अनन्त लालसा (Greed of Poor Birju)

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God grants a wish to poor Birju but his wishes keep on increasing. Seeing this, God takes away all the granted wishes and makes him poor again.

Moral of the Story: Greediness is a curse.

Full Story in Hindi

बिरजू एक गरीब चरवाहा था। दिन भर दूसरों की गाएं चराकर शाम को थका-मांदा घर लौअता था। उसकी कमाई केवल इतनी थी कि मुश्किल से एक वक्त की रोटी जुटा पाता था।

hindi story for kids with moralउसे दो छोटे बच्चे थे। दोनों ही पूर्ण भोजन न मिल पाने के कारण बेहद दुर्बल थे। बिरजू बहुत परेशान रता था कि किसी तरह उसकी आमदनी बढ़ जाए।

एक दिन की बात है। बिरजू जंगल में बैठा भगवान का ध्यान कर रहा था कि अचानक उसे महसूस हुआ कि उसके सामने कोई खड़ा है। उसने गरदन उठाई तो साक्षात् ईश्वर के दर्शन किए।

ईश्वर वाले-”हम तुम्हारी मेहनत और ईमानदारी से खुश हुए हैं। तुम कोई एक इच्छा करो, हम उसे पूरा कर देंगे।“

बिरजू बोला-”मैं बहुत गरीब हूं। अगर मेरे पास भी आपनी गाय होती तो मैं सुखी हो जाता।“

ईश्वर ने उसकी प्रार्थना सुन ली और उसे एक गाय दे दी। अब बिरजू सुबह उठकर गाय का दूध दुहता। दिन में गाय को चराकर लाता। शाम को फिर गाय का चारा काट कर सानी तैयार करता। फिर रात को दूध दुहता।

इस प्रकार बिरजू का पूरा दिन गाय के काम-काम में बीतने लगा। उसके बच्चों को दूध मिलने लगा। उसकी पत्नी भी गाय की देखभाल व घर का काम-काज करती। इसी तरह कुछ दिन बीत गए।

तब बिरजू सोचने लगा कि गाय का दूघर सारा घर में ही खर्च हो जाता है। थोड़ा बहुत ही दूध बचता है। चलो उसे दूसरों को बेच दिया करूं। इससे कुछ आमदनी बढे़गी।

धीरे-धीरे वह गाय का काफी दूध बेचने लगा। थोड़ा समय बीता तो बिरजू को लगने लगा कि यदि उसके पास गाय की जगह भैंस होती तो कितना अच्छा होता। वह सारा दूध बेच भी लेता जिससे उसकी आय बढ़ जाती और घर में बच्चों व पत्नी को भी दूध की कमी न रहती।

वह परेशान रहने लगा। एक दिन वह विचारों में खोया था कि उसे पुनः ईश्वर के दर्शन हुए। ईश्वर बोले-”क्या बात है पुत्र, बहुत परेशान लगते हो।“

बिरजू बोला-”प्रभु, आपकी कृपा से मुझे गाय मिल गई परंतु यदि मेरे पास गाय की जगह एक तगड़ी भैंस होती तो मैं ज्यादा सुखी हो जाता। परंतु तब मुझे यह बात सूझी ही न थी।“

”चिंता क्यों करते हो पुत्र! मैं तुम्हारी इच्छा पूरी किए देता हूं।“ कहकर ईश्वर अन्तर्धान हो गए।

बिरजू को भैंस मिल गइ। उसकी भैंस सुबह-शाम 15 किलो दूध देती। वह दूध हलवाई के यहां बेंच आता। इस तरह उसकी आमदनी बढ़ गई। वह खुश रहने लगा। उसके बच्चे स्कूल जाने लगे। पत्नी अच्छे कपड़े पहनने लगी।

कुछ दिन बाद बिरजू फिर सोचने लगा कि एक भैंस से क्या काम चलता है। उसने गलती की जो ईश्वर से एक भैंस मांगी, उसे कम से कम पांच भैंसे मांगनी चाहिए थीं।

वह आंखे बंद किए सोच ही रहा था कि ईश्वर ने उसे पुनः दर्शन दिए और पूछा-”क्या बात है पुत्र, तुमने गाय मांगी, मैंने तुम्हें गाय दी। फिर भी तुम सुखी नही हुए। फिर तुमने भैंस मांगी, मैंने तुम्हें भेंस दी। पंरतु तुम अभी भी परेशान और दुखी दिखाई देते हो।“

”प्रभु, यह ठीक है-” कि मंैने भैंस मांगी थी, परंतु एक भैंस से घर के खर्च पूरे नहीं हो पाते, इस कारण मैं परेशान हूं।“ बिरजू बोला।

ईश्वर बोले-”फिर क्या चाहते हो? चलो मैं तुम्हारी एक इच्छा और पूरी कर देता हूं, लेकिन यह अंतिम इच्छा होनी चाहिए।“

बिरजू सोचने लगा कि अभी तक मैं पांच भैंसे लेने की सोच रहा था। लेकिन भगवान कह रहे हैं तो अब मुझे अंतिम इच्छा पूरी करा लेनी चाहिए। अतः मुझे पांच की जगह दस भैंसे मांगनी चाहिए। अतः बिरजू बडे़ विचार के बाद बोला-”प्रभु, छोटा मुंह बड़ी बात न समझें तो मुझे दस भैंस दिलवा दें। फिर मैं आपसे कुछ नहीं मागूंगा।“

प्रभु बोले, ”ऐसा ही होगा।“ और अन्तर्धान हो गए। बिरजू बहुत खुश हो गया।

अब उसके सामने समस्या हुई कि इतनी भैंसों को रखे कहां? वह मुसीबत में पड़ गया। इतनी सारी भैंसे रखने के लिए बहुत सारी जमीन चाहिए थी। जमीन के भाव बहुत ऊंचे थे।

उसने दिमाग पर जोर लगाया और दो भैंसे बेचकर थोड़ी-सी जमीन खरीद ली। उसके चारों तरफ बाड़ लगा दी और भैंसो की देखभाल करने लगा। लेकिन इतनी सारी भैंसों की देखभाल करना उसके अकेले के वश में नहीं था।

कभी भैंसों के लिए चारे की जरूरत होती, तो कभी भैंसों का गोबर साफ करना होता। कभी इतनी सारी भैंसा का दूध निकालने की समस्या होती।

इस काम में सहायता के लिए उसने 2-3 नौकर रख लिए। सब नौकरी अलग-अलग काम करते थे। कोई गोबर उठाता, कोई सफाईकरता, तो कोई भैंसों का दूध दुहता। फिर उसने उन भैंसों का दूध जगह-जगह भेजने का प्रबन्ध कर दिया। इस काम के लिए दो लड़के रख लिये जो घर-घर दूध बेचने जाते थे।

बिरजू की डेयरी चल निकली, उसके पास धन की कमी न रही। अब उसके दोनों बच्चे बड़े होने लगे थे। उन बच्चों की बड़ी-बड़ी फरमाइशें होने लगीं। पत्नी को रोज जेवरों की चाह बनी रहती।

कुछ दिन यूं ही बात गए। धीरे-धीरे बिरजू को लगने लगा कि उसने कैसा गंदा धंधा कर रखा है। डेयरी में चारों तरफ मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं, हर तरफ गोबर पड़ा रहता है।

बिरजू सोचने लगा कि वह शहर में होता तो अपने बच्चों को अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाता। क्या ही अच्छा होता कि उसकी भैंस और दूध के कारोबार की जगह शहर में कोई अच्छा व्यापार या दुकान होती या कोई छोटी-मोटी फैक्टरी होती।

धीरे-धीरे बिरजू अपने काम से ऊब कर परेशान रहने लगा। वह बार-बार ईश्वर को याद करने लगा। वह सोचता कि किसी तरह एक बार प्रभु उसे फिर दर्शन दे दें तो कितना अच्छा हो। मैंने मांगा भी तो क्या? भैंसे और दूध का व्यापार? यह भी कोई काम है? उसे कोई ढंग का काम मांगना चाहिए था।

एक दिन वह बैठा ईश्वर की प्रार्थना कर रहा था कि उसे लगा कि ईश्वर उसके सामने हैं। उसने आंखे उठाकर देखा तो ईश्वर के साक्षात् दर्शन किए। वह ईश्वर के पैरों में गिर पड़ा और गिड़गिड़ाकर बोला-”हे प्रभू मैं तो निरा बेवकूफ हूं। मैंने आपसे जो मांगा सो आपने दिया। परंतु जाने क्या सोचकर मैंने आपसे भैसें मांग ली, मुझे इनकी कतई जरूरत नहीं। आप मेरी एक इच्छा और पूरी कर दीजिए फिर मैं आपसे कभी कुछ नही मांगूंगा।“

ईश्वर बोले-”उठो वत्स, मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि यह आखिरी इच्छा है, सोच-समझ कर मांगना और तुमने खूब सोच-विचार कर दस भैंसें मांगी थी। अब तुम कहते हो कि तुम्हें भैंसे नहीं चाहिए। लेकिन मैं मजबूर हूं क्योंकि तुम्हारी इच्छाएं अनन्त हैं। एक के बाद दूसरी इच्छा जन्म लेती जाती है। तुम जैसे थे वैसे ही रहो।“

यह कहकर ईश्वर अन्तर्धान हो गए। धीरे-धीरे बिरजू के व्यापार में घाटा हो गया। भैंसे बीमार होकर मरने लगीं। कुछ दिन बाद घर की वही पुरानी हालत हो गई। वह दूसरों के गाएं चराने लगा और उसी तरह चरवाहा बन कर गरीबी का जीवन बिताने लगा।

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