में अन्द्रेई घबराकर उठ बैठा। उसने देखा खजाना सही-सलामत घर में रखा है और सुबह होने में देर है।

अन्द्रेई चुपचाप उठा और स्वर्ण कलाश को ढककर सुरक्षित स्थान पर रख आया, फिर चैन से सो गया।

सुबह निकले 2-3 घंटे हो चुके थे, पर अन्द्रेई सोया हुआ था। अचानक घर के बाहर शोर-शराबा सुनकर अन्द्रेई की आंख खुली।

उसने उठकर देखा, बाहर लोगों की भीड़ जमा थी। पूछने पर पता लगा कि लोग खजाना देखने आए थे। उसमें पत्नी खजूरी सुबही ही पानी भरने गई तो अपनी पड़ोसिनों को खुशखबरी सुना आई थी कि हमंे बहुत बड़ा खजाना मिला है। अतः लोग उसे बधाई देने व खजाने के दर्शन करने आए थे।

अन्द्रेई ने लोगों से कहा-”लगता है मेरी पत्नी ने सपने में कोई खजाना देखा है, जिसके बारे में उसने आप लोगों को बताया है। मुझे तो ऐसा कोई खजाना नहीं मिला।“

लोग निरश होकर लौट गए। बात फैलते-फैलते राजा तक पहुंच गई। राजा ने अन्द्रेई को बुलवा भेजा। अन्द्रेई की राजा के सामने पेशी हुई।

राजा ने पूछा-”सुना है, तुम्हें कोई बहुत बड़ा खजाना मिला है? कहां है वह खजाना?“

”हुजूर, मुझे तो ऐसा कोई खजाना नहीं मिला। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि आप क्या बात कर रहे हो?“ अन्द्रेई बोला।

”यह कैसे हो सकता है। तुम्हारी पत्नी ने स्वयं लोगों को उस खजाने के बारे में बताया है।“ राजा ने हा।

”हुजूर माफ करें मेरी पत्नी बहुत गप्पी है। आप उसकी बात का यकीन न करें।“

”नहीं, हम इस बात की परीक्षा स्वयं करेगे,“ राजा ने कहा। फिर राजा ने अन्द्रेई की पत्नी खजूरी को अगले दिन दरबार में पेश होने की आाज्ञ दी।

खजूरी खुशी-खुशी राजा के दरबार में हाजिर हो गई।

राजा ने पूछा-” सुना है कि तुम्हें कोई बड़ा खजाना मिला है।“

”जी माई बाप, आप सही फरमा रहे हैं। हमें वह खजाना 2-3 दिन पहले मिला था।“ खजूरी बोली।

राजा ने पूछा-”तुम्हें वह खजाना कंहा मिला, जरा विस्तार से बताओ?“

खजूरी आत्मविश्वास से भर कर बोली-”हुजुर, उस दिन कमाल का दिन था, परसों की ही बात है। हुजूर उस दिन राजा के यानी आपके बेटे की शादी भी थी। मेरे पति शहर की जगमग देखने गए थे।“

राजा एकदम चुप हो गया, फिर बोला-”मेरा तो कोई शादी लायक बेटा नहीं है। मेरा बेटा तो सिर्फ चार वर्ष का है। तुम्हें ठीक से तो याद है न? जरा सोच-समझ कर बोलो?

खजूरी बोली-”साहब, हम उसी रात को खजाना लेने गए थे, उस दिन कमाल का दिन था। मै।ने उस दिन पहली बार जलेबियों के पेड़ देख। बहुत सारी जलेबियां तोड़कर खाई भी।“

राजा आश्चर्य से खजूरी को देख रहा था-”जलेबियों के पेड़?“

”हुजूर, उस कमाल क दिन मैंने मछलियों की बरसात देखी, पानी में रहने वाले खरगोश को देखा और…।“

राजा ने कहा-”लगता है यह कोई पागल औरत है। इसे यहां से ले जाओ।“

जब राजा के सैनिक उसे बाहर ले जाने लगे तो खजूरी चिल्लाकर कहने लगी।

”मैं सच कहती हूँ कि हमें सोने के कलश में खजाना मिला था, उस दिन कमाल का दिन था। मैंने पूरियों के झाड़ भी उसी दिन देखे थे।“

राजा ने सैनिकों को खजूरी को बाहर निकाल दिया। अन्द्रेई बोला-”हुजूर, मैं न कहता था कि मेरी पत्नी की बातों का विश्वास न करें।“

राजा ने अन्द्रेई को छोड़ दिया। अपने दौ सैनिकों को अगले दिन अन्द्रेई के घर भेजा। उन्होंने खजूरी से पूछा-”अच्छा यह बताओ कि घर में खजाना कहां रखा है।“

खजूरी दौड़कर उसी कोने में गई जहां उन्होंने खजाना रखा था। परंतु वहां कोई खजाना न था। वह इधर-उधर देखती रही, परंतु उसे कोई खजाना न मिला। राजा के सिपाही वापस लौट गए।

अन्द्रेई ने खैर मनाई कि उसकी चतुराई से उसका खजाना बच गया था। वे दोनों सुख से रहने लगे। फिर खजूरी ने भी गप्प मारना व ज्यादा बातें करना छोड़ दिया।

जैसे को तैसा (Clever friend taught a nice lesson)

Egyptian folk tale of two friends, in which one cleverly puts the other in a less profit making share of their farming work. The rest of the story follows how the clever friend is taught a lesson by the wife of other friend.

Complete Story in Hindi

सिमकी का गरीबी के मारे बुरा हाल था। उसके घर में कई-कई दिन तक भोजन नसीब नहीं होता था। उसकी पत्नी रोजिया उसे रोज समझाती कि समझ और मेहनत से काम किया करो, परंतु सिमकी बहुत सीधा-साधा, भोला-भाला मासूम था। इसी कारण हर जगह धोखा खा जाता था। कहीं सीधेपन के कारण उससे भूल हो जाती तो कभी कोई उसे धोखा दे देता, जिससे उसे अपनी मजदूरी तक पूरी नहीं मिलती थी।

short story for kids with moralएक दिन सिमकी की पत्नी ने समझाया कि क्यों न तुम अपने मित्र फाजरी के पास जाकर कोई काम मांगो। कम से कम वह धोखा तो न देगा। उसके पास ढेर सारी जमीन, घोड़े, बैल हैं। वह तुम्हें खेतों का या जानवर देखने का काम अवश्य दे देगा। फिर हमेें हर महीने गुजारे लायक कुछ न कुछ अवश्य मिल जाएगा।

अपनी पत्नी की सलाह मानकर सिमकी फाजरी के पास पहुंच गया। फाजरी बहुत चालाक और और स्वार्थी बन चुका था। फिर भी अपनापन दिखाते हुए सिमकी से बोला-’’ठीक है। अपने एक खेत की जिम्मेदारी हम तुम्हें दे देते हैं। इस पर सारी खेती तुम करोगे। जो भी फसल होगी, आधी तुम्हारी आधी मेरी।

सिमकी खुश हो गया। अपने घर जाकर खुशखबरी अपनी पत्नी रोजिया को सुनाई। पत्नी खुश हो गई और सोचने लगी-अब हमारे दिन बदल जाएंगे। हमें पैसे की कमी नहीं रहेगी।

अगले दिन सिमकी फाजरी के पास काम के लिए पहुंच गया। फाजरी ने अपना खेत दिखाते हुए कहा कि इसी खेत पर तुम्हें मेहनत से खेती करनी है। खाद, बीज सब मैं दूंगा। तुम्हारे घर खर्च को कुछ धन भी दे दूंगा परंतु जब फसल होने लगेगी तो आधी मेरी होगी और आधी तुम्हारी।

सिमकी ने कहा-’’ठीक है सौदा तय रहा।

सिमकी ने अगले दिन से मेहनत से काम करना शुरु कर दीया। उसने फाजरी के दिए हुए बीज धरती में बो दिए। कुछ ही दिन में पौधे निकल आए। खेत हरा भरा हो उठा। अब सिमकी खूब मेहनत से काम करता और सोचता कि फसल कटने पर क्या-क्या खरीदूंगा। आखिरकार फसल तैयार हो गई। भोला सिमकी अपने मित्र की चालाकी अभी तक नहीें भांप सका था। फसल कटने के वक्त फाजरी भी खेत पर आ गया था। शर्त के मुताबिक फसल का ऊपरी भाग सिमकी को मिलना था, व जमीन के नीचे का भाग फाजरी को मिलना था। फाजरी ने चालाकी की थी, और शलगम की फसल बोई थी। फसल काटकर दो बैलगाडि़यों में भर दी गई।

फाजरी शलगम लेकर बाजार चला गया। वहां उसकी फसल खूब अच्छे दामों पर बिकी।

सिमकी बैलगाड़ी में अपनी फसल भर कर बाजार पहुंचा तो शलगम के पत्तों को खरीदने बाला कोई न था। जानवरों का चारा खरीदने वालों ने थोड़े बहुत पत्ते खरीद लिए। शाम तक पत्ते सूखने-सड़ने लगे।

बेचारा सिमकी दुखी होते हुए घर पहुंचा। पत्नी को सारी बात विस्तार से सुनाई। वह फाजरी की चालाकी पर मन ही मन क्रोधित हो रही थी परंतु वह कुछ कर नहीं सकती थी। आखिर सिमकी इतना सीधा था कि समझााने से बात नहीं बन सकती थी।

थोड़े दिन बाद जब वह पुनः फाजरी के खेत पर काम करने लग गया तो उसने पुनः यही शर्त रखी कि आधी फसल तुम्हारी और आधी मेरी। सिमकी ने कहा मुझे इस बार नीचे की फसल चाहिए। फाजरी मान गया।

वह पहले की भांति फाजरी के दिए बीज खेत पर बो आया और खूब मेहनत से खेती करने लगा। जब फसल पक कर तैयार हुई तो उसे पता लगा कि यह तो गेहूं की फसल है। परंतु वह कुछ नहीं कर सकता था। शर्त के अनुसार फाजरी ने फसल का ऊपरी हिस्सा यानी गेहूं की बालियां ले लीं और उसकी नीचे की शाखाएं सिमकी को दे दीं। सिमकी को इस बार भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा।

सिमकी ने सूखी डालियों का कुटवा कर भूसा बनवाकर बाजार में बेच दिया। परंतु फाजरी गेहूं बेचकर मालामाल हो गया।

फाजरी की चतुराई सुनकर सिमकी की पत्नी रोजिया से न रहा गया। उसने चाल चलने की सोची और योजना बना डाली। इस बार सिमकी के साथ रोजिया भी फाजरी के पास गई। वहां पहले की भांति खेती पर आधी-आधी फसल की बात तय हुई।

सिमकी ने इस बार नीचे की फसल चुनी। पत्नी चाहती थी कि शर्तें उसी के सामने पक्की हो। अतः सारी शर्तें लिखित में पक्की हो गईं।

इसके बाद सिमकी अपनी पत्नी के साथ फाजरी के गोदाम से बीज लेने पहुंचा। पत्नी ने उनके लिए बीज का बोरा बदल कर दूसरे बीज का बोरा ले दिया और खेत में जाकर बो दिया।

हमेशा कि भांति फाजरी इस बार भी खेतों की गुड़ाई -बुबाई देखने नहीें आया। सिमकी ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर खेती करनी शुरु कर दी। दिन-रात मेहनत करके ये दोनों खेतों में लगे रहते। उनकी मेहनत रंग लाई।

फसल पकने पर फाजरी बड़ी खुशी और घमंड के साथ खेत पर आया तो हरी भरी लहलहाती फसल देखकर खुशी से नाच उठा। परंतु जब फाजरी के मुंशी ने  उसके कान में फूंक कर कहा कि इस बार तो सिमकी की नीचेे की फसल है, तो फाजरी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

फाजरी समझ नहीं पा रहा था कि इस बार धान की फसल के बदले आलू की फसल कैसे बन गई। परन्तु सबके सामने कुछ नहीं बोल सका। सामने ही सिमकी की पत्नी भी खड़ी मुस्करा रही थी।

फिर फसल की कटाई शुरु हुई। शर्त के अनुसार फसल दो जगह लादी जाने लगी। इस बार फसल ज्यादा हुई थी। इस कारण बैलगाड़ी की जगह फसल को ट्रक में लादा जा रहा था। एक ट्रक में आलू लादे जा रहे थे तो दूसरी तरफ इसके पौधे। सिमकी अपनी आलू की फसल लेकर मंडी में पहुंचा तो बहुत अच्छे दामों पर फसल बेच दी।

सिमकी के साथ उसकी पत्नी भी गई थी। दोनों फसल बेचकर खुशी-खुशी घर लौटे। उधर, फाजरी के आलू के पौधे मंडी पहुंचते-पहुंचते सूख चुके थे, अतः उन्हें जानवरों के चारे के लिए भी कोई खरीदने वाला न था। उसको पहली बार ऐसा झटका मिला था। इस बार जैसे को तैसा मिला था। वह मन ही मन क्रोध से जला जा रहा था।

उसने मन ही मन निश्चय किया कि अगली फसल में वह बदला जरुर निकालेगा। उसने अपने नौकर के हाथ सिमकी के यहां खबर भिजवाई कि अगली फसल के लिए वह सिमकी का इंतजार कर रहा है।

सिमकी की पत्नी रोजिया ने कहला भेजा कि हमने आधी फसल का सौदा करना बंद कर कर दिया है।

इस बार फसल बेचकर मिली रकम से सिमकी और रोजिया ने मिलकर छोटा-सा खेत खरीदा और उस पर मेहनत करके सुख से रहने लगे।

उधर, फाजरी ने सुना तो पछताकर हाथ मलता रह गया।

करामाती दाना (Greediness is a curse)

One day a beggar gets nothing to eat except one wheat grain by an elderly lady. It turns his fortune and he starts getting good food from next day. It all ends when he becomes greedy.

Moral of the Story: Greediness is a curse

Complete Story in Hindi

बहुत पहले की बात है। एक भिखारी सड़क के किनारे रहा करता था। उसका न तो कोई रहने का ठिकाना था और न ही कमाई का कोई निश्चित जरिया।

hindi children stories with moralवह कंधे पर एक झोला लटकाए सुबह से शाम तक भीख मांगा करता था। कहीं से उसे रोटी मिल जाती तो दूसरी जगह से सब्जी मांग कर पेट भर लेता था। लोग उसे बैगी कह कर पुकारते थे।

एक दिन वैगी को सुबह से शाम तक कुछ भी खाने को नहीं मिला। उसका भूख के मारे बुरा हाल था। वह परेशान होकर इधर-उधर घूम रहा था। तभी एक बूढ़ी स्त्री ने उसे अपनेे पास बुलाया और उसकी परेशानी का कारण पूछा।

स्त्री ने वैगी को एक गेहूं का दाना देते हुए कहा-’’यह गेहूं का दाना करामाती है, इसे अपने पास संभाल कर रखना। जब तक यह दाना तुम्हारे पास रहेगा तुम्हें भोजन की कमी नहीं होगी।“

बैगी दोने को उलट-पलट कर देखने लगा, फिर उसने सिर उठाकर स्त्री से कुछ पूछना चाहा, परंतु तब तक स्त्री गायब हो चुकी थी।

वैगी दाने को अपने थैले में डालकर भोजन की तलाश में पास के एक होटल की तरफ से गुजर रहा था। तभी एक व्यक्ति ने उसे रोककर कहा-”तुम यहां आकर पेट कर भोजन खा सकते हो। यहां आज हमारे सेठ जी का जन्मदिन मनाया जा रहा है।“

वैगी मन ही मन बहुत खुश हुआ और होटल से पेट भर खाना खाकर बाहर निकला। वह सोचने लगा कि यह गेहूं के दाने की करामात है या केवल एक संयोग कि उसे मुफ्त में पेट भर भोजन मिल गया।

अगले दिन वह घूमते-घूमते थक गया तो भोजन के लिए एक घर पर पहुंच गया। वहां उसने दरवाजे पर दस्तक दीं। एक सभ्य व पढ़ी लिखी स्त्री ने उसे आदरपूर्वक भीतर बुलाया और कहा-”आप यहां रात्रि को विश्राम कर सकते हैं। पहने आप भोजन कर लीजिए।“

वैगी को अब यकीन हो गया कि गेहूं का दाना वाकई करामाती है। उसने पेट भर भोजन किया और फिर सोने जाने लगा। तभी उसे शिष्टाचार की बात याद आई तो उसने अपने थैले से अपना चाकू व प्लेट निकालकर मेजबान स्त्री को दे दी। फिर उसने गेहूं का दाना स्त्री को देते हुए कहा-’’मैडम, यह दाना मेरे लिए बहुत कीमती है, इसे संभाल कर रख लीजिए। सुबह को जाते वक्त यह दाना मैं आपसे ले लूंगा।“

मेजबान स्त्री ने गेहूं का दाना संभाल कर मेज पर रखी प्लेट में रख दिया और सोने चली गई।

प्रतिदिन की भांति स्त्री सुबह को जल्दी उठ गई और अपनी मुर्गियों को बाड़े में दाना खिलाने लगी। फिर अपनी रसोई में काम करने चली गई।

तभी एक मुर्गी खुले दरवाजे से कमरे के भीतर आकर जमीन से बचा-खुचा खाना उठा कर खाने लगी। इसी बीच बैगी की आंख खुली। उसने देखा कि एक मुर्गी कमरे में घूम रही है।

वैगी तुरंत मुर्गी के पीछे दौड़ा। मुर्गी बचने के लिए मेज पर चढ़ कर बैठ गई। उसने प्लेट में गेहूं का दाना देखा तो झट से खा गई। जब तक वैगी मुर्गी को पकड़ता, मुर्गी दाना खा चुकी थी।

वैगी ने शोर मचाना शुरु कर दिया। घर के सभी लोग जाग गए। घर का मालिक बहुत ही ईमानदार व शरीफ इंसान था। वह पूछने लगा-”आप हमारे मेहमान हैं क्या बात हो गई, जिससे आप इतने नाराज हैं ?“

वैगी बोला- ”मैने मैडम को कह दिया था कि मेरा गेहूं का दाना संभाल कर रखिएगा, पर उन्होंने मेज पर रख दिया, उसे आपकी मुर्गी खा गई, मुझे वही गेहूं का दाना चाहिये।“

मेजबान लोग यह तो जानते नहीं थे, कि उस दाने में क्या खासियत थी। वे खुशामद करने लगे कि आप जितने गेहूं चाहें ले जा सकते हैं। वह स्त्री एक कटोरी भर गेहूं ले आई, परंतु वैगी रोने लगा कि उसे वही दाना चाहिए। मेजबान ने कहा-’’वह दाना तो मुर्गी के पेट में जा चुका है। आप चाहें तो उस मुर्गी का ले जा सकते हैं।“

वैगी को बात जंच गई। उसने वह मुर्गी लेकर अपने थैले मैं डाल ली और वहां से चल दिया। सारा दिन इधर-उधर घूमने के बाद वह शाम को एक घर के सामने पहुंचा। वहां भी उसको आदरपूर्वक भीतर बुलाया गया और स्वादिष्ट पकवान खिलाए गए।

वैगी ने मकान की मालिकिन को मुर्गी और थैला संभाल कर रखने को दे दिया और सो गया। सुबह उठ कर बैगी ने मालिकिन से अपनी मुर्गी मांगी। मालिकिन मुर्गी लेने गई तो देखा कि वैगी की मुर्गी के पंख बिखरे पड़े हैं।

मालिकिन के नौकर ने बताया कि नई मुर्गी देखकर मालिकिन की मुर्गियां ने बाड़े में उस पर आक्रमण कर दिया और अपनी चोंचें मार-मार कर लहूलुहान कर दिया था। इससे वैगी की मुर्गी जान बचाने के लिए बाहर भागी थी। बरामदे में ही मालिकिन का कुत्ता बैठा था जो मुर्गी को मार कर खा गया। वैगी रोने चिल्लाने लगा कि उसे अपनी वही मुर्गी चाहिए।

मालिकिन की समझ में नहीं आ रहा था कि वैगी को कैसे शांत कराए। उसने विनती करते हुए कहा कि आप उसके बदले में कोई-सी मुर्गी ले जा सकते हैं परंतु वैगी नहीं माना। तब मालिकिन ने हार कर अपना पालतू कुत्ता वैगी को दे दिया।

वैगी ने उस कुत्ते को अपने थैले में डाल लिया और आगे चल दिया। आगे जाकर वह एक शानदार बंगले के आगे रुका। बंगले में राजकुमारी उपने परिवार के साथ रहती थी। बंगले की मालिकिन ने वैगी को भीतर बुलाया। नहला-धुला कर कपडे़ दिए, फिर पेट भर भोजन खाने को दिया।

बंगले मे रहने वाली राजकुमारी को देखकर वैगी के दिल में लालच आ गया। वह सोचने लगा कि एक गेहूं के दाने की करामात के कारण उसे मुर्गी और फिर मालिकिन का प्यारा मुत्ता मिल गया। यदि किसी तरह यह कुत्ता मर जाये तो बदले में राजकुमारी को मांग लूं और उससे विवाह कर लूं, फिर मेरा जीवन सुखमय हो जाएगा।

वैगी ने जानबूझकर कुत्ते को राजकुमारी के पीछे लगा दिया। जब राजकुमारी अपनी सखियांे के साथ बगीचे में खेल रही थी, तभी कुत्ता जोर से राजकुमारी पर झपट पड़ा। राजकुमारी ने अपने बचाव में एक बडा पत्थर कुत्ते को दे मारा। कुत्ते को चोट लगी, पर कुत्ता फिर उठकर राजकुमारी के पीछे भागा। इस बार राजकुमारी ने क्रोध में आकर कुत्ते पर डंडे से बार कर दिया। कुत्ता वहीं मर कर ढेर हो गया।

वैगी जब बंगले से बाहर जाने लगा तो उसने बंगले की मालिकिन से अपना कुत्ता मांगा। परंतु मालिकिन ने सकुचाते हुए कुत्ते के मरने का सारा किस्सा बयान कर दिया।

बैगी जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि उसे अपना ही कुत्ता चाहिए। बंगले की मालिकिन ने असमर्थता प्रकट कर दी। वैगी बोला-”जिसने मेरे कुत्ते को मारा है, मुझे वही दे दीजिए, मैं उसी से संतुष्ट हो जाऊंगा।“

मालिकिन को बैगी की बात सुनकर बहुत क्रोध आया कि एक आदमी कुत्ते के बदले उनकी बेटी मांग रहा था।

मालिकिन ने कहा-“तुम्हें मैं एक हजार मोहरें देती हूं । यदि तुममें कोई हुनर है या किसी कला में निपुण हो तो इन्हें एक महीने में अपनी कमाई से दोगुना कर लाओ। यदि तुम यह कर सके तो अपनी बेटी का हाथ तुम्हें दे दूंगी।“

वैगी को धन का लालच आ गया और मोहरें लेने को तैयार हो गया। उसने मोहरें लेकर अपने थैले में डाल दीं और चल दिया।

रास्ते में वैगी ऊंचे-ऊंचे सपने देखने लगा। परंतु वह यह समझ नहीं पा रहा था वह किस तरह का व्यापार करके इन मोहरों को दुगुना करे। वैगी को भीख मांगने के सिवा कुछ काम नहीं आता था। भीख मांग कर एक महीने में तो क्या एक वर्ष में भी इतनी मोहरें कमाना संभव नहीं होगा।

तभी वैगी ने सोचा कि वह पहले कुछ मोहरें खर्च करके आराम से जीवन बिताएगा। फिर बाद में कमाई के बारे में सोचेगा।

रास्ते में एक जगह रुक कर वैगी ने मोहर निकालने के लिए थैले में हाथ डाला तो उसे यूं लगा कि हाथ में कुछ चुुभ गया हो। उसने तुरंत हाथ बाहर निकाल लिया। उसने थैला खोल कर देखना चाहा तो सैकड़ांे कीडे़-मकौडे़ उड़कर उसे काटने लगे।

वैगी ने थैला उठाकर दूर नदी में फेंक दिया। वैगी खाली हाथ रह गया। अब उसके सामने भीख मांगने के सिवा कोई चारा नहीं था। उसे लालच का फल मिल गया था।

प्यार के बदले प्यार (Bond of Love between Priest and Fox)

Japanese short story of a priest who is loved by village people. He too tries his best to help others. One day he helps a fox. Rest of the story is how their bond strengthens with time.

Moral of the Story: If you love others, you’ll get back love.

Full Story in Hindi

एक गांव के किनारे बनी कुटिया में एक साधु रहता था। वह दिन भर ईश्वर का भजन-कीर्तन करके समय बिताता था। उसे न तो अपने भोजन की चिंता थी और न ही धन कमाने की। गांव के लोग स्वयं ही उसे भोजन दे जाते थे।

hindi short story for kids with moral meaningसाधु उसी भोजन से पेट भर लिया करता था। उसे न तो किसी चीज की ख्वाहिश थी  और न ही लालच। वह बहुत उदार और कोमल हृदय व्यक्ति था। यदि कोई दुष्ट व्यक्ति उसे कभी कटु शब्द भी बोल देता, तो साधु उसका बुरा नहीं मानता था।

सभी लोग साधु के व्यवहार की प्रशंसा किया करते थे। इसी कारण वे उसकी हर प्रकार से सहायता किया करते थे।

एक बार कड़ाके की सर्दियों के दिन थे। साधु अपनी कुटिया में आग जलाकर गर्मी पाने का प्रयास कर रहा था। तभी उसे अपने दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। साधु सोचने लगा कि सर्दी की रात में इस वक्त कौन आ सकता है।

साधु ने दरवाजा खोला तो देखा की एक लोमड़ी बाहर खड़ी थी, जो सर्दी से कांप रही थी। लोमड़ी बोली-’’मैं सामने के पहाडों में रहती हूं। वहां आजकल बर्फ गिर रही है, इस कारण मेरा जीना मुश्किल हो गया है। आप कृपा करके मुझे रात्रि में थोडी सी जगह दे दीजिए। मैं सुबह होते ही चली जाऊंगी।

साधु ने नम्रतापूर्वक उसे भीतर बुला लिया और कहा-’’परेशान होने की कोई बात नहीं है। तुम जब तक चाहो यहां रह सकती हो।

कुटिया में जली आग के कारण लोमड़ी को काफी राहत महसूस होने लगी। तब साधु ने लोमडी को दूध और रोटी खाने को दी। लोमडी ने पेट भर कर भोजन किया और एक कोने में सो गई।

सुबह होते ही लोमड़ी ने साधु से बाहर जाने की आज्ञा मांगी। साधु ने उससे कहा कि वह इसे अपना ही घर समझकर जब चाहे आ सकती है।

रात्रि होने पर लोमड़ी फिर आ गई। साधु ने उससे दिन भर की बातें कीं, थोड़ा भोजन दिया। फिर लोमड़ी एक कोने में सो गई।

इसी तरह दिन बीतने लगे। लोमड़ी प्रतिदिन रात्रि होने पर आ जाती और सुबह होते ही जंगल की ओर चली जाती। साधु को लोमडी से एक बालक के समान प्यार हो गया।

अब जब कभी लोमडी को आने में थोडी देर हो जाती तो साधु दरवाजे पर खड़े होकर उसकी प्रतीक्षा करता, और उससे देर से आने का कारण पूछता। लोमड़ी भी साधु से हिल -मिल गई थी और उसे बहुुत प्यार करने लगी थी ।

कुछ महीने बीत जाने पर मौसम बदलने लगा। एक दिन लोमडी बोली-’’आपने मेरी इतनी देखभाल और सेवा की है, मैं इसके बदले आपके लिए कोई कार्य करना चाहती हूं।“

साधु ने कहा-’’मैंने तुम्हारी देखभाल करके तुम पर कोई उपकार नहीं किया है। यह तो मेरा कर्तव्य था। इस तरह की बातें करके तुम मुझे शर्मिंदा मत करो।

लोमडी बोली-’’मैं किसी उपकार का बदला नहीं चुकाना चाहती। मुझे आपके साथ रहते-रहते आपसे प्यार हो गया है। इस कारण मैं आपकी सेवा करके स्वयं को गर्वान्वित महसूस करना चाहती हूं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं आपके काम आऊं।“

साधु को लोमड़ी की प्यार भरी बातें सुनकर हार्दिक प्रसन्नता हुई। वह खुशी से गद्गद हो उठा और लोमडी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला-”मुुुझे न तो किसी चीज की आवश्यकता है और न ही कोई विशेष इच्छा। गांव के लोग कुटिया में ही मेरा भोजन पहुंचा जाते हैं, मेरी बीमारी में वे मेरा ध्यान रखते हैं, मुझे और क्या चाहिये ?“

लोमड़ी बोली-’’यह सब तो मैं जानती हूं। इतने महीनों तक आपके साथ रहकर आपकी आत्मसंतोष की प्रवृत्ति को मैंने अच्छी तरह देखा व सीखा है। फिर भी कोई ऐसी इच्छा हो जो पूरी न हो सकी हो तो बताइए। मैं उसे पूरा करने की कोशिस करुंगी।“

साधु कुछ देर तक सोचता रहा, फिर सकुचाते हुए बोला-”यूं तो जीते जी मुझे किसी चीज की आवश्यकता नहीं है। फिर भी कभी-कभी सोचता हूं कि मेरे पास एक सोने का टुकड़ा होता जिसमें से कुछ को मैं भगवान को चढ़ा देता और कुछ मेरे मरने पर मेरे क्रिया- कर्म के काम आ जाता। मैं गांव वालों की कृपा का बदला अपनी मृत्यु के बोझ से नहीें देना चाहता।“

लोमड़ी साधु की बात सुनकर बोली-’’बस इतनी सी बात है बाबा, इसमें आप इतना समुचा रहे थे। मैं कल ही आपके लिए सोने का टुकड़ा ला देती हूं।“

साधु ने कहा-’’मुझे कोई ऐसा सोने का टुकड़ा नहीं चाहिए जो चोरी किया हुआ हो या किसी से दान में प्राप्त किया हो।“

लोमड़़ी साधु की बात सुनकर सोच में पड़ गई फिर बोली-’’बाबा, मैं आपके लिए ऐसा ही सोना लाकर दूंगी।“

इसके बाद लोमड़ी बाबा की कुुटिया से हर दिन की भांति चली गई। शाम होने पर साधु लोमड़ी का इंतजार करने लगा। परंतु घंटों बीत गए, लोमड़ी वापस नहीं आई।

साधु को लोमडी की फिक्र में ठीक प्रकार नींद नहीं आई। इस प्रकार कई दिन बीत गए। परंतु लोमड़ी नहीं लौटी। साधु के मन में पश्चाताप होने लगा कि उसने बेकार ही ऐसी वस्तु मांग ली जो उसके लिए लाना संभव न था।

कभी साधु के मन में यह ख्याल आता कि हो सकता है कि लोमडी कहीं से सोना चुराने गई हो और पकडी गई हो। फिर लोगों के हाथों मारी गई हो या लोमड़ी किसी दुर्घटना का शिकार हो गई हो।

साधु को लौमड़ी की बहुत याद आती थी। जैसे ही वह रात्रि का भोजन करने बैठता,उसे लोमडी की मीठी बातें व साथ में भोजन खाना याद आ जाता था।

कुछ महीने बीत गए और साधु को लोमडी की याद कम सताने लगी। साधु अपने भजन-कीर्तन में मस्त रहने लगा।

अब लोमड़ी को गए छह महीने बीत चुके थे और सर्दी पड़ने लगी थी। एक दिन अचानक कुटिया के द्वार पर किसी ने दस्तक दी। साधु ने द्वार खोला तो यह देख कर हैरान रह गया कि द्वार पर पतली-दुबली लोमडी खड़ी थी।

साधु ने कहा-’’अंदर आओ। तुम इतनी दुबली कैसे हो गई ?“

लोमड़ी ने खुशी के आंसू बहाते हुए सोने का टुकड़ा साधु के आगे रख दिया और अपना सिर साधु के चरणों में टिका कर बैठ गई।

साधु लोमड़ी के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोला-’’तुम्हें इसके लिए इतना परेशान होने की क्या आवश्यकता थी, तुम नहीं जानती कि मैं तुम्हारे लिए कितना परेशान रहता था। तुम मेरे बालक के समान हो।“

लोमड़ी बोली-’’मैं इसके लिए बिल्कुल भी परेशान नहीं थीं। मुझे तो अपना कर्तव्य पूरा करना था। आपके प्यार की मैं सदैव ऋणी रहूंगी। यह मेरी छोटी-सी भेंट आप स्वीकार कर लीजिए।“

साधु का मन भी लोमड़ी का प्यार देखकर विचलित हो उठा। उसकी अश्रुधारा बह निकली। वह बोला-’’लेकिन यह तो बताओ कि तुम इतने दिन कहां थी, यह सोने का टुकड़ा कहां से लाई ?“

लोमड़ी बोली-“जिन पहाड़ों पर मैं रहती हूं उसी के दूसरी तरफ सोने की खानें हैं। वहां पर खुदाई के वक्त सोने के कण गिरते जाते हैं। मैं उन्हीं कणों को इतने दिन तक इकट्टा करती रही।“

यह कह कर लोमड़ी साधु के पैरों में लोट लगाने लगी। साधु लोमड़ी को प्यार करते हुए बोला-”तुमने मेरे लिए इतनी मेहनत की है, इसके बारे में मैं सबको बताऊंगा।“

लोमड़ी बोली-”मैं नहीं चाहती कि मेरी छोटी-सी सेवा के बारे में लोगों को पता चले। मैंने प्रसिद्धि के लालच में यह कार्य नहीं किया है। यह पे्ररणा मुझे आपके प्यार से ही मिली है। कल मैं जब यहां से चली जाऊं उसके बाद आपका जो जी चाहे कीजिएगा।“

साधु बोला-”यह कैसे हो सकता है कि तुम्हारी इतनी मेहनत और सेवा को लोग न जानें ? लेकिल तुम यह नहींे चाहती तो यही सहीं। लेकिन अब मैं तुम्हें हरगिज जाने नहीं दूंगा। तुम्हें सदैव यहीं मेरे पास रहना होगा।“

लोमड़ी मान गई और पहले की भांति साधु के साथ रहने लगी। अब वह हर रोज सुबह को चली जाती और शाम को आते वक्त जंगल से थोड़ी लकडि़यां बटोर लाती ताकि बाबा की ईंधन की आवश्यकता पूरी होती रहे। लोमडी साधु बाबा के साथ वर्षों तक बालक की भांति सुख से रहती रही।

पिता की सीख (Overconfident Thomas gets Embarrassed)

Rich and Overconfident Thomas forgets his father’s suggestions and end up in an embarrassing situation when he is looted by 3 thugs.

Moral of the Story: Carelessness can be costly.

Full Story in Hindi

सेठ जानसन के पास धन-दौलत और ऐशो-आराम की कोई कमी न थी। उसका गांव में बहुत बड़ा व्यापार था। लोग उसकी इज्जत करते थे।

hindi short story for kids with moral-1लेकिन जानसन को अपने पुत्र के बारे में एक चिंता खाए जाती थी कि उसका पुत्र थामस उसके बाद कैसे उसका व्यापार संभालेगा? थामस अठारह वर्ष का होने को था परंतु किसी भी काम के प्रति गंभीरता से ध्यान नहीं देता था। वह पिता के काम में भी अधिक हाथ न बंटाता था।

चूंकि थामस को बचपन से सारे सुख-आराम मिले थे, सो वह पैसे का मोल न समझता था। वह हर चीज या काम के प्रति लापरवाह था। यो उसमें बुद्धि की कमी न थी, परंतु वह अपने आपको जरूरत से ज्यादा होशियार समझता था। वह सोचता कि वह लोगों को बेवकूफ बना सकता है, परंतु कोई उसे बेवकूफ नहीं बना सकता।

सेठ जानसन थामस को अक्सर समझाया करता था कि काम में ध्यान लगाया करो, किसी भी काम में लापरवाही ठीक नहीं होती परंतु थामस एक कान सुनता, दूसरे कान से निकाल देता।

एक बार सेठ ने अपने पुत्र की बुद्धिमत्ता परखने के लिए उससे कहा-”जाओ शहर चले जाओ। यह बकरी बूढी हो चली है। इसे बेच आना। इसकी कीमत के बदले में व्यापार के लिए सौदा खरीद लाना।“

पुत्र थामस बोला-”पिताजी यह बकरी कितने की है? इसकी कीमत कितनी मिलनी चाहिए?“

सेठ बोला-”बकरी की कीमत चार सौ लीरा है। हां, चाहो तो घोड़ा ले जाओ, परंतु ध्यान से जाना। दुनिया अनेक धूर्त और ठगों से भरी पड़ी है। किसी अन्जान व्यक्ति का आसानी से विश्वास नहीं करना चाहिए।“

थामस बात को हंसी में टालते हुए बोला-”अरे पतिा जी, कोई मुझे बेवकूफ नहीं बना सकता। मैं बकरी को चार सौ में नहीं पांच सौ लीरा में बेचूंगा। आप देखते रह जाएंगे जब मैं समझदारी से सौदा खरीद कर लौटूंगा।“

थामस घोड़े पर बैठकर शहर की ओर चल दिया। बकरी के गले में उसने घंटी बांध दी और उसकी डोरी को घोड़े के पीछे बांध दिया। थामस स्वयं घोड़े पर बैठ गया और घोड़ा धीरे-धीरे चल दिया। पीछे-पीछे बकरी भी चल दी।

बकरी की घंटी से उसे आभास हो रहा था कि बकरी पीछे आ रही है। वह घोड़े पर आराम से बैठा चला जा रहा था, साथ ही समय बिताने के लिए कुछ गुनगुनाता जा रहा था।

रास्ते में कुछ ठगों ने देखा कि एक युवक मस्ती में घोड़े पर चला जा रहा है, पीछे-पीछे बकरी भी चल रही है।

उनमें से एक ठग धीरे से बोला-”मैं इसकी बकरी आराम से चुरा सकता हूं।“

यह सुनकर दूसरे आदमी को भी जोश आ गया वह बोला-”बकरी चुराना कौन-सी बड़ी बात है, मैं तो वह घोड़ा भी चुरा सकता हूँ जिस पर बैठकर वह गीत गुनगुनाता जा रहा है।“

पहला ठग बोला-”नहीं, घोड़ा चुराना तो मुश्किल है, मैं तो बकरी ही चुरा सकता हूं।“ सारे ठग थामस के पीछे-पीछे चल दिये। इतने में तीसरा ठग बोला-”तुम लोग तो यूं ही डरते हो। मैं तो इसके पहने हुए कीमती कपड़े व पैसे भी चुरा सकता हूं।“

सब ठगों में बहस होने लगी कि कौन पहले क्या चुराएगा। इन ठगों से बेखबर थामस आगे की तरफ बढ़ता जा रहा था। इतने में ठगों में यह तय हुआ कि जिस ठग ने पहले चोरी का प्रस्ताव रखा था, वही पहले चुराएगा। अतः पहला ठग बकरी चुराने के लिए आगे चल दिया।

hindi short story for kids with moral-2उस ठग ने बकरी की डोरी खोल दी और साथ-साथ चलने लगा। फिर चुपचाप घंटी निकालकर घोड़े की पूंछ में बांध दी और बकरी लेकर नौ दो ग्यारह हो गया।

चूंकि घंटी की आवाज लगातार आ रही थी, अतः थामस को पता न लगा। उसे चले कुछ घंटे हो गए थे, अतः सोचने लगा कि पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ता लूं। ज्यों ही वह घोड़े से उतरा, बकरी को पीछे न बंधा देखकर घबरा गया।

थामस हड़बड़ाहट में हर आने-जाने वाले से बकरी के बारे में पूछने लगा। इतने में एक व्यक्ति ने बताया कि थोड़ी ही दूरी पर वैसी ही बकरी लेकर एक आदमी को उसने जाते हुए देखा है।

थामस ने उस व्यक्ति को रास्ता बताने के लिए धन्यवाद दिया और बोला-”आप बहुत सज्जन पुरुष हैं। आपने बकरी के बारे में बताकर मेरी बड़ी सहायता की है। आप मुझ पर एक उपकार और कर दीजिए। मैं बकरी चोर को पकड़कर लाता हूं। तब तक आप मेरा घोड़ा संभाल लीजिए। मैं अभी गया और अभी आया।“

थामस यह कहकर उसी दिशा में भागा जहां उस व्यक्ति ने बताया था। परंतु उसे बकरी व चोर कहीं न मिला। हारकर कुछ देर बाद व वापस उसी स्थान पर आ गया जहां उसे सज्जन को घोड़ा पकड़ा कर गया था।

उस पेड़ के नीचे उस व्यक्ति व घोड़े को न देखकर थामस को रोना आने लगा। उसे अब समझ में आया कि घोड़ा चोर भी बकरी का ही साथी था।

अब थामस को दिमाग काम नहीं कर रहा था। वह बहुत दुखी था। वह सोच रहा था कि किस आसानी से वह व्यक्ति उससे घोड़ा छीन कर ले गया। वह दुखी मन से गांव की ओर वापस जाने लगा।

थामस थोड़ी ही दूर जा पाया था कि उसने देखा, एक व्यक्ति कुंए के पास फूट-फूट कर रो रहा है। थामस को लगा क मैं भी बहुत दुखी हूं, यह व्यक्ति भी दुखी लगता है, इसके साथ मुझे अपना दुख बांट लेना चाहिए ताकि मन का बोझ हल्का हो सके।

थामस उसके पास जाकर दुखी स्वर से बोला-”भाई, तुम क्यों रो रहे हो? मेरा दुख तो तुमसे भी बड़ा है। आज मैंने बड़ा धोखा खाया है।“

वह व्यक्ति बोला-”नहीं भाई, तुम्हारा दुख मुझसे बड़ा नहीं हो सकता, मेरे लिए तो आज जीने-मरने का प्रश्न आ गया है। वैसे बताओ, तुम्हें क्या दुख है?“

थामस बोला-”भैया मेरी लापरवाही के कारण ही आज मेरी बकरी चोरी हो गई। मेरा घोड़ा मेरी आंखों के सामने लुट गया। मैं बहुत दुखी हूं। मैं अपने आपको बड़ा अक्लमंद समझता था।“

थामस की बात सुनकर वह व्यक्ति जोर-जोर से रोने लगा। थामस ने पूछा-”बताओ तो सही, बात क्या है, शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर संकू।“

वह व्यक्ति रोते हुए बोला-”मैं एक सोने के व्यापारी के यहां काम करता हूं। उसकी बेटी की शादी है। मेरे मालिक ने अपनी बेटी के लिए हीरों का कीमती हार बनवाया था। मैं यहां रुका था, तो मेरे हाथ से वह हीरों के हार का डिब्बा कुएं में गिर गया।“

अब मैं किस मुंह से मालिक के पास जाऊं, वह तो यही समझेगा कि हार मैंने चुराया है और पीट-पीटकर मुझे मार डालेगा।

थामस बोला-”तुम कुंए में उतर कर हार क्यों नहीं ढूंढ़ लाते?“

”क्या करूं, इधर भी मौत है उधर भी मौत, उधर मालिक मार डालेगा तो इधर मैं कुंए में डूब कर मर जाऊंगा। मुझे तो तैरना भी नहीं आता और यहां कोई मेरी मदद करने वाला भी नहीं है।“ यह कहकर वह व्यक्ति और जोर से सुबह-सुबक कर रोने लगा।

थामस को उस व्यक्ति पर तरस आने लगा। वह बोला-”ठीक है, मैं कोशिश करता हूं। शायद तुम्हारे हीरे मिल जाएं और तुम्हारी जान बच जाए। लेकिन तब तक तुम मेरे सामान का ध्यान रखना। हां, अगर मैं हार निकाल लाया तो बदले में तुम मुझे क्या दोगे?“

”मैं तुम्हें बस अशर्फी दूंगा।“ वह व्यक्ति बोला-”लेकिन दस अशर्फी मैं काम से पहले लूंगा और दस काम के बाद।“ थामस बोला। उसने मन में सोचा कि चलो मेरा इतना नुकसान हो चुका है। इस तरह थोड़ी भरपाई जरूर हो जाएगाी।

उस व्यक्ति ने अशर्फी थामस को दे दी। थामस ने सोचा कि यदि मैं अशर्फी लेकर कुएं में उतरा और अशर्फी कुंए में गिर गई तो मेरा फिर नुकसान हो जाएगा। अतः थामस ने अपने कपड़े, घड़ी, धन, अशर्फी, सोने की चेन उतारकर उस अजनबी को पकड़ा दी और स्वयं आहिस्ता से कुएं में उतर गया। अशर्फी, सोने की चेन उतारकर उस अजनबी को पकड़ा दीं और स्वयं आहिस्ता से कुएं में उतर गया। थामस बड़ी देर तक कुएं में हीरे का हार ढूंढ़ता रहा परंतु हार होता तो मिलता।

वह थक कर कुएं से बाहर आया तो उस व्यक्ति को न पाकर भौंचक्का रह गया। वह व्यक्ति थामस के कपडे़ व सारा सामान लेकर भाग गया था। थामस के दुख का ठिकाना न था वह वहीं बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा।

थामस शर्म से जमीन में गड़ा जा रहा था कि कैसे नंगे बदन गांव वापस लौटेगा? कैसे अपने पिता को अपना मुंह दिखाएगा। उसे अपनी बेवकूफी पर पश्चाताप हो रहा था। तभी उसके गांव का एक परिचित उधर से गुजरा।

उसने थामस की हालत देखी तो उसके पास आ गया। थामस को अपने कपड़े पहनाकर गांव वापस ले गया। आज थामस को अपनी भूल पर पछतावा हो रहा था। पिता की सीख पर ध्यान न देने का सबक उसे मिल चुका था।

अनन्त लालसा (Greed of Poor Birju)

God grants a wish to poor Birju but his wishes keep on increasing. Seeing this, God takes away all the granted wishes and makes him poor again.

Moral of the Story: Greediness is a curse.

Full Story in Hindi

बिरजू एक गरीब चरवाहा था। दिन भर दूसरों की गाएं चराकर शाम को थका-मांदा घर लौअता था। उसकी कमाई केवल इतनी थी कि मुश्किल से एक वक्त की रोटी जुटा पाता था।

hindi story for kids with moralउसे दो छोटे बच्चे थे। दोनों ही पूर्ण भोजन न मिल पाने के कारण बेहद दुर्बल थे। बिरजू बहुत परेशान रता था कि किसी तरह उसकी आमदनी बढ़ जाए।

एक दिन की बात है। बिरजू जंगल में बैठा भगवान का ध्यान कर रहा था कि अचानक उसे महसूस हुआ कि उसके सामने कोई खड़ा है। उसने गरदन उठाई तो साक्षात् ईश्वर के दर्शन किए।

ईश्वर वाले-”हम तुम्हारी मेहनत और ईमानदारी से खुश हुए हैं। तुम कोई एक इच्छा करो, हम उसे पूरा कर देंगे।“

बिरजू बोला-”मैं बहुत गरीब हूं। अगर मेरे पास भी आपनी गाय होती तो मैं सुखी हो जाता।“

ईश्वर ने उसकी प्रार्थना सुन ली और उसे एक गाय दे दी। अब बिरजू सुबह उठकर गाय का दूध दुहता। दिन में गाय को चराकर लाता। शाम को फिर गाय का चारा काट कर सानी तैयार करता। फिर रात को दूध दुहता।

इस प्रकार बिरजू का पूरा दिन गाय के काम-काम में बीतने लगा। उसके बच्चों को दूध मिलने लगा। उसकी पत्नी भी गाय की देखभाल व घर का काम-काज करती। इसी तरह कुछ दिन बीत गए।

तब बिरजू सोचने लगा कि गाय का दूघर सारा घर में ही खर्च हो जाता है। थोड़ा बहुत ही दूध बचता है। चलो उसे दूसरों को बेच दिया करूं। इससे कुछ आमदनी बढे़गी।

धीरे-धीरे वह गाय का काफी दूध बेचने लगा। थोड़ा समय बीता तो बिरजू को लगने लगा कि यदि उसके पास गाय की जगह भैंस होती तो कितना अच्छा होता। वह सारा दूध बेच भी लेता जिससे उसकी आय बढ़ जाती और घर में बच्चों व पत्नी को भी दूध की कमी न रहती।

वह परेशान रहने लगा। एक दिन वह विचारों में खोया था कि उसे पुनः ईश्वर के दर्शन हुए। ईश्वर बोले-”क्या बात है पुत्र, बहुत परेशान लगते हो।“

बिरजू बोला-”प्रभु, आपकी कृपा से मुझे गाय मिल गई परंतु यदि मेरे पास गाय की जगह एक तगड़ी भैंस होती तो मैं ज्यादा सुखी हो जाता। परंतु तब मुझे यह बात सूझी ही न थी।“

”चिंता क्यों करते हो पुत्र! मैं तुम्हारी इच्छा पूरी किए देता हूं।“ कहकर ईश्वर अन्तर्धान हो गए।

बिरजू को भैंस मिल गइ। उसकी भैंस सुबह-शाम 15 किलो दूध देती। वह दूध हलवाई के यहां बेंच आता। इस तरह उसकी आमदनी बढ़ गई। वह खुश रहने लगा। उसके बच्चे स्कूल जाने लगे। पत्नी अच्छे कपड़े पहनने लगी।

कुछ दिन बाद बिरजू फिर सोचने लगा कि एक भैंस से क्या काम चलता है। उसने गलती की जो ईश्वर से एक भैंस मांगी, उसे कम से कम पांच भैंसे मांगनी चाहिए थीं।

वह आंखे बंद किए सोच ही रहा था कि ईश्वर ने उसे पुनः दर्शन दिए और पूछा-”क्या बात है पुत्र, तुमने गाय मांगी, मैंने तुम्हें गाय दी। फिर भी तुम सुखी नही हुए। फिर तुमने भैंस मांगी, मैंने तुम्हें भेंस दी। पंरतु तुम अभी भी परेशान और दुखी दिखाई देते हो।“

”प्रभु, यह ठीक है-” कि मंैने भैंस मांगी थी, परंतु एक भैंस से घर के खर्च पूरे नहीं हो पाते, इस कारण मैं परेशान हूं।“ बिरजू बोला।

ईश्वर बोले-”फिर क्या चाहते हो? चलो मैं तुम्हारी एक इच्छा और पूरी कर देता हूं, लेकिन यह अंतिम इच्छा होनी चाहिए।“

बिरजू सोचने लगा कि अभी तक मैं पांच भैंसे लेने की सोच रहा था। लेकिन भगवान कह रहे हैं तो अब मुझे अंतिम इच्छा पूरी करा लेनी चाहिए। अतः मुझे पांच की जगह दस भैंसे मांगनी चाहिए। अतः बिरजू बडे़ विचार के बाद बोला-”प्रभु, छोटा मुंह बड़ी बात न समझें तो मुझे दस भैंस दिलवा दें। फिर मैं आपसे कुछ नहीं मागूंगा।“

प्रभु बोले, ”ऐसा ही होगा।“ और अन्तर्धान हो गए। बिरजू बहुत खुश हो गया।

अब उसके सामने समस्या हुई कि इतनी भैंसों को रखे कहां? वह मुसीबत में पड़ गया। इतनी सारी भैंसे रखने के लिए बहुत सारी जमीन चाहिए थी। जमीन के भाव बहुत ऊंचे थे।

उसने दिमाग पर जोर लगाया और दो भैंसे बेचकर थोड़ी-सी जमीन खरीद ली। उसके चारों तरफ बाड़ लगा दी और भैंसो की देखभाल करने लगा। लेकिन इतनी सारी भैंसों की देखभाल करना उसके अकेले के वश में नहीं था।

कभी भैंसों के लिए चारे की जरूरत होती, तो कभी भैंसों का गोबर साफ करना होता। कभी इतनी सारी भैंसा का दूध निकालने की समस्या होती।

इस काम में सहायता के लिए उसने 2-3 नौकर रख लिए। सब नौकरी अलग-अलग काम करते थे। कोई गोबर उठाता, कोई सफाईकरता, तो कोई भैंसों का दूध दुहता। फिर उसने उन भैंसों का दूध जगह-जगह भेजने का प्रबन्ध कर दिया। इस काम के लिए दो लड़के रख लिये जो घर-घर दूध बेचने जाते थे।

बिरजू की डेयरी चल निकली, उसके पास धन की कमी न रही। अब उसके दोनों बच्चे बड़े होने लगे थे। उन बच्चों की बड़ी-बड़ी फरमाइशें होने लगीं। पत्नी को रोज जेवरों की चाह बनी रहती।

कुछ दिन यूं ही बात गए। धीरे-धीरे बिरजू को लगने लगा कि उसने कैसा गंदा धंधा कर रखा है। डेयरी में चारों तरफ मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं, हर तरफ गोबर पड़ा रहता है।

बिरजू सोचने लगा कि वह शहर में होता तो अपने बच्चों को अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाता। क्या ही अच्छा होता कि उसकी भैंस और दूध के कारोबार की जगह शहर में कोई अच्छा व्यापार या दुकान होती या कोई छोटी-मोटी फैक्टरी होती।

धीरे-धीरे बिरजू अपने काम से ऊब कर परेशान रहने लगा। वह बार-बार ईश्वर को याद करने लगा। वह सोचता कि किसी तरह एक बार प्रभु उसे फिर दर्शन दे दें तो कितना अच्छा हो। मैंने मांगा भी तो क्या? भैंसे और दूध का व्यापार? यह भी कोई काम है? उसे कोई ढंग का काम मांगना चाहिए था।

एक दिन वह बैठा ईश्वर की प्रार्थना कर रहा था कि उसे लगा कि ईश्वर उसके सामने हैं। उसने आंखे उठाकर देखा तो ईश्वर के साक्षात् दर्शन किए। वह ईश्वर के पैरों में गिर पड़ा और गिड़गिड़ाकर बोला-”हे प्रभू मैं तो निरा बेवकूफ हूं। मैंने आपसे जो मांगा सो आपने दिया। परंतु जाने क्या सोचकर मैंने आपसे भैसें मांग ली, मुझे इनकी कतई जरूरत नहीं। आप मेरी एक इच्छा और पूरी कर दीजिए फिर मैं आपसे कभी कुछ नही मांगूंगा।“

ईश्वर बोले-”उठो वत्स, मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि यह आखिरी इच्छा है, सोच-समझ कर मांगना और तुमने खूब सोच-विचार कर दस भैंसें मांगी थी। अब तुम कहते हो कि तुम्हें भैंसे नहीं चाहिए। लेकिन मैं मजबूर हूं क्योंकि तुम्हारी इच्छाएं अनन्त हैं। एक के बाद दूसरी इच्छा जन्म लेती जाती है। तुम जैसे थे वैसे ही रहो।“

यह कहकर ईश्वर अन्तर्धान हो गए। धीरे-धीरे बिरजू के व्यापार में घाटा हो गया। भैंसे बीमार होकर मरने लगीं। कुछ दिन बाद घर की वही पुरानी हालत हो गई। वह दूसरों के गाएं चराने लगा और उसी तरह चरवाहा बन कर गरीबी का जीवन बिताने लगा।

निन्यानवे का चक्कर (Chase of 100 coins)

An Indian folk story in which Teerath and Kalyani forgets to live their own life in their chase to get 1 extra coin to complete their collection of 100 coins. They end up on 99 coins.

Moral of the Story: Desire Never Ends.

Complete Story in Hindi

प्राचीनकाल की बात है। असम के ग्रामीण इलाके में तीरथ नाम का कुम्हार रहता था। वह जितना कमाता था, उससे उसका घर खर्च आसानी से चल जाता था।  उसे अधिक धन की चाह नहीं थी। वह सोचता था कि उसे अधिक कमा कर क्या करना है। दोनों वक्त वह पेट भर खाता था, उसी से संतुष्ट था।

hindi story for children with moralवह दिन भर में ढेरों बर्तन बनाता, जिन पर उसकी लागत साठ-आठ रूपये आती थी। अगले दिन वह उन बर्तनों को बाजार में बेच आता था। जिस पर उसे डेढ़ या दो रूपये बचते थे। इतनी कमाई से ही उसकी रोटी का गुजारा हो जाता था, इस कारण वह मस्त रहता था।

रोज शाम को तीरथ अपनी बांसुरी लेकर बैठ जाता और घंटों उसे बजाता रहता। इसी तरह दिन बीतते जा रहे थे। धीरे-धीरे एक दिन आया कि उसका विवाह भी हो गया। उसकी पत्नी का नाम कल्याणी था।

कल्याणी एक अत्यंत सुघड़ और सुशील लड़की थी। वह पति के साथ पति के काम में खूब हाथ बंटाने लगी। वह घर का काम भी खूब मन लगाकर करती थी। अब तीरथ की कमाई पहले से बढ़ गई। इस कारण दो लोगों का खर्च आसानी से चल जाता था।

तीरथ और कल्याणी के पड़ोसी यह देखकर जलते थे कि वे दोनों इतने खुश रहते थे। दोनों दिन भर मिलकर काम करते थे। तीरथ पहले की तरह शाम को बांसुरी बजाता रहता था। कल्याणी घर के भीतर बैठी कुछ गाती गुनगुनाती रहती थी।

इस पर तीरथ बोला-”हमें ज्यादा कमा कर क्या करना है? ईश्वर ने हमें इतना कुछ दिया है, मैं इसी से संतुष्ट हूं। चाहे छोटो ही सही, हमारा अपना घर है। दोनों वक्त हम पेट भर कर खाते हैं, और हमें क्या चाहिए?“

इस पर कल्याण बोली-”मैं जानती हूं कि ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है और मैं इसमंे खूब खुश भी हूं। परन्तु आड़े वक्त के लिए भी हमें कुछ न कुछ बचाकर रखना चाहिए।“

तीरथ को कल्याणी की बात ठीक लगी और दोनों पहले से अधिक मेहनत करने लगे। कल्याणी सुबह 4 बजे उठकर काम में लग जाती। तीरथ भी रात देर तक काम करता रहता। लेकिन फिर भी दोनों अधिक बचत न कर पाते। अतः दोनों ने फैंसला किया कि इस तरह अपना सुख-चैन खोना उचित नहीं है और वे पहले की तरह मस्त रहने लगे।

एक दिन तीरथ बर्तन बेचकर बाजार से घर लौट रहा था। शाम ढल चुकी थी। वह थके पैरों खेतों से गुजर रहा था कि अचानक उसकी निगाह एक लाल मखमली थैली पर गई। उसने उसे उठाकर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। थैली में चांदी के सिक्के भरे थे।

तीरथ ने सोचा कि यह थैली जरूर किसी की गिर गई है, जिसकी थैली हो उसी को दे देनी चाहिए। उसने चारों तरफ निगाह दौड़ाई। दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दिया। उसने ईश्वर का दिया इनाम समझकर उस थैली को उठा लिया और घर ले आया।

घर आकर तीरथ ने सारा किस्सा कल्याणी को कह सुनाया। कल्याणी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया।

तीरथ बोला-”तुम कहती थीं कि हमें आड़े समय के लिए कुछ बचाकर रखना चाहिए। सो ईश्वर ने ऐसे आड़े समय के लिए हमें उपहार दिया है।“

”ऐसा ही लगता है।“ कल्याणी बोली-”हमें गिनकर देखना चाहिए कि ये चांदी के रुपये कितने हैं।“

दोनों बैठकर रुपये गिनने लगे। पूरे निन्यानवे रुपये थे। दोनों खुश होकर विचार विमर्श करने लगे। कल्याणी बोली-”इन्हें हमें आड़े समय के लिए उठा कर रख देना चाहिए, फिर कल को हमारा परिवार बढ़ेगा तो खर्चे भी बढ़ेगे।“

तीरथ बोला-”पर निन्यानवे की गिनती गलत है, हमें इन्हें सौ पूरा करना होगा, फिर हम इन्हें बचा कर रखेंगे।“

कल्याणी ने हां में हां मिलाई। दोनों जानते थे कि चांदी के निन्यानवे रुपये को सौ रुपये करना बहुत कठिन काम है, परंतु फिर भी दोनों ने दृढ़ निश्चय किया कि इसे पूरा करके ही रहेंगे। अब तीरथ और कल्याणी ने दुगुनी-चैगुनी मेहनत से काम करना शुरु कर दिया। तीरथ भी बर्तन बेचने सुबह ही निकल जाता, फिर देर रात तक घर लौटता।

इस तरह दोनों लोग थक कर चूर हो जाते थे। अब तीरथ थका होने के कारण बांसुरी को नहीं बजाता था, न ही कल्याणी खुशी के गीत गाती गुनगुनाती थी। उसे गुनगुनाने की फुरसत ही नहीं थी। न ही वह अड़ोस-पड़ोस या मोहल्ले में कहीं भी जाती थी।

दिन-रात एक करके दोनों लोग एक-एक पैसा जोड़ रहे थे। इसके लिए उन्होंने दो वक्त के स्थान पर एक वक्त भोजन करना शुरु कर दिया, लेकिन चांदी के सौ रुपये पूरे नहीं हो रहे थे।

यूं ही तीन महीने बीत गए। तीरथ के पड़ोसी खुसर-फुसर करने लगे कि इनके यहां जरूर कोई परेशानी है, जिसकी वजह से ये दिन-रात काम करते हैं और थके-थके रहते हैं।

किसी तरह छः महीने बीतने पर उन्होंने सौ रुपये पूरे कर लिए। अब तक तीरथ और कल्याणी को पैसे जोड़ने का लालच पड़ चुका था। दोनों सोचने लगे कि एक सौ से क्या भला होगा। हमें सौ और जोड़ने चाहिए। अगर सौ रूपये और जुड़ गए तो हम कोई व्यापार शुरू कर देंगे और फिर हमारे दिन सुख से बीतेंगे।

उन्होंने आगे कभी उसी तरह मेहनत जारी रखी। इधर, पड़ोसियों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। एक दिन पड़ोस की रम्मो ने फैसला किया कि वह कल्याणी की परेशानी का कारण जानकर ही रहेगी। वह दोपहर को कल्याणी के घर जा पहुंची। कल्याणी बर्तन बनाने में व्यस्त थी।

रम्मो ने इधर-उधर की बातें करने के पश्चात् कल्याणी से पूछ ही लिया-”बहन! पहले तो तुम रोज शाम को मधुर गीत गुनगुनाती थीं आजकल तुम्हारा गीत सुनाई नहीं देता।“

कल्याणी ने ‘यूं ही’ कहकर बात टालने की कोशिश की और अपने काम में लगी रही। परंतु रम्मो कब मानने वाली थी। वह बात को घुमाकर बोली-”आजकल बहुत थक जाती हो न? कहो तो मैं तुम्हारी मदद कर दूं।“

कल्याणी थकी तो थी ही, प्यारे भरे शब्द सुनकर पिघल गई और बोली-”हां बहन, मैं सचमुच बहुत थक जाती हूं, पर क्या करूं हम बड़ी मुश्किल से सौ पूरे कर पाए हैं।“

”क्या मतलब?“ रम्मो बोली तो कल्याणी ने पूरा किस्सा कह सुनाया। रम्मो बोली-“बहन, तुम दोनों तो गजब के चक्कर में पड़ गए हो, तुम्हें इस चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए था। यह चक्कर आदमी को कहीं का नहीं छोड़ता।“

कल्याणी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा-“तुम किस चक्कर की बात कर रही हो? मैं कुछ समझी नहीं।“

”अरी बहन, निन्यानवे का चक्कर।“ रम्मो का जवाब था।

अनोखी तरकीब (Friendship of Mangal and Devdhar)

Friendship between friends is destroyed when one does cheating. They become friends again when the later does confession and says sorry for his act.

Moral of the Story: Bond of Friendship is very Strong.

Full Story in Hindi

देवधर और मंगल की मित्रता ऐसी थी, जैसे दोनों एक ही शरीर के दो अंग हों। यदि को चोट लगती तो तकलीफ दूसरे को होती। वे दोनों बचपन से ही मित्र थे।

hindi short story for kids with moralअब उनकी मित्रता इतनी पुरानी हो चुकी थी कि लोग उनकी दोस्ती का उदाहरण देते थे। देवधर और मंगल बड़े हो चुके थे। दोनों का अलग-अलग व्यापार था। एक दिन दोनों ने तय किया कि वे दोनांे मिलकर व्यापार करेंगे।

फिर दोनों ने मिलकर व्यापार शुरु कर दिया। उनका व्यापार चल निकला और दोनों खूब अमीर हो गए। वे ठाठ-बाट से रहने लगे। धीरे-धीरे एक समय आया कि दोनों का विवाह हो गया।

उनको साथ-साथ व्यापार करते 7-8 वर्ष बीत चुके थे। तभी देवधर के मन में न जाने कहां से बेईमानी आ गई और वह व्यापार में हेरा-फेरी करने लगा। मंगल बहुत सीधा और नेक इंसान था। उसे इस गड़बड़ी की भनक तक नहीं लगी। देवधर व्यापार में घाटा दिखाता जा रहा था। एक दिन ऐसा आया कि मंगल उस व्यापार का का भागीदार ही नहीं रहा। मंगल ने ऐसा धोखा जिन्दगी में पहली बार खाया था।

धीरे-धीरे वह बहुत चुप रहने लगा। वह किसी से भी बात नहीं करता था। वह न हंसता था, न बोलता था। इस कारण उसकी पत्नी बहुत परेशान रहने लगी। एक तरफ तो घर में आर्थिक तंगी रहने लगी, दूसरी तरफ मंगल बीमार रहने लगा।

मंगल की पत्नी शन्नो ने डाॅक्टर-वैद्य से खूब इलाज कराया, किंतु कोई फायदा नहीं हुआ। किसी डाॅक्टर को उसकी बीमारी समझ में नहीं आती थी। मंगल दिन पर दिन कमजोर होता जा रहा था।

दूसरी तरफ देवधर अपने काम में मस्त था। उसने हेरा-फेरी करके खूब धन जमा कर लिया था। अब अपना अलग व्यापार करके खूब धन कमा रहा था। अपनी पत्नी के लिए उसने ढेरों गहने बनवा दिए थे। गांव के लोग ऐसा विश्वासघात देखकर कानों पर हाथ रख लेते थे। लोगांे को देवधर की बेईमानी का खूब पता था, लेकिन कोई भी खुलकर सामने नहीं आता था।

एक दिन मंगल का चचेरा भाई सोमदत्त शहर से आया। वह मंगल की हालत देखकर हैरान गया। मंगल की पत्नी ने चिन्तित होते हुए कहा-”देवर जी, अपने भैया का कुछ इलाज कराओ, हम तो गांव में इलाज करवा के हार गए, परंतु कोई फायदा नहीं हुआ।“

सोमदत्त ने शन्नो से मंगल की हालत के बारे में विस्तार से जानकारी ली और बोला-”भाभी, मंगल का इलाज डाॅक्टर-वैद्य के पास नहीं है। उसका इलाज कुछ और ही है।“

फिर सोमदत्त ने शन्नो को बताया कि जब तक देवधर मंगल से माफी नही मांगेगा। मंगल ठीक नहीं होगा। परंतु शन्नो ने बताया कि देवधर अब बहुत धनी और घमंडी हो गया है, उसका माफी मांगना नामुमकिन है। हम गरीब उसके सामने टिक नहीं सकेंगे।

सोमदत्त ने कहा कि मैं इस नामुमकिन को मुमकिन करके दिखाऊंगा। मैं बिना धन के ही उसे नीचा दिखाऊंगा। उसने अगले दिन से ही अपनी योजना पर काम करना शुरु कर दिया।

अगले दिन जब देवधर अपने घोड़े पर बैठकर अपनी दुकान पर जा रहा था तो उसने देखा कि एक आदमी ने उसकी तरफ देखा और जोर से हंस दिया।

देवधर को लगा कि कोई यूं ही हंस रहा होगा। वह थोड़ी ही दूर गया था कि चार लोग खड़े आपस में बातें कर रहे थे। वह जैसे ही उन चारों के सामने से गुजरा, उनमें से एक ने उसकी तरफ देखा और कुछ कहा कि सारे लोग जोर-जोर से हंसने लगे।

देवधर को लगा कि सब लोग उसकी तरफ देखकर हंस रहे हैं। हो सकता है कि उसकी पगड़ी टेढ़ी हो, उसने अपनी पगड़ी को ठीक करने का प्रयास किया तो घोड़े से गिरते-गिरते बचा।

अब वह अपनी दुकान पहुंच चुका था। ज्यों ही उसने दुकान का ताला खोला, एक छोट-सा बालक उधर से जोर-जोर से हंसता हुआ गुजरा। देवधर को अब थोड़ा क्रोध आने लगा था। उसने बालक को बुलाकर पूछा-”ऐ लड़के क्यों हंसता है?“

लड़के ने कहा-”यूं ही“ और चला गया।

देवधर का मन आज दुकान में नहीं लग रहा था। उसे लगता था कि आज जरूर कहीं कोई गड़बड़ है। कभी वह शीशे में देखता, कभी अपने कपड़ों पर निगाह दौड़ाता, परंतु उसे समझ न आता।

दोपहर को एक दाढ़ी वाला व्यापारी उनकी दुकान पर आया और उसने बड़ा सौदा तय कर लिया। परंतु देवधर का ध्यान आज कहीं और था। उस दाढ़ी वाले व्यापारी ने 2-3 बार अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा और देवधर की ओर देखकर जोर-जोर से हंसने लगा, फिर बोला-”सेठ, सौदा फिर कभी करूंगा।“

देवधर को लगा कि उसकी दाढ़ी में कुछ लगा है, वह बार-बार अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरने लगा। जैसे-तैसे दिन बीता। आज उसका व्यापार में मन नहीं लगा था, इस कारण बिक्री भी कम हुई थी।

घर जाकर देवधर ने सारी बात अपनी पत्नी को बताई, वह सुनकर परेशान हो गई। उसने उसके कपड़ों, पगड़ी व दाढ़ी पर निगाह डाली, उसे सब कुछ ठीक-ठाक लगा।

अगले दिन फिर जब वह कहीं काम से जा रहा था तो फिर उसने लोगों को कानाफूसी करते व हंसते देखा। अब उसे हर समय यही लगने लगा कि हो न हो, लोग उसकी बेईमानी की चर्चा कर रहे हैं। उसने दो-चार बार लोगों की बात सुनने की कोशिश की तो उसे अपने बारे में एक भी शब्द सुनाई नहीं दिया।

अब वह जहां जाता लोग हंसते दिखाई देते। उसने सोचा कि लोग यूं ही उसका मजाक बना रहे है, उसे उन सबको सबक सिखाना चाहिए। अगले दिन जब कोई व्यक्ति उस पर हंसा तो वह चिल्ला कर बोला-”पागल, पागल कहीं का।“

उधर से उस व्यक्ति ने भी वही शब्द दोहरा दिए। सुनकर देवधर क्रोध से आगबबूला हो उठा। धीरे-धीरे एक सप्ताह में हालत यह हो गई कि वह जिधर से निकलता लोग कहते-”पागल, पागल कहीं का।“ सुनकर वह बौखला उठता और सचमुच पागलों जैसी हरकतें  करने लगता। उसका व्यापार मंदा पड़ने लगा। धीरे-धीरे उसकी हालत खराब होने लगी।

अगले दिन गांव के जमींदार के यहां उसके बेटे की शादी थी। जमींदार ने सारे गांव के लोगों को दावत पर बुलाया। देवधर भी खूब अच्छे कपड़े पहन सज-धज कर दावत खाने पहुंचा। सोमदत्त भी वहां पहुंच गया।

जमींदार खुशी से लोगों से मिल रहा था और उनका अभिवादन कर रहा था। सोमदत्त जमींदार के पास जाकर फुसफुसाकर बोला-”आप गांव के सबसे धनी व्यक्ति ने नहीं मिलेंगे। ये जो सामने दाढ़ी वाले सज्जन हैं, वो अपने आपकेा आपसे भी बड़ा जमींदार समझते हैं।“

जमींदार खुशी के मूड में था। बात को मजाक में लेते हुए उसने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा फिर हंस कर देवधर की ओर देखा और बोला-”अरे यह तो बड़ा भला आदमी है।“ फिर आगे बढ़ गया। देवधर को लगा कि वह व्यक्ति वही आदमी है जो पहले दिन उसे देखकर हंसा था। उसके बाद ही सब लोग उसकी तरफ देखकर हंसने लगे। हो न हो यह कोई राज की बात है,जो आज जमींदार भी हंस रहा है। वह व्यक्ति उनकी कोई शिकायत कर रहा है या उसकी दाढ़ी में कोई गड़बड़ है। उसने झट से अपनी दाढ़ी में हाथ फेरा और परेशान हो उठा।

वह झट से सोमदत्त से मिलने भागा, परंतु वह तब तक गायब हो चुका था।

अगले दिन गांव के जमींदार के यहां उसके बेटे की शादी थी। जमींदार ने सारे गांव के लोगों को दावत पर बुलाया। देवधर भी खूब अच्छे कपड़े पहन सज-धज कर दावत खाने पहुंचा। सोमदत्त भी वहां पहुंच गया।

जमींदार खुशी से लोगों से मिल रहा था और उनका अभिवादन कर रहा था। सोमदत्त जमींदार के पास जाकर फुसफुसाकर बोला-”आप गांव के सबसे धनी व्यक्ति से नहीं मिलेंगे। ये जो सामने दाढ़ी वाले सज्जन हैं, वो अपने आपको आपसे भी बड़ा जमींदार समझते हैं।

जमींदार खुशी के मूड में था। बात को मजाक में लेते हुए उसने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा फिर हंस कर देवधर की ओर देखा और बोला-”अरे यह तो बड़ा भला आदमी है।“ फिर आगे बढ़ गया। देवधर को लगा कि वह व्यक्ति वही आदमी है जो पहले दिन उसे देखकर हंसा था। उसके बाद ही सब लोग उसकी तरफ देखकर हंसने लगे। हो न हो यह कोई राज की बात है, जो जमींदार भी हंस रहा है। वह व्यक्ति उसकी कोई शिकायत कर रहा है या उसकी दाढ़ी में कोई गड़बड़ है। उसने झट से अपनी दाढ़ी में हाथ फेरा और परेशान हो उठा।

वह झट से सोमदत्त से मिलने भागा, परंतु वह तब तक गायब हो चुका था।

अगले दिन सुबह देवधर ने सबसे पहले दाढ़ी-मूंछे साफ करवाई, फिर सोमदत्त को ढंूढने निकल पड़ा। उसके मन में जमींदार की बात को जानने की बेचैनी थी। थोड़ी ही दूर जाने पर उसे सोमदत्त जाता दिखाई दिया। उसने सोमदत्त से रात की सारी बात पूछी तो सोमदत्त ने कहा-”मैं एक ही शर्त पर तुम्हें जमींदार की बात बता सकता हूं। तुम्हें मेरी एक बात माननी पड़ेगी।“

देवधर बोला-”भैया, धन मांगने के अलावा जो तुम कहो वही मानूंगा।“ यह सुनकर सोमदत्त देवधर को पास ही मंगल के घर ले गया और बोला-”पहले इनसे माफी मांगो फिर बताऊंगा।“

देवधर ने पलंग पर लेटे व्यक्ति से तुरंत माफी मांग ली, ”भैया मुझे माफ कर दो।“ तो वह व्यक्ति पलंग से उठ कर बैठ गया। उसके चेहरे पर पतली-सी मुस्कान की रेखा खिंच गई। देवधर यह देखकर हैरान रह गया कि वह उसका अपना मित्र मंगल था। उसकी इतनी दुर्बल और बीमार हालत के कारण वह अपने बचपन के मित्र को पहचान नहीं सका था। उसे पश्चाताप होने लेगा।

तभी सोमदत्त ने बताया कि जमींदार ने तो उसकी प्रशंसा की थी। लेकिन सोमदत्त पश्चाताप की अग्नि में जल रहा था। उसने अपने मित्र से अपने किए पर पुनः माफी मांगी और गले से लगा लिया।

धीरे-धीरे मंगल अच्दा होने लगा। दोनों में फिर दोस्ती हो गई फिर उनकी दोस्ती जीवन भर चलती रही।

चम्मच का सूप (Farmer makes spoon-soup)

Story of a farmer who stops midway on a rainy day in a hut of an elderly lady. She refuses to give him food. Rest of the story is how he applies his brain and prepares tomato soup for himself.

Moral of the Story: Use your brain, make things easier for yourself.

Complete Story in Hindi

एक बार एक किसान किसी काम से शहर गया। जैसे ही शाम होने लगी, उसे लगा कि उसे तुरंत गांव लौट जाना चाहीए। अगर देर हो गई तो अंधेरे में घर पहुंचना मुश्किल हो जाएगा। वह अपना काम अधूरा छोड़कर गांव की ओर चल दिया।

short story for kids with moralवह थोड़ी ही दूर गया था कि अचानक बादल घिर आए, ठंडी हवाएं चलने लगीं। उसने अपनी चाल तेज कर दी। परंतु कुछ ही देर में बूंदा-बांदी होने लगी। किसान ने सोचा कि अगर मैं तेज चलूं तो शायद रात होन से पहले अपने घर पहुंच जाऊंगा।

परंतु मौसम को यह मंजूर नहीं था। काली घटाओं के कारण जल्दी ही अंधेरा छाने लगा। वारिश भी तेज होने लगी। किसान ने आगे बढना ठीक नहीं समझा। आगे जंगल का खतरनाक रास्ता था, एक तो खराब मौसम ऊपर से जंगली रास्ता सोचकर किसान डर के मारे कांपने लगा।

वह एक छोटे से घर के आगे बरामदे में दुबक कर बैठ गया। परंतु ठंडी हवाओं के कारण उसे सर्दी लगने लगी। रात होते-होते उसे सर्दी के साथ-साथ भूख भी लगने लगी। उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। वह सोचने लगा कि इस समय थोड़ा-सा कुछ गरम खाने को मिल जाता तो उसकी सर्दी भी मिट जाती और भूख भी कम हो जाती।

उसने डरते-डरते घर की कुंडी खटखटाई। अंदर से बुढि़या ने दरवाजा खोला। बुढि़या उस घर में अकेली रहती थी। उसने हिम्मत करके पूछा-”तुम कौन हो? और इस तूफानी रात में मेरे दरवाजे पर क्या कर रहे हो ?“

किसान ने विनम्र होते हुए कहा-”मैं एक गरीब किसान हूं। मेरा नाम चोखे है। शहर में कुछ काम से आया था। अब बारिश के कारण यहां फंस गया हूं।“

बुढि़या हट्टे-कट्टे जवान को देखकर भीतर से घबरा गई थी। परंतु ऊपर से हिम्मत दिखाते हुए बोली-”तो मुझसे क्या चाहते हो ?“

”मां जी, मुझे बहुत सर्दी लग रही है और साथ ही जोर से भूख लगी है। अगर आप मुझे अंदर आने देंगी और कुछ खिला देंगी तो मैं आपका एहसान जिन्दगी भर नहीं भूलूंगा।“

बुढि़या ने उसे टालने की गरज से कहा- ”चोखे, मेरे पास आज खाने को कुछ नहीं है, वरना तुम्हें कुछ न कुछ जरूर खिला देती।“

चोखे को दरवाजे के सामने ही रसोई में एक चम्मच दिखाई दिया। उसने कहा- ”कोई बात नहीं मां जी, मैं चम्मच का सूप बना कर पी लूंगा। आपके घर मंे चम्मच तो है न?“

रसोई में चम्मच सामने ही पड़ा था, अतः बुढि़या कुछ बहाना न बना सकी। वह सोचने लगी मुझे तो चम्मच का सूप बनाना नहीं आता और भला चम्मच का सूप कैसे बनता है मैं भी तो देखूं। उसने किसान को भीतर आने दिया।

किसान ने चूल्हा जला दिया और सूप बनाने के लिए पतीला मांगा। फिर चम्मच को रगड़-रगड़ कर साफ किया। बुढि़या चोखे को निहार कर देखे जा रही थी।

किसान ने बड़े पतीले में पानी भर कर उसमें चम्मच डाल दिया। पानी गरम होने लगा। इस बीच किसान ने कहा- ”मां जी मेरा नाम तो चोखे है ही, मैं सूप भी बड़ा चोखा बनाता हूं।“

इतनी देर में पानी से भाप निकलने लगी। किसान बोला-”मां जी जरा-सा नमक होगा?“

बुढि़या नमक के लिए भला क्या मना करती, सो नमक का डिब्बा उठाकर किसान को दे दिया। किसान ने आधा चम्मच नमक उसमें डाल दिया और चलाने लगा।

कुछ ही मिनटों में पानी उबलने लगा। किसान ने उसे निकाल कर चखा। बुढि़या देखकर हैरान हुई जा रही थी। इतने में किसान बोला-”सूप तो बड़ा स्वादिष्ट बन रहा है, लेकिन इसमें कोई सब्जी पड़ जाती तो मजा आ जाता।“

”कौन-सी-सब्जी चाहिए, एक दो सब्जी तो मेरे पास भी हैं।“ बुढि़या बोली।

”टमाटर, लौकी, कद्दू, आलू कुछ भी चलेगा।“ किसान ने कहा।

बुढि़या ने सोचा, चलो आज नया सूप सीखने को मिल रहा है, तो उसने तीन-चार टमाटर किसान को दे दिए। किसान ने उन्हें चाकू से काट कर डाल दिया और चम्मच से दबा-दबा कर चलाने लगा।

किसान बोला-”आज तो वाकई बहुत स्वादिष्ट सूप बना लगता है। बहुत अच्छी खुश्बू आ रही है। मैं अभी आपको चखाता हू।“

बुढि़या मन ही मन खुश होने लगी कि आज उसने चम्मच का सूप बनाना सीख लिया है। किसान ने थोड़ा-सा सूप चम्मच में निकाला फिर बुढि़या से बोला-”माँ, जी अगर आप इसे चखने से पहले चुटकी भर चीनी डाल लेंगी तो आपको अधिक स्वादिष्ट लगेगा।“

बुढि़या ने चोखे का मतलब समझ लिया कि इसे सूप में डालने के लिए चम्मच भर चीनी चाहिए और किसान ने चीनी सूप में डाल दी। फिर किसान ने चम्मच से सूप को दो कटोरी में डाल दिया। वह बुढि़या से बोला-”देखिए चम्मच का सूप कितना चोखा बना है।“

बुढिया ने सूप चखा तो दंग रह गई। बोली-”आज तक मैंने चम्मच का सूप न कभी सुना, न चखा, परंतु यह तो वास्तव में बहुत स्वादिष्ट है।“

बुढि़या और किसान बैठकर गर्म सूप का आनंद लेने लगे। उनके पास से सर्दी कब की उड़न-छू हो चुकी थी।

बातों का फेर (Roger win 3 cattles in challenge)

A Russian folk tale in which a kid first boast of dining with ruthless village landlord and then enters into a challenge with his friend for doing the same again. Rest of the story is how he uses his brain to dine with village landlord to win 3 cattles in the challenge.

Complete Short Story in Hindi

गांव के किसान के बेटे की शादी का मौका था। घर में खूब रौनक हो रही थी। स्त्रियां घर में खुशी के गीत गा रही थीं। बाहर चबूतरे पर घर के तथा गांव के अनेक लोग जमा थे।

खूब हंसी-मजाक का माहौल था। सब अपनी-अपनी बातें सुना रहे थे और हंस रहे थे। इस बीच गांव का एक दुकानदार शेखी बघारते हुए बोला – “जानते हो कल क्या हुआ?”

सब ने पूछा – “क्या हुआ?”

“मेरी मुलाकात गांव के जमींदार ठाकुर से हुई। ठाकुर साहब ने मुझसे मेरे हाल-चाल पूछे।” दुकानदार बोला।

सारे लोग कहने लगे – “ऐसा तो हो ही नहीं सकता। ठाकुर एक नंबर का घमंडी और खूसट है। किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता।”

उन सबकी बातों को किसान का अठारह वर्षीय बेटा रोजर सुन रहा था। वह बोला – “अरे चाचा, तुम तो मुलाकात की बात करते हो, मैं तो ठाकुर के साथ भोजन करके आ सकता हूं।”

सब लोग सुनकर हंसने लगे। फिर एक बुजुर्ग समझाने लगा – “बेटा सोच-समझकर अपनी हैसियत से बात करते हैं। ऊंचे-ऊंचे ख्वाब नहीं देखा करते। हमारी इतनी हैसियत कहां है कि वह ठाकुर के दर्शन भी कर सकें।”

रोजर हंसने लगा। वह बातों में सबसे आगे था और बुद्धिमान भी था। अपना गुस्सा दबाते हुए बोला – “दादा जी, मैं कोई गप्प नहीं हांक रहा हूं, सच कह रहा हूं।”

दुकानदार रोजर की बात सुनकर मन मन खिसियाने लगा। अपना गुस्सा दबाते हुए बोला – “बेटा रोजर, तुमने अगर ठाकुर के घर भोजन करके दिखा दिया तो मैं तुम्हें बड़ा इनाम दूंगा। ज्यादा सपने नहीं देखा करते बच्चे।”

“अच्छा, क्या बड़ा इनाम दोगे? अपने दोनों घोड़े मुझे दे दोगे?” रोजर बोला।

“अरे दो घोड़े क्या, एक गाय भी दे दूंगा।” दुकानदार जोश में भरकर बोला, “लेकिन एक बात बताओ, अगर तुम एक दिन के अंदर ठाकुर ठाकुर के साथ भोजन नहीं कर सके तो तुम मुझे क्या दोगे?”

“ठीक है, मै तीन वर्ष तक तुम्हारी गुलामी करूंगा।” रोजर बोला।

सब लोग रोजर की तरफ देखने लगे। रोजर ने असंभव को सभंव करने जैसी बाते कही थी।

अगले दिन सुबह रोजर ठाकुर के यहां पहुंचा तो द्वारपाल ने रोक लिया। रोजर ने उससे कहा – “ठाकुर साहब से पूछकर बताओ कि सोने की ईंटों के बारे में कुछ पूछना है। कहो तो कहीं और जाकर पूछ लू।”

द्वारपाल ने ठाकुर को सारी बात बताई तो ठाकुर सुनकर मन ही मन जिज्ञासु हो उठा। परंतु ऊपर से शांत रहकर बेला – “लड़के को अंदर ले आओ, उसके साथ भोजन आदि का प्रबंध करो।”

रोजर को इज्जत के साथ भीतर ले जाया गया। वहां मेज पर भोजन और फल लगा दिए गए। थोड़ी देकर में ठाकुर आकर रोजर के पास बैठ गया और पूछने लगा – “तुम्हारा क्या नाम है? तुम्हारे पिता क्या कामकरते हैं?”

रोजर बोला – “मेरा नाम रोजर है। मेरे पिता किसान हैं। मैं पूछ रहा था कि सोने की एक ईंट की कीमत क्या होगी?  उसके बदले में क्या-क्या खरीदा जा सकता है?”

ठाकुर की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थ। वह वोला – “सोने की ईंट की कीमत तो हजारों में होगी। तुम चाहो तो उसके बदले में जमीन-जानवर, बहुत कुछ मिल सकता है। वैसे तो ईंट के वजन पर निर्भर करता है कि ईंट की कीमत क्या है? ईंट देख लूं तो पता चले। बोलो कितनी ईंटें हैं तुम्हारे पास? एक या ज्यादा? जाओ जल्दी से ले लाओ। मैं अच्छे दाम दूंगा।” ठाकुर ईंट पाने की लालसा में लगातार बोलता जा रहा था और साथ ही अंगूर खाता जा रहा था।

रोजर चुपचाप बैठा भोजन कर रहा था। ठाकुर को लगा कि शायद रोजर को ईंटों की कीत कुछ कम लग रही है अतः वह प्यार से बोला – “अरे बेटा, जो चाहोगे सो मिल जाएगा। जितनी जमीन चाहिए उतनी जमीन दे दूंगा, जाओ अपनी ईंट ले आओ।”

रोजर बोला – “परंतु मेरे पास सोने की ईंट हैं थोड़े ही, मैं तो यूं ही ईंटों का भाव पूछ रहा था। अगर कल मेरे पास ये ईंटें हों…।”

“भाग यहां से बदमाश, मुझे बेवकूफ बनाता है?” कहकर ठाकुर ने अपने सिपाहियों को जोर से आवाज लगाई।

“अरे आप तकलीफ क्यों करते हो, मैं स्वयं ही चला जाता हूं।” रोजर बोला – “आप मुझे क्या जमीन-जानवर दोगे? मुझे तो इस भोजन के बदले ही दो घोड़े और एक गाय मिलने वाली है।”

जमींदार ठाकुर हत्प्रभ होकर बाूतनी रोजर को जाते हुए देख रहा था।

नेकी का इनाम (Step-mother Realizes her Mistake)

Indian folk tale(lok katha) in which a step mother who dislikes her step-daughter realizes her mistake and starts treating her like own child.

Moral of the Story: Every Child is Equal for a Mother.

Complete Story in Hindi

बुलबुल बहुत ही भोली-भाली लड़की थी। छल-कपट उसे छू तक नहीं गया था। उसके स्वभाव के विपरीत उसकी एक बहन थी-ना था रीना। रीना चालाक, मक्कार और आलसी थी।

hindi story for kids with moral

बुलबुल के साथ प्रकृति ने बहुत बड़ा अन्याय किया था, उसकी मां बचपन में ही परलोक सिधार गई थी। परिवार में बुलबुल की सौतेली मां और सौतेली बहन रीना ही थी। उसके पिता गांव के बाहर काम करते थे। साल में एक बार ही घर आते थे।

बुलबुल की मां बुलबुल को जरा भी प्यार नहीं करती थी। सारा घर का काम बुलबुल से ही कराती थी। रीना और मां दिन भर पलंग पर बैठकर मस्ती करतीं और खाती-पीती रहतीं। बुलबुल बेचारी सारा दिन काम करती, परंतु मां उसे रूखा-सूखा ही खाने को देती। लेकिन बुलबुल फिर भी अपनी मां से कोई शिकायत नहीं करती थी।

रीना भी अपनी मां की आदत का खून लाभ उठाती थी। जब-तब मौका पालक बुलबुल की झूठी शिकायत मां से करती रहती थी। मां इस वजह से बुलबुल की पिटाई करती थी।

एक दिन बुलबुल काम करके थक गई थी। उसे भूख लग रही थी। भूख से उसके पेट में दर्द होने लगा था। उसने मां से कहा-”मां, मेरे पेट में जोर का दर्द है कुछ खाने को दे दो।“

मां बोली-”पेट में दर्द है और खाने को मांग रही है। खाने से तो पेट दर्द और भी बढ़ जाएगा।“

मां के भोजन न देने से बुलबुल भीतर ही भीतर बहुत दुखी थी, परंतुु उसने मां से कुछ नहीं कहा और चुपचाप सारा दिन घर का काम करती रही। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे थे। परंतु उन आंसुओं को पोंछने वाला कोई न था।

आधी रात बीत जाने पर भी बुलबुल बेचारी सो न सकी और उसने घर छोड़ने का फैसला कर लिया। वह रात्रि के अंधेरे में चुपचाप घर से निकल पड़ी और चलते-चलते एक जंगल में पहुंच गई। उसे जोर की भूख लगी थी। सामने ही जामुन का पेड़ था, वह जैसे-तैसे उस पर चढ़ गई और जामुन खाने लगी। पेट भर खाने पर वह नीचे उतर आई।

अब तक दिन निकल चुका था। वह जंगल में इधर-उधर खेलती रही। बुलबुल खुश थी कि आज उसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं था। खेलने में उसे बड़ा आनन्द आ रहा था, क्योंकि घर पर खेलना उसके नसीब में न था।

रात्रि होने पर बुलबुल को डर लगने लगा। उसे अंधेरे से डर लग रहा था अतः वह एक कोने में दुबक कर बैठ गई। थोड़ी ही देर में उसे सर्दी-सी महसूस होने लगी। ज्यांे-ज्यों रात्रि बीत रही थी, ठंड बढ़ती जा रही थी। बुलबुल स्वयं को बचाने के लिए सिकुड़ती जा रही थी। उसे कंपकंपी आ रही थी, अतः उसने आंखे बंद कर ली और सोने का प्रयास करने लगी। परंतु कुछ ही क्षण में उसे अपने सामने तेज रोशनी सी महसूस हुई।

बुलबुल ने आंखे खोलीं तो देखा कि सामने एक बूढ़ी औरत बाल खोले खड़ी थी। उसने सफेद साड़ी पहनी हुई थी। उसके बाल भी सफेद थे। बुलबुल उसे देखकर घबराने लगी, परंतु वह औरत बोली-”बेटी घबराओ नहीं, तुम्हारा क्या नाम है? मैं शरद् ऋतु हूं। मेरे आने से हर तरफ सर्दी बढ़ जाती है, क्या तुम्हें सर्दी अच्छी लगती है?“

बुलबुल ने कहा-”मेरा नाम बुलबुल है। मुझे सर्दी की ऋतु में आनंद आता है। सर्दी के फल संतरे, सेब, अंगूर, सभी मुझे अच्छे लगते हैं। मुझे सर्दियोेमें धूप में खेलना और सोना बहुत अच्छा लगता है। तुम बहुत अच्छी हो मां।“

बुलबुल की बात सुनकर सर्दी खुश हो गई और बुलबुल को एक मोटा मखमली कम्बल देते हुए बोली-”लो यह ओढ़ लो। तुम्हें सर्दी लग रही है। यह थैली रख लो, इसमें ढेर सारा धन और कीमती गहने हैं। यह तुम्हारे लिए मेरा उपहार है, ये तुम्हारी जिन्दगी में काम आएंगे।“

सर्दी की बुढि़या बुलबुल को उपहार देकर अदृश्य हो गई। बुलबुल सारे उपहार पाकर बेहद खुश हुई। उसने थैली को बगल में दबा लिया और कम्बल ओढ़कर सोने का प्रयत्न करने लगी। कम्बल की गर्माहट से कुछ ही क्षणों में बुलबुल को नींद आ गई।

थोड़ी ही देर में बुलबुल को गर्मी-सा महसूस होने लगी। बुलबुल ने कम्बल उठाकर आंखे खोलीं तो देखा कि एक सुंदर व जवान युवती खड़ी थी। उस युवती ने गहरे हरे व पीले वस्त्र पहने हुए थे। उसकी आंखों में चमक थी। उसने बुलबुल को देखकर कहा-”क्या तुम जानती हो कि मैं कौन हूं?“

बुलबुल ने न में सिर हिलाया तो युवती बोली-”मैं ग्रीष्म सुंदरी हूं। मेरे आने से गर्मियों की ऋतु आरंभ हो जाती है। अच्छा, यह बताओ कि तुम्हेें गर्मी की ऋतु कैसी लगती है।“

बुलबुल को खूब गर्मी लगने लगी थी। वह कंबल को एक तरफ सिखकाते हुए बोली-”ग्रीष्म ऋतु में तो मुझे बहुत आनंद आता है। गर्मियों में आम, तरबूत, खरबूजे सभी कुछ खाने में बेहद आनंद आता है। मैं तो कच्चे आम भी पेड़ों से तोड़कर खूब खाती हूं और हां आइसक्रीम का मजा तो गर्मियों में ही आता है। सच, ग्रीष्म ऋतु बहुत पंसद है।“

बुलबुल की बात सुनकर ग्रीष्म खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली- ‘‘सच, तुम बहुत प्यारी लड़की हो, तुमने मेरा दिल खुश कर दिया। मैं तुम्हें कुछ इनाम देना चाहती हूँ। यह लो यह प्लेट तुम्हारे लिए हैं। इस प्लेट में उंगली रखकर जो खाने की इच्छा करोगी, वही हाजिर हो जाएगा।’’

यह कहकर ग्रीष्म सुंदरी गायब हो गई। बुलबुल बहुत खुश थी कि दो ऋतुएं उससे प्रसन्न होकर इनाम दे गई थीं। बुलबुल ने घमंड करना नहीं सीखा था। वह शांत स्वभाव की थी। वह सोने का प्रयास करने लगी, तभी उसे चिडि़यों की चहचहाहट सुनाई पड़ी। बुलबुल ने महसूस किया कि सुबह होने वाली है। वह रात को जगती रही थी, अतः उसे भूख महसूस हो रही थी।

बुलबुल ने प्लेट निकाल कर उस पर अपनी उंगली रख दी और इच्छा की कि उसके लिए दूध हाजिर हो जाए। उसने आंखें खोली तो देखा कि प्लेट में दूध भरा गिलास रखा था।

बुलबुल दूध खत्म करने ही वाली थी कि उसे यूं महसूस हुआ के उसके ऊपर पानी की बूंदे टपक रही हैं। बुलबुल ने सिर ऊपर उठाया तो देखा कि एक सुंदर स्त्री हरे कपड़े पहने खडी थी। वह स्त्री बुलबुल के पास आ गई थी। उसके कपड़े गीले थे और बालों से पानी टपक रहा था। वह बोली-”बुलबुल क्या तुम जानती हो कि मैं कौन हूं? मैं बताती हूं कि मैं कौन हूं?“

बुलबुल सुनकर थोड़ा हैरानी से देखने लगी, तभी स्त्री बोली-”मैं वर्षा ऋतु हूं। मेरे आने से चारों ओर हरियाली छा जाती है। हर पेड़-पौधे में जान आ जाती है। अच्छा, तुम बताओ कि तुम्हें बरसात का मौसम कैसा लगता है?“

बुलबुल हंसते हुए बोली-”अरे बारिश में तो मुझे बेहद आनंद आता है। मैं बारिश में खूब खेलती हूं, नृत्य करती हूं। पानी में कागज की नाव डालकर उनके पीछे-पीछे जाने में मुझे बहुत अच्छा लगता है। वर्षा ऋतु में मीठे जामुन मुझे बहुत भाते हैं।“

वर्षा ऋतु बोली-” यह बताओ कि क्या तुम्हारी मां तुम्हें वर्षा में नृत्य करने देती है? क्या वह तुम्हें प्यार करती हैं?“

बुलबुल बोली-”क्यों नहीं, मेरी मां बहुत अच्छी है और मुझे बहुत प्यार करती है। वह मुझे किसी काम को मना नहीं करती। मुझे मां के पास जाना है।“

यह कहकर बुलबुल रोने लगी। उसे मां की याद आने लगी थी।

वर्षा ऋतु बोली-”बेटी रोओ नहीं। मै। तुम्हें यह चटाई देती हूं। इस पर बैठकर तुम बिल्कुल अभी अपनी मां के पास पहुंच जाओगी। यह अंगूठी रख लो जो चमत्कारी है और सदैव तुम्हें मुश्किलों से बचाएगी।“

इतना कहकर वर्षा ऋतु ओझल हो गई। बुलबुल को अपनी मां की याद सता रही थी। उसने चटाई बिछाई और अपना सारा सामान लेकर उसके ऊपर बैठ गई। कुछ ही क्षणों में वह अपने घर पहुंच गई।

बुलबुल ने देखा कि उसकी मां पड़ोसियों को बुलबुल के गायब होने के बारे में बता रही थी, परंतु बुलबुल को सामने देखकर दुखी हो गई परंतु वह कुछ नहीं कर सकती थीं। बुलबुल ने ज्यों ही सारे उपहार मां को दिए तो मां खुश हो गई और उनके बारे में विस्तार से पूछने लगी।

बुलबुल ने सारी बातें मां को सच बता दीं। मां ने बुलबुल को अंगूठी जबरदस्ती उतारने की कोशिश की परंतु उतर न सकी। मां को लालच आ गया और उसने रीना को भी जंगल भेजने का निश्चय किया।

रीना को जंगल जाने में डर लगा रहा था, परंतु मां के कहने से व नए उपहारों के लालच में वह जंगल की ओर रवाना हो गई। वह चलते-चलते वहां पहुंच गई जहां बुलबुल गई थी।

रात को उसी प्रकार शरद् ऋतु स्त्री के वेश में आई और अपना प्रश्न रीना से पूछा कि कैसी लगती हूं। रीना ने कभी मीठा बोलना सीखा ही न था। उसने सोचा कि बुलबुल को सच बताने का इनाम मिला है। वह तुनकते हुए बोली-”मुझे सर्दी की ऋतु बिल्कुल अच्छी नहीं लगती। इस मौसम मैं धूप नहीं निकलती और मुझे धूप में बैठने की इच्छा होती है। ज्यादा सर्दी के कारण मैं अपनी सहेलियों के साथ खेल भी नहीं पाती। सर्दी में मैं बिस्तर में ही बैठी रहती हूं। मेरी बहन बुलबुल मेरा काम करती रहती है।“

सर्दी ऋतु क्रोधित होे उठी। उसने रीना को एक थैली और कम्बल दिया और गायब हो गई। रीना ने कम्बल ओढ़ा तो उसे यूं लगने लगा कि उसे कीड़े काट रहे हों। उसने देखा कि थैली में भी कीड़े भरे थे। थैली को फेंक कर वह सोने का प्रयास करने लगी, तभी ग्रीष्म संुदरी आ गई और पूछने लगी कि उसे गर्मी ऋतु कैसी लगती है।

रीना बोली-”यह ऋतु को बड़ी ही गंदी होती है। हरदम पसीना आता रहता है, मुझे तो ज्यादा गर्मी के कारण खेलने को भी नहीं मिलता। गर्मी के पसीने से भरे मेरे नए कपड़े खराब हो जाते हैं। गर्म लू के कारण मेरी तबीयत खराब हो जाती है।“

ग्रीष्म सुंदरी ने क्रोधित होकर उसे एक प्लेट दी और गायब हो गई। रीना ने प्लेट में ज्यों ही हाथ रखा प्लेट में तरह-तरह के कीड़े रंेेगने लगे। रीना ने घबरा कर प्लेट फेंक दी। चारों तरफ कीड़े रंेगने लगे तो रीना को डर लगने लगा।

तभी वर्षा सुंदरी आ गई। उसने भी रीना से वही सवाल पूछा कि उसे वर्षा ऋतु कैसी लगती है। रीना परेशान थी और समझ नहीं पा रही थी कि क्या जवाब दूं। वह बोली-”बारिश का मौसम सभी ऋतुओं में गंदा है। जगह-जगह पानी भर जाता है और मैं खेल नहीं पाती। कभी-कभी स्कूल भी नहीं जा पाती। बारिश में बदन चिपचिपा रहता है। खाने की चीजें सड़ने लगती है। और कुछ चीजें सीलकर बेस्वाद हो जाती हैं। सच मुझे वर्षा ऋतु से नफरत है।“

रीना का उत्तर सुनकर वर्षा ऋतु क्रोधित हो गई। उसने रीना को अंगूठी व चटाई दी ओर अन्तर्धान हो गई। रीना ज्यों ही चटाई पर बैठी उसे महसूस हुआ कि उसे आग लगी तपिश महसूस हो रही है। तभी उसने अंगूठी पहनी। अंगूठी से तेज आग निकली और रीना लपटों से घिर गई।

तभी रीना की मां वहां पहुंच गई, उसने मुश्किल से आग को बुझाया, रीना काफी जल चुकी थी। वह मां से बोली-”मां, तुमने मुझे कभी सही बातों की शिक्षा नहीं दी, मैं सदैव सबसे बुरा बोलती रही, बुलबुल को डांटती रही। तुम भी बुलबुल के साथ बुरा व्यवहार करती रहीं, तभी भगवान ने हमें यह सजा दी है।“

बुलबुल आकर अपनी बहन को प्यार करने लगी। यह देखकर मां को ऐहसास हुआ कि बुलबुल कितनी अच्छी लड़की है, उसके साथ दुव्र्यवहार करके मैंने गलती की है। मैं मां हूं और मां के लिए सारे बच्चे एक समान होते हैं। मैनंे रीना को अच्छी बातें न सिखाकर उसका भी बुरा किया और अपना भी।“

मां ने निश्चय किया कि अब वह दोनों बेटियों को समान प्यार करेगी। कुछ दिन मैं रीना ठीक हो गई और सब मिल-जुलकर सुख से रहने लगे।