जैसे को तैसा (Clever friend taught a nice lesson)

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Egyptian folk tale of two friends, in which one cleverly puts the other in a less profit making share of their farming work. The rest of the story follows how the clever friend is taught a lesson by the wife of other friend.

Complete Story in Hindi

सिमकी का गरीबी के मारे बुरा हाल था। उसके घर में कई-कई दिन तक भोजन नसीब नहीं होता था। उसकी पत्नी रोजिया उसे रोज समझाती कि समझ और मेहनत से काम किया करो, परंतु सिमकी बहुत सीधा-साधा, भोला-भाला मासूम था। इसी कारण हर जगह धोखा खा जाता था। कहीं सीधेपन के कारण उससे भूल हो जाती तो कभी कोई उसे धोखा दे देता, जिससे उसे अपनी मजदूरी तक पूरी नहीं मिलती थी।

short story for kids with moralएक दिन सिमकी की पत्नी ने समझाया कि क्यों न तुम अपने मित्र फाजरी के पास जाकर कोई काम मांगो। कम से कम वह धोखा तो न देगा। उसके पास ढेर सारी जमीन, घोड़े, बैल हैं। वह तुम्हें खेतों का या जानवर देखने का काम अवश्य दे देगा। फिर हमेें हर महीने गुजारे लायक कुछ न कुछ अवश्य मिल जाएगा।

अपनी पत्नी की सलाह मानकर सिमकी फाजरी के पास पहुंच गया। फाजरी बहुत चालाक और और स्वार्थी बन चुका था। फिर भी अपनापन दिखाते हुए सिमकी से बोला-’’ठीक है। अपने एक खेत की जिम्मेदारी हम तुम्हें दे देते हैं। इस पर सारी खेती तुम करोगे। जो भी फसल होगी, आधी तुम्हारी आधी मेरी।

सिमकी खुश हो गया। अपने घर जाकर खुशखबरी अपनी पत्नी रोजिया को सुनाई। पत्नी खुश हो गई और सोचने लगी-अब हमारे दिन बदल जाएंगे। हमें पैसे की कमी नहीं रहेगी।

अगले दिन सिमकी फाजरी के पास काम के लिए पहुंच गया। फाजरी ने अपना खेत दिखाते हुए कहा कि इसी खेत पर तुम्हें मेहनत से खेती करनी है। खाद, बीज सब मैं दूंगा। तुम्हारे घर खर्च को कुछ धन भी दे दूंगा परंतु जब फसल होने लगेगी तो आधी मेरी होगी और आधी तुम्हारी।

सिमकी ने कहा-’’ठीक है सौदा तय रहा।

सिमकी ने अगले दिन से मेहनत से काम करना शुरु कर दीया। उसने फाजरी के दिए हुए बीज धरती में बो दिए। कुछ ही दिन में पौधे निकल आए। खेत हरा भरा हो उठा। अब सिमकी खूब मेहनत से काम करता और सोचता कि फसल कटने पर क्या-क्या खरीदूंगा। आखिरकार फसल तैयार हो गई। भोला सिमकी अपने मित्र की चालाकी अभी तक नहीें भांप सका था। फसल कटने के वक्त फाजरी भी खेत पर आ गया था। शर्त के मुताबिक फसल का ऊपरी भाग सिमकी को मिलना था, व जमीन के नीचे का भाग फाजरी को मिलना था। फाजरी ने चालाकी की थी, और शलगम की फसल बोई थी। फसल काटकर दो बैलगाडि़यों में भर दी गई।

फाजरी शलगम लेकर बाजार चला गया। वहां उसकी फसल खूब अच्छे दामों पर बिकी।

सिमकी बैलगाड़ी में अपनी फसल भर कर बाजार पहुंचा तो शलगम के पत्तों को खरीदने बाला कोई न था। जानवरों का चारा खरीदने वालों ने थोड़े बहुत पत्ते खरीद लिए। शाम तक पत्ते सूखने-सड़ने लगे।

बेचारा सिमकी दुखी होते हुए घर पहुंचा। पत्नी को सारी बात विस्तार से सुनाई। वह फाजरी की चालाकी पर मन ही मन क्रोधित हो रही थी परंतु वह कुछ कर नहीं सकती थी। आखिर सिमकी इतना सीधा था कि समझााने से बात नहीं बन सकती थी।

थोड़े दिन बाद जब वह पुनः फाजरी के खेत पर काम करने लग गया तो उसने पुनः यही शर्त रखी कि आधी फसल तुम्हारी और आधी मेरी। सिमकी ने कहा मुझे इस बार नीचे की फसल चाहिए। फाजरी मान गया।

वह पहले की भांति फाजरी के दिए बीज खेत पर बो आया और खूब मेहनत से खेती करने लगा। जब फसल पक कर तैयार हुई तो उसे पता लगा कि यह तो गेहूं की फसल है। परंतु वह कुछ नहीं कर सकता था। शर्त के अनुसार फाजरी ने फसल का ऊपरी हिस्सा यानी गेहूं की बालियां ले लीं और उसकी नीचे की शाखाएं सिमकी को दे दीं। सिमकी को इस बार भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा।

सिमकी ने सूखी डालियों का कुटवा कर भूसा बनवाकर बाजार में बेच दिया। परंतु फाजरी गेहूं बेचकर मालामाल हो गया।

फाजरी की चतुराई सुनकर सिमकी की पत्नी रोजिया से न रहा गया। उसने चाल चलने की सोची और योजना बना डाली। इस बार सिमकी के साथ रोजिया भी फाजरी के पास गई। वहां पहले की भांति खेती पर आधी-आधी फसल की बात तय हुई।

सिमकी ने इस बार नीचे की फसल चुनी। पत्नी चाहती थी कि शर्तें उसी के सामने पक्की हो। अतः सारी शर्तें लिखित में पक्की हो गईं।

इसके बाद सिमकी अपनी पत्नी के साथ फाजरी के गोदाम से बीज लेने पहुंचा। पत्नी ने उनके लिए बीज का बोरा बदल कर दूसरे बीज का बोरा ले दिया और खेत में जाकर बो दिया।

हमेशा कि भांति फाजरी इस बार भी खेतों की गुड़ाई -बुबाई देखने नहीें आया। सिमकी ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर खेती करनी शुरु कर दी। दिन-रात मेहनत करके ये दोनों खेतों में लगे रहते। उनकी मेहनत रंग लाई।

फसल पकने पर फाजरी बड़ी खुशी और घमंड के साथ खेत पर आया तो हरी भरी लहलहाती फसल देखकर खुशी से नाच उठा। परंतु जब फाजरी के मुंशी ने  उसके कान में फूंक कर कहा कि इस बार तो सिमकी की नीचेे की फसल है, तो फाजरी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

फाजरी समझ नहीं पा रहा था कि इस बार धान की फसल के बदले आलू की फसल कैसे बन गई। परन्तु सबके सामने कुछ नहीं बोल सका। सामने ही सिमकी की पत्नी भी खड़ी मुस्करा रही थी।

फिर फसल की कटाई शुरु हुई। शर्त के अनुसार फसल दो जगह लादी जाने लगी। इस बार फसल ज्यादा हुई थी। इस कारण बैलगाड़ी की जगह फसल को ट्रक में लादा जा रहा था। एक ट्रक में आलू लादे जा रहे थे तो दूसरी तरफ इसके पौधे। सिमकी अपनी आलू की फसल लेकर मंडी में पहुंचा तो बहुत अच्छे दामों पर फसल बेच दी।

सिमकी के साथ उसकी पत्नी भी गई थी। दोनों फसल बेचकर खुशी-खुशी घर लौटे। उधर, फाजरी के आलू के पौधे मंडी पहुंचते-पहुंचते सूख चुके थे, अतः उन्हें जानवरों के चारे के लिए भी कोई खरीदने वाला न था। उसको पहली बार ऐसा झटका मिला था। इस बार जैसे को तैसा मिला था। वह मन ही मन क्रोध से जला जा रहा था।

उसने मन ही मन निश्चय किया कि अगली फसल में वह बदला जरुर निकालेगा। उसने अपने नौकर के हाथ सिमकी के यहां खबर भिजवाई कि अगली फसल के लिए वह सिमकी का इंतजार कर रहा है।

सिमकी की पत्नी रोजिया ने कहला भेजा कि हमने आधी फसल का सौदा करना बंद कर कर दिया है।

इस बार फसल बेचकर मिली रकम से सिमकी और रोजिया ने मिलकर छोटा-सा खेत खरीदा और उस पर मेहनत करके सुख से रहने लगे।

उधर, फाजरी ने सुना तो पछताकर हाथ मलता रह गया।

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