बेचारा कुंवर (Foolish Kunwar gets beaten by Soldiers)

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Indian folk story(lok katha) of one boy names Kunwar who is beaten up by soldiers due to his foolish act.

Moral of the Story: Foolishness can be Dangerous.

Complete Story in Hindi

एक बार एक गांव में एक किसान रहता था, परिवार अत्यंत गरीब था और उनकी रोटी की गुजर बसर मुश्किल से हो पाती थी। किसान ने विवाह को आठ वर्ष हो चुके थे। परंतु उनके कोई सतांन न थीं। किसान और उसकी पत्नी का इतना दुख न था, जितना संतान न होने का।

hindi short story for kids with moralदोनों भगवान से प्रार्थना करते कि ईश्वर उन्हें एक संतान अवश्य दे, चाहे वह लड़का हो या लड़की। परंतु काफी वर्ष व्यतीत हो गए, और उनके संतान न हुई।

इसी बीच किसान के पड़ोस में एक नव विवाहित जोड़ा रहने आया। वे बहुत खुश रहते थे। एक वर्ष पश्चात् ही उनके घर में पुत्र ने जन्म लिया तो किसान और उनकी पत्नी भी उनके घर बधाई देने पहुंचे। दोनों परिवारों में खूब मित्रता हो गई थी, इस कारण किसान व पत्नी की खूब आवभगत हुई।

घर आकर रात्रि को किसान ने गणेशजी की पूजा की और प्रार्थना की कि उसे संतान प्राप्त हो। ईश्वर ने किसान की प्रार्थना सुन ली। किसान अपने पड़ोसी के पुत्र को अपने बच्चे के समान प्यार करता था, कुछ ही समय बाद उसके घर में भी बालक ने जन्म लिया।

किसान ने अपने बेटे का नाम कुवंर रखा क्योंकि उसक घर के लिए वह राजकुमार से कम न था। किसान व पत्नी अपने पुत्र को अधिक लाड़ करते थे। धीरे-धीरे कुंवर बड़ा हो रहा था। वे उसकी हर इच्छा पूरी करते थे। इस कारण वह जिद्दी होता जा रहा था। वह अपनी मर्जी से खेलता था, अपनी मर्जी से खता था। मां-बाप स्वयं परेशानी सहकर भी उसको अच्छे से अच्छा भोजन खिलाते थे।

कुंवर बेहिसाब खाने के कारण मोटा होता जा रहा था। बच्चे उसे पेटू कह कर बुलाने लगे थे। एक दिन कुंवर एक बगीचे में बहुत सारे आम तोड़ लाया। मां के मना करने पर भी उसने सारे आम खा लिए। उसी रात उसके पेट में दर्द होने लगा। रात्रि में उसे दस्त होने लगे। कुंवर की मां परेशान थी कि क्या करे ताकि कुंवर ठीक हो जाए। कुंवर का पिता किसी जरूरी काम से दो दिन के लिए पास के गांव गया ािा।

सुबह होते ही मां ने कुंवर से कहा-”पास के गांव में मूढ़ामल वैद्य जी रहते हैं। उनकी एक पुडि़या से ही फायदा हो जाता है, तू जल्दी से उनके पास चला जा। सारी परेशानी बता कर जो वह बताएं वह ध्यान से सुनकर आना। तेरे पिता जी होते तो उन्हें साथ भेज देती।“

कुंवर पेट दर्द व दस्तों कारण बेहाल हुआ जा रहा था। वह गांव की सड़क पर तेजी से चलते हुए पास के गांव में वैद्य मूढ़ामल के पास पहुंच गया। वैद्य जी कुंवर के पिता के परिचित थे, अतः उन्होंने दवाई तैयार करके कुंवर को एक पुडि़या दवा खिला दी। कुंवर को पेट दर्द व दस्तों से आराम महसूस हुआ। वैद्य जी ने घर के बाहर पड़ी चारपाई पर कुछ देर उसे आराम करने को कहा।

कुछ देर में कुंवर ने कहा-”वैद्य जी मैं घर जाना चाहता हूं। आप यह बता दें कि मैं भोजन में क्या खाऊं? ताकि जल्दी ठीक हो जाऊं।“

वैद्य जी ने कहा-”बेटा कुंवर दो दिन तक खिचड़ी के सिवा कुछ नहीं खाना है। कल को फिर आकर दवाई खा जाना। मैं तुम्हारे लिए दवाई तैयार करके रखूंगा।“

कुंवर ने खिचड़ी शब्द सुना न था, अतः फिर बोला-”क्या नाम बताया आपने, खचड़ी?“

वैद्य जी ने कहा-”तुम बस मां को जाकर बता देना कि वैद्य जी ने खिचड़ी बताई है, मां खुद बना कर खिला देगी।“

कुंवर ने पुनः पूछा-”खिचड़ी?“ वैद्य जी बोले, ”हां बाबा खिचड़ी, खिचड़ी।“ कुंवर को खिचड़ी शब्द थोड़ा मुश्किल लग रहा था। अतः वह रटते-रटते चल दिया। वह धीरे-धीरे घर की ओर जा रहा था और मुंह से बोल रहा था-”खिचड़ी-खिचड़ी।“

वह कब खिचड़ी कहते-कहते खचड़ी कहने लगा, उसे पता ही नहीं लगा। कुछ ही देर में वह खचड़ी को खाचिड़ी बोलने लगा। वह खाचिड़ी रटते हुए एक खेत के पास से गुजर रहा था कि खेत में काम करने वाले किसान ने उसे आवाज दी-”ऐं छोकरे, इधर आ, क्या बोल रहा है?“

कुंवर ने मासूमियत से जबाव दिया-”खाचिड़ी, खाचिड़ी।“

किसान गुस्से में भर कर बोला-”मैं खेत में बीज बो रहा हूं और तू बोल रहा है खा चिड़ी, खा चिड़ी। अगर चिडि़या मेरा बीज खा गई तो पौधे कहां से निकलेंगे। अगर तुझे कुछ कहना है तो बोल उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी और यहां से भाग।“

कुंवर ने दुनिया देखी न थी। पहली बार घर से निकला था। अतः घबराबर रटने लगे ”उड़ चिड़ी उड़ चिड़ी।“ वह इसी प्रकार रटता हुआ घर की ओर चल दिया। कुछ कदम ही दूर गया था कि उसने देखा, एक बहेलिया जाल फैलाए बैठा है और पक्षियों के फंसने का इंतजार कर रहा है। बहेलिए ने कुंवर को ‘उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी’ रटते देखा तो क्रोध में चिल्लाया-”ऐ लड़के, इतना मारूंगा कि सब कुछ भूल जाएगा, उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी क्या बोल रहा है? क्या तू चाहता है कि सारी चिडि़या तेरी बात सुनकर उड़ जाऐं और मेरे जाल में एक भी न फंसे।“

कुंवर भोलेपन से बोला-”मैं तो वैद्य जी के पास से आ रहा हूं, उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी, कह रहा हूं।“

”अच्छा तू ऐसे नही मानेगा, बहेलिया क्रोध में बोला। फिर बहेलिये ने कुंवर को एक थप्पड़ लगाते हुए कहा-”लड़के ऐसा बोल, आते जाओ फंसते जाओ, आते जाओ फंसते जाओ।“

बेचारा कुंवर रोते-रोते बोला-”आते जाओ, फंसते जाओ।“ फिर वह इसी प्रकार रटते हुए आगे चल दिया, वह थोड़ी ही दूर गया था कि उसे कुछ लोग इकट्टे बातें करते दिखाई दिए। वे सब चोर थे और किसी रईस के घर में चोरी की योजना बना रहे थे। तभी उधर से कुंवर उटते हुए निकला-‘आते जाओ, फंसते जाओ।’

एक चोर का ध्यान कुंवर की बात की ओर गया तो उसने फौरन बाकी चोरों का ध्यान कुंवर की रहट की और लगाया। पांचो चोरों ने सुना तो दौड़कर कुंवर को पकड़ लिया और मारने लगे। कुंवर बेचारा हैरान था कि वे सब उसे क्यों मार रहे हैं।

वह बोला-”चाचा, मैं तो अपने घर जा रहा हूं, तुम मुझे क्यों मानते हो?“

एक चोर बोला-”हम चोरी करने जा रहे हैं और तू हमें बद्दुआ दे रहा है कि हम आते जाएं और फंसते जाएं यानी एक-एक करके पकड़े जाएं। ऐसी बुरी बात तो हम अपने घर वालों की भी नहीं सुन सकते। तुझे अगर कुछ कहना ही है तो बोल-ले-ले-जाओ, रख-रख जाओ। अगर कुछ और बोला तो हम तुझें जिंदा नहीं छोड़ेगे क्या समझा?

कुंवर बोला-”कुछ नहीं समझा, आप जो कहोगे वही बोलूंगा, आप बताओ मैं क्या बोलूं।“

”तुम बोला ले-ले जाओ, रख-रख जाओ, समझे,“ एक चोर ने कहा। कुंवर बेचारा हैरान-परेशान था, वह वह रटते हुए घर की ओर चल दिया, ‘ले-ले जाओ, रख-रख जाओ’। कुंवर अभी कुछ ही दूर गया था कि उसने देखा कि कोई शव यात्रा निकल रही है। कोई जबान व्यक्ति मर गया था। रिश्तेदार व परिजन बुरी तरह रो रहे थे।

परंतु कुंवर को किसी से लेना-देना न था, वह धीरे-धीरे से वही रटता रहा जो चोरों ने बताया था। अर्थी उठाने वाले एक व्यक्ति ने कुंवर की बात सुनी तो वह क्रोध से पागल हो उठा और जोर से चिल्लाया-”पकड़़ो इस छोकरे को। देखो भागने न पाए। इसे देखो, यह क्या बक रहा है-ले-ले जाओ, रख-रख जाओ। यह हमारे लिए इतनी अशुभ बात बोल रहा है। हम क्यों किसी की अर्थी बार-बार लाएं।“ क्रोधित रिश्तेदारों ने सुना तो कुंवर से पूछने लगे कि वह क्या कह रहा है।

भोले कुंवर ने डरते-डरते बता दिया कि वह क्या बोल रहा है। रिश्तेदारों ने कुंवर को समझाया,  तुम जो बोल रहे हो, वह बहुत गलत बोल रहे हो। तुम्हें कुछ बोलना ही है तो वह बोलो-”ऐसा दिन कभी न हो, ऐसा दिन कभी न हो।“

कुंवर बेचारा मरता क्या न करता, वह यही रटता हुआ चल दिया-ऐसा दिन कभी न हो, ऐसा दिन कभी न हो। वह बेचारा डर के मारे समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ इतना बुरा क्यों हो रहा है। बचपन से आज तक उसने मां-बाप से अधिक डांट तक नहीं खाई थी। पिटाई का तो सवाल ही न था। उसने घर के आस-पास के अलावा बाहरी दुनिया देखी ही नहीं थी।

शाम ढल चुकी थी रटते-रटते वह थोड़ी ही दूर आग गया कि उसने देखा कि कोई बारात निकल रही है। वह सड़क के किनारे खड़े होकर अपनी बात रटते हुए बारात देखने लगा। उसे पता न था यह किसी राजा के बेटे की बारात निकल रही है। एक सैनिक ने सुना कि एक लड़का कुछ बोल रहा है। उसने ध्यान से सुना तो दौड़कर राजा के पास आया और उसे सारी बात बताई।

राजा को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि कोई लड़का कह रहा है कि ऐसा दिन कभी न हो। राजा ने तुरंत उस लड़के को पकड़ने का आदेश दिया। सिपाही कुंवर को पकड़कर पीटते हुए राजा के पास ले गए, कुंवर बेचारा रोने लगा।

राजा ने पूछा-”ऐ लड़कें, तुम्हें इस शादी से क्या दुख है?“

कुवंर बेचारा समझ ही न सका कि राजा ऐसा क्यों पूछ रहा है। उसने कहा-”मुझे तो इस शादी से कोई दुख नहीं है।“

राजा ने कहा-”क्या तुम नहीं जानते कि यह राजा के बेटे की बारात है और अशुभ बात बोल रहे हो कि ऐसा दिन कभी न हो।“

कुंवर ने ज्यों ही अपनी बात विस्तार से सुनानी शुरु की राजा समझ गया कि कुंवर बेचारा नादान है। उसने कुंवर से कहा-”तुम्हें यह बोलना चाहिए ऐसा दिन सभी का हो।“

कुंवर ने कहा ठीक है। तब राजा ने सिपाहियों को आदेश दिया कि कुंवर को उसके घर पहुंचा दो क्योंकि वह अपने घर का रास्ता भटक गया है।

सिपाही कुंवर को उसके घर छोड़ आए। मां सिपाहियों तथा कुंवर को देखकर हैरान-सी हो गई। कुंवर बेचारा रो रहा था, उसके बदन में पिटाई के कारण बहुत दर्द था।

कुंवर ने रोते-रोते अपनी मां को सारा हाल सुनाया, फिर पूछा-“माँ ऐसा क्यों होता है कि कोई आदमी एक बात बोलने को कहता है और दूसरा आदमी उसी बात पर मारने लगता है।“

मां ने कहा-”बेटा समय व मौके के अनुसार शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं।“

कुंवर ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मां की ओर देखा तो मां ने कहा-”सो जाओ बेटा। तुम बहुत भोले हो, इन बातों का मतलब नहीं समझ सकोगे।“

परंतु बेचारे कुंवर को बदन दर्द के मारे नींद नहीं आ रही थी। पेट-दर्द तो वह कब का भुल चुका था।

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